BRICS: ब्रिक्स में शामिल होने के लिए बेकरार तुर्की, यूरोपीय संघ से बदला लेने में अर्दोआन की मदद करेगा भारत?
BRICS Turkey Bid: तुर्की ने ब्रिक्स में शामिल होने के लिए आधिकारिक तौर पर बोली लगाने का फैसला किया है। ब्रिक्स दुनिया की कुछ उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह है, जिसमें मूल रूप से ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका शामिल हैं, लेकिन इसमें मॉस्को और बीजिंग का वर्चस्व है।
तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन की सत्तारूढ़ जस्टिस एंड डेवलपमेंट पार्टी (AKP) के प्रवक्ता ओमर सेलिक ने तुर्की के आवेदन की पुष्टि की है और कहा है, कि अनुरोध "लंबित" है। सितंबर की शुरुआत में उन्होंने कहा था, कि "हमारे राष्ट्रपति पहले ही कई बार जता चुके हैं, कि हम ब्रिक्स के सदस्य बनना चाहते हैं। इस मामले में हमारा अनुरोध स्पष्ट है, और प्रक्रिया इसी ढांचे के भीतर आगे बढ़ रही है।"

वहीं, तुर्की की मीडिया रिपोर्टों में कहा गया है, कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने तुर्की की ब्रिक्स के साथ जुड़ने की आकांक्षा का स्वागत किया और कहा, कि वह इस सम्मेलन में तुर्की को शामिल करने का "पूरी तरह से समर्थन" करेंगे।
ऐसे में अगर तुर्की वास्तव में BRICS का सदस्य बन जाता है, जिसे अक्सर पश्चिमी नेतृत्व वाली वैश्विक व्यवस्था के प्रति संतुलन करने वाला ग्रुप बताया जाता है, तो यह तुर्की को यूरोपीय संघ (EU) में शामिल होने से और 27 सदस्यीय ब्लॉक के एकल बाजार के लाभों को प्राप्त करने से दूर हो सकता है।

EU का सदस्य क्यों नहीं बन पा रहा तुर्की?
यूरोपीय संघ की राजनयिक सेवा के प्रवक्ता पीटर स्टेनो के मुताबिक, तुर्की को अपनी अंतर्राष्ट्रीय साझेदारी के बारे में फैसला लेने का अधिकार है, हालांकि, यूरोपीय संघ को उम्मीद है, कि उम्मीदवार देश यूरोपीय संघ के मूल्यों का समर्थन करेगा।
डीडब्ल्यू की एक रिपोर्ट में स्टेनो ने कहा, "हम उम्मीद करते हैं कि सभी यूरोपीय संघ के उम्मीदवार देश, यूरोपीय संघ के मूल्यों का मजबूती और स्पष्ट रूप से समर्थन करेंगे, प्रासंगिक व्यापार समझौतों से उत्पन्न दायित्वों का सम्मान करेंगे और यूरोपीय संघ की आम विदेश और सुरक्षा नीति के साथ तालमेल बिठाएंगे।"
उन्होंने कहा, "ये साझा मूल्यों और हितों और देशों के रणनीतिक अभिव्यक्ति के महत्वपूर्ण संकेत हैं।"
कुछ लोग तुर्की के ब्रिक्स समूह में शामिल होने की कोशिश को यूरोपीय संघ में इसके शामिल होने पर चल रही राजनीतिक लेटलतीफी के खिलाफ प्रतिक्रिया के तौर पर देखते हैं। ऐसा माना जाता है, कि ब्रिक्स में शामिल होकर राष्ट्रपति अर्दोआन यूरोपीय संघ से बदला लेना चाहते हैं।
