UNSC में 5 देशों की मनमानी क्यों चलेगी, भारत ने पूछा 188 देशों पर कबतक थोपेंगे राय?
UNSC: भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मौजूदा व्यवस्था पर इससे जुड़े देशों को आईना दिखा दिया है। भारत ने सवाल किया है कि अफ्रीका, लैटिन अमेरिका के देश और भारत इससे आज भी बाहर क्यों हैं।

भारत ने एक बार फिर से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में असंतुलन को लेकर इसके स्थाई सदस्यों को खूब खरी-खोटी सुनाई है और पूछा है कि आखिरकार 188 सदस्य देशों को क्यों और कबतक इसके 5 स्थाई सदस्यों की राय मानने को मजबूर होना पड़ेगा। संयुक्त राष्ट्र में भारत की स्थायी प्रतिनिधि रुचिरा कंबोज ने जिस अंदाज में अपनी बात रखी है, उसकी पूरी दुनिया में चर्चा हो रही है।

भारत ने पूछा 188 देशों पर कबतक थोपेंगे राय?
भारत ने एकबार फिर से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में 'प्रमुख सुधार' का आह्वान किया है। सोमवार को यूएनएससी की एक डिबेट में रुचिरा कंबोज ने सवाल किया कि जिस चार्टर को सिर्फ 5 देश तैयार करते हैं, उसे क्यों और कैसे दुनिया भर के देश मान सकते हैं।

'वीटो' के नाम पर 5 देशों के पास है बादशाहत!
उन्होंने कहा कि सुरक्षा परिषद में 5 ही स्थाई सदस्य देश हैं, जो बाकी देशों की तुलना में ज्यादा समान हैं, जिससे इनमें से प्रत्येक को ऐसी ताकत मिल जाती है कि वह बाकी बचे 188 सदस्य देशों की सामूहिक इच्छा को भी नजरअंदाज कर देते हैं। गौरतलब है कि यूएनएससी के पांच सदस्यों के पास 'वीटो' का अधिकार है, जिसमें इनमें से एक भी देश पूरे विश्व की इच्छा पर भारी पड़ जाते हैं।

1945 वाली मानसिकता बदलने का आह्वान
कंबोज ने स्पष्ट तौर पर आज के संदर्भ में यूएनएससी की अहमियत को आईना दिखा दिया है। उन्होंने कहा कि 'यदि 1945 की पुरानी मानसिकता को हम आज भी कायम रखेंगे, तो हम संयुक्त राष्ट्र के प्रति अपने लोगों का भरोसा खोते रहेंगे।'

यूएनएससी के वजूद को लेकर तीखे सवाल
उन्होंने अपने वाजिब सवालों से बहुतों को निरुत्तर कर दिया है। वो बोलीं, 'क्या हम वास्तव में यूएन चार्टर का बचाव करके 'प्रभावी बहुपक्षवाद' को प्रमोट कर सकते हैं, जहां दो स्थाई सदस्य अपना नाम तक बदलने में सक्षम नहीं हो सके हैं।'
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यूएनएससी की यह कैसी लाचारी?
वह रूस और चीन की ओर इशारा कर रही थीं। चीन के लिए यहां अभी भी रिपब्लिक ऑफ चाइना का इस्तेमाल किया जाता है, जो कि अब आधिकारिक तौर पर पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना कहलाता है। जबकि, रूस के लिए अभी भी यूनियन ऑफ सोवियत सोशलिस्ट रिपब्लिक का उपयोग किया जाता है।

तीन पीढ़ी पुरानी सोच बदलने की जरूरत
भारत ने साफ किया कि 21वीं सदी में वही सोच नहीं चल सकती, जो कि तीन पीढ़ियां पहले चलती थी। कंबोज ने कहा कि 'जब 26 जून, 1945 को सैन फ्रांसिस्को में इसपर हस्ताक्षर किए गए थे तो भारत संयुक्त राष्ट्र चार्टर के संस्थापक हस्ताक्षरकर्ताओं में शामिल था।'
दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र इससे क्यों रहेगा बाहर?
उन्होंने कहा कि 77 साल बाद भी अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के पूरे महाद्वीप और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का वैश्विक निर्णय लेने से बाहर रहना निश्चित तौर पर इसमें बड़े सुधार की आवश्यकता की ओर देखने को कहता है। बता दें कि भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता का लंबे समय से दावेदार रहा है।
अमेरिका, फ्रांस और रूस जैसे देश इसके लिए भारत का समय-समय पर समर्थन भी कर चुके हैं। लेकिन, सुरक्षा परिषद के विस्तार की संभावना लंबे समय से टलती रही है, जिसकी वजह से यह वैश्विक संस्था आज विशेष रूप से सुरक्षा के मामले में उतना सफल नहीं हो पाया है, जितना की इससे उम्मीद की जा सकती है।












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