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दुनिया भर में लाखों लोग एलोपैथिक से पहले पारंपरिक दवाओं का करते हैं इस्तेमाल, WHO के बयान पर क्यों मचा हंगामा?

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने गुरुवार को भारत के पश्चिमी राज्य गुजरात के गांधीनगर शहर में पारंपरिक चिकित्सा पर अपना पहला शिखर सम्मेलन आयोजित किया।

इस दौरान WHO ने कहा कि वह ऐसे उपचारों के सुरक्षित उपयोग की अनुमति देने के लिए साक्ष्य और डेटा एकत्र करना चाहता है। WHO ने एक बयान में कहा कि दुनिया भर में लाखों लोग सबसे पहले पारंपरिक चिकित्सा पद्धति का ही प्रयोग करते हैं।

World Health Organization supports traditional medicine

WHO प्रमुख टेड्रोस एडनोम घेबियस ने शिखर सम्मेलन की शुरुआत करते हुए कहा कि WHO पारंपरिक चिकित्सा के सुरक्षित, लागत प्रभावी और न्यायसंगत उपयोग के लिए प्रमाण और जानकारी इकठ्ठा करने की कोशिश कर रहा है जिनसे नीतियां, मानक और नियम बनाये जा सकें।

इससे पहले WHO प्रमुख टेड्रोस ने कहा था कि पारंपरिक चिकित्सा पद्धितयां स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच की समस्याओं को कम कर सकती है लेकिन इसके लिए इसका उपयोग उचित, प्रभावशाली और सबसे अधिक जरूरी ताजा वैज्ञानिक प्रमाण के आधार पर सुरक्षित रूप से इस्तेमाल किया जाए।

पारंपरिक दवाओं के प्रयोग के इस सकारात्मक रूख को लेकर WHO की आलोचना शुरू हो गई है। आलोचकों ने WHO पर छद्म विज्ञान को मान्यता देने का आरोप लगाया है।

इससे पहले WHO ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में पूछा था कि क्या लोगों ने होम्योपैथी और नेचुरोपैथी जैसे इलाजों का इस्तेमाल किया है।

संगठन ने बाद में एक और पोस्ट में कहा कि उसने इन चिंताओं की तरफ ध्यान दिया है और माना कि उसका संदेश और बेहतर तरीके से दिया जा सकता था।

गांधीनगर में हो रही दो दिवसीय बैठक शहर में हो रही जी20 देशों के स्वास्थ्य मंत्रियों की बैठक के साथ साथ हो रही है। नोबेल पुरस्कार विजेता और WHO साइंस काउंसिल के अध्यक्ष हेरोल्ड वरमुस ने वीडियो लिंक के जरिये बैठक को संबोधित किया।

वरमुस ने अपने संबोधन के दौरान कहा, "हमें असली जीवन के एक बेहद जरूरी तथ्य को मानने की जरूरत है कि पारंपरिक चिकित्सा का बहुत इस्तेमाल किया जाता है।"

उन्होंने आगे कहा कि यह समझना जरूरी है कि पारंपरिक चिकित्सा में कौन सी सामग्रियों का इस्तेमाल किया जाता है, क्योंकि वो कुछ मामलों में काम कर जाती हैं...

वरमुस ने कहा कि महत्वपूर्ण रूप से, उन्हें यह समझने और पहचानने की जरूरत है कि कौन सी पारंपरिक चिकित्साएं काम नहीं करती हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक अब से इस बैठक को नियमित रूप से आयोजित करने की योजना है। इसके पहले पिछले साल गुजरात में ही WHO ग्लोबल सेंटर फॉर ट्रेडिशनल मेडिसिनखोला गया था।

आपको बता दें कि पारंपरिक चिकित्सा का दुनिया के कुछ हिस्सों में काफी इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन इनकी कड़ी आलोचना भी की जाती है।

WHO की पारम्परिक चिकित्सा की परिभाषा के मुताबिक यह स्वास्थ्य को बनाये रखने के लिए और शारीरिक और मानसिक बीमारियों को बचने, उनका पता लगाने और उनका इलाज करने के कुछ समय तक इस्तेमाल किया जाने वाला ज्ञान, कौशल और व्यवहार है।

हालांकि कई पारंपरिक उपचारों का कोई सिद्ध वैज्ञानिक मूल्य नहीं है। संरक्षणवादियों का कहना है कि इस पारंपरिक उपचारों के कारण बाघ, गेंडे और पैंगोलिन जैसे लुप्तप्राय जानवरों का बड़े पैमाने पर व्यापार होता है जिससे इनकी पूरी प्रजाति के लुप्त हो जाने का खतरा है।

कोविड-19 महामारी के दौरान घरेलू उपचारों का उपयोग बढ़ गया है। इसमें आर्टेमिसिया के पौधे का बनाया हरा हर्बल पेय भी शामिल है, जिसे मेडागास्कर के राष्ट्रपति ने इलाज के रूप में प्रचारित किया था।

इस पौधे की मलेरिया के इलाज में सिद्ध प्रभावकारिता है, लेकिन कई डॉक्टरों ने कोविड से निपटने के लिए इसके उपयोग की व्यापक रूप से निंदा की।

चीन में, पारंपरिक चिकित्सा का एक प्राचीन और विशिष्ट इतिहास है, लेकिन शीर्ष यूरोपीय चिकित्सा निकायों ने पहले मांग की है कि इसे पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों के समान नियामक निरीक्षण के अधीन होना चाहिए।

WHO के शोध प्रमुख जॉन रीडर ने एक बयान में कहा, "पारंपरिक चिकित्सा के विज्ञान को आगे बढ़ाते समय इस पर भी वही कठोर मानकों पर परखा जाना चाहिए जो स्वास्थ्य के दूसरे क्षेत्रों में लागू होते हैं।"

WHO के 194 सदस्य देशों में से 2018 के बाद से 170 देशों ने पारंपरिक और कॉम्प्लिमेंटरी चिकित्सा के इस्तेमाल को स्वीकारा है, लेकिन सिर्फ 124 देशों ने बताया कि उनके पास हर्बल दवाओं के इस्तेमाल को लेकर नियम और कानून हैं।

WHO कहा, "प्राकृतिक का मतलब हमेशा सेफ नहीं होता है और कोई चीज सदियों से सदियों से उपयोग में लाई जा रही है तो इसका मतलब ये नहीं है कि वह प्रभावी ही हो। इसलिए, इसमें वही कड़े मानक लागू किये जाने चाहियें।"

WHO के मुताबिक इस समय इस्तेमाल किये जा रहे स्वीकृति प्राप्त फार्मास्यूटिकल उत्पादों में से करीब 40 प्रतिशत एक "प्राकृतिक उत्पाद" पर आधारित हैं।

संगठन ने उन ऐतिहासिक दवाओं का हवाला दिया है जो प्राकृतिक चिकित्सा से प्राप्त होती हैं। इसमें एस्पिरिन भी शामिल है जो कि विलो पेड़ की छाल का उपयोग करके तैयार की जाती है।

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