पिछले साल एक वार्षिक रिपोर्ट में, यूरोपीय सांसदों ने निष्कर्ष निकाला कि तुर्की की "यूरोपीय संघ की आम विदेश और सुरक्षा नीति के साथ मिलान दर 7% के सर्वकालिक निम्न स्तर पर आ गई है, जो इसे सभी ईयू देशों में अब तक का सबसे कम बना दिया है।"
यूरोपीय संसद में समाजवादी और डेमोक्रेट समूह के एक सांसद नाचो सांचेज अमोर ने कहा, कि तुर्की का यूरोपीय संघ में शामिल होने का रास्ता सुधारों के माध्यम से है। उन्होंने 2023 के बयान में कहा था, कि "हमने हाल ही में तुर्की सरकार से यूरोपीय संघ में प्रवेश प्रक्रिया को पुनर्जीवित करने में नई दिलचस्पी देखी है। यह भू-राजनीतिक सौदेबाजी के कारण नहीं होगा, बल्कि तभी होगा जब तुर्की के अधिकारी देश में मौलिक स्वतंत्रता और कानून के शासन में लगातार आ रही गिरावट को रोकने में वास्तविक दिलचस्पी दिखाएंगे।"
तुर्की की यूरोपीय संघ में शामिल होने की प्रक्रिया 2005 में शुरू हुई थी, लेकिन 2018 में कई मुद्दों को लेकर इसके शामिल होने में रूकावट आ गई, जिसमें मीडिया की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाना, न्यायपालिका पर कार्यपालिका का नियंत्रण और तुर्की सुरक्षा बलों पर अपर्याप्त नागरिक निगरानी जैसी यूरोपीय संघ की चिंताएं शामिल थीं।

क्या ब्रिक्स में शामिल होने की कोशिश तुर्की की हताशा का संकेत है?
जर्मन मार्शल फंड (जीएमएफ) में तुर्की विशेषज्ञ ओजगुर अनलुहिसारसिकली ने कहा, कि ब्रिक्स में तुर्की की दिलचस्पी यूरोपीय संघ के साथ उसकी हताशा का प्रतीक है। तुर्की न केवल यूरोपीय संघ से अपनी प्रवेश प्रक्रिया को रोकने के लिए, बल्कि सीमा शुल्क या व्यापार समझौते के आधुनिकीकरण पर आगे न बढ़ने और न ही वीजा उदारीकरण के लिए रोडमैप पर आगे न बढ़ने के लिए यूरोपीय संघ से नाराज है, जो तुर्की के नागरिकों के लिए यूरोपीय देशों में वीजा-मुक्त यात्रा करने का रास्ता साफ कर सकता है।
वहीं, 15 साल पहले इसके गठन के बाद से ब्रिक्स समूह का आकार दोगुना हो गया है। मिस्र, इथियोपिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) इसके सदस्य बन गए हैं और समूह ने तुर्की सहित लगभग 20 अन्य देशों से आवेदन प्राप्त किए हैं। ब्रिक्स की सबसे बड़ी खासियत ये है, कि इसके सदस्य एक समान सुरक्षा या विदेश नीति अपनाने की कोशिश नहीं करते हैं। इसके बजाय, इसके सदस्य व्यापार और आर्थिक विस्तार पर सहयोग करने और संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप के प्रभुत्व वाले अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों के लिए एक राजनीतिक संतुलन बनाने की कोशिश करते हैं।
ब्रिक्स में शामिल होने की तुर्की कोशिशों को क्यों लग सकता है झटका?
तुर्की मामलों के जानकारों ने कहा है, कि ब्रिक्स में शामिल होने की अर्दोआन की पहल तुर्की के यूरोपीय संघ में शामिल होने की कोशिश में लाभ उठाने के लिए हो सकती है।
ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूट में तुर्की के विशेषज्ञ अस्ली आयडिनटसबास ने कहा, कि तुर्की की यूरोपीय संघ में शामिल होने की प्रक्रिया "लंबे समय से कोमा में है" और तुर्की के नीति निर्माता या तो इसे पुनर्जीवित करने की कोशिश कर रहे हैं या उन्हें लगता है कि ब्रिक्स में शामिल होने से उन्हें कुछ भी खोने को नहीं है।
यूरोपीय देशों ने तुर्की की प्रवेश प्रक्रिया को फिलहाल पूरी तरह से रोक दिया है और तुर्की को EU के विस्तार एजेंडे से पूरी तरह से बाहर करने वाले हैं। बाल्कन ने डीडब्ल्यू को बताया, कि "मुझे लगता है कि तुर्की के निर्णयकर्ता ब्रिक्स को ऐसी चीज के रूप में नहीं देख रहे हैं, जो तुर्की के महत्व को कम करती है, बल्कि इसे इस तरह से बढ़ाती है, कि पश्चिमी देश जलन करें और तुर्की को उनका ध्यान आकर्षित करने का ज्यादा मौका दे।"
लेकिन अनलुहिसारसिकली ने बताया, कि ये रणनीति फेल भी हो सकती है क्योंकि तुर्की के ब्रिक्स में शामिल होने से यूरोपीय संघ के देशों को तुर्की पर शक और ज्यादा गहरा हो सकता है।
उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "यदि तुर्की ब्रिक्स का सदस्य बन जाता है तो ट्रान्साटलांटिक गठबंधन के भीतर इसकी विश्वसनीयता और कम हो जाएगी।"
तुर्की एक अविश्वासी मगर जरूरी साथी!
तुर्की की विदेश और सुरक्षा नीति के फैसलों ने पश्चिमी राजधानियों में देश की छवि को पहले ही धूमिल कर दिया है।
तुर्की ने रूस के खिलाफ प्रतिबंधों का समर्थन करने से इनकार कर दिया है, और इसके बजाय रूसी कच्चे तेल का शीर्ष खरीदार बन गया है। तुर्की, हमास का भी समर्थन करता है, जो उग्रवादी, इस्लामवादी, फिलिस्तीनी समूह है, जिसने 7 अक्टूबर को इजराइल पर आतंकवादी हमले किए और जिसे यूरोपीय संघ के साथ-साथ संयुक्त राज्य अमेरिका, जर्मनी और कई अन्य देशों द्वारा आतंकवादी संगठन के रूप में नामित किया है।
इसके अलावा, तुर्की ने साल 2017 में रूस से एस-400 मिसाइल एयर डिफेंस सिस्टम खरीदा था, जिसने अमेरिका के साथ साथ उसके नाटो सहयोगियों को बुरी तरह से नाराज कर दिया और फिर साल 2022 में तुर्की ने NATO में स्वीडन और फिनलैंड की शामिल होने की कोशिश को अपनी जिद की वजह से 2 सालों तक रोक कर रखा। और बाद में अमेरिका की सख्त नाराजगी के बाद उसने इन दोनों देशों के नाटो में शामिल होने पर साइन किया।
हालांकि, पश्चिम और पूर्व के बीच तुर्की का रणनीतिक स्थान इसे क्षेत्र में नाटो और अमेरिकी मिशनों के लिए काफी महत्वपूर्ण बना देता है, और देश ने 2016 में यूरोपीय संघ के एक समझौते पर हस्ताक्षर कि था, जिसमें तुर्की से ब्लॉक में पहुंचने वाले कुछ अनियमित प्रवासियों की वापसी की अनुमति दी गई।
इसमें कोई शक नहीं, कि पश्चिमी देशों में तुर्की को लेकर काफी कम विश्वास है, लेकिन ब्रिक्स में वो तभी शामिल हो पाएगा, जब भारत की भी मंजूरी मिले। ब्रिक्स में चीन और रूस एक साथ हैं और तुर्की के शामिल होने से भारत का पॉजिशन और कमजोर हो सकता है, ऐसे में तुर्की ब्रिक्स में शामिल हो पाएगा या नहीं, ये भारत की मंजूरी पर निर्भर करता है। लिहाजा सवाल ये है, कि क्या मोदी सरकार, राष्ट्रपति अर्दोआन को यूरोपीय संघ से बदला लेने का मौका देंगे?












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