अमेरिका के करीब जाने से घबराया चीन, नेपाल में इस काम को अंजाम देने भेजी तेजतर्रार टीम, सफलता मिलेगी?
काठमांडू, 10 जुलाईः चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के अंतर्राष्ट्रीय संपर्क विभाग के प्रमुख लियू जियानचाओ के नेतृत्व में सात सदस्यीय चीनी प्रतिनिधिमंडल रविवार को काठमांडू पहुंचा है। यह दौरा उस समय हो रहा है जब नेपाल की कम्यूनिस्ट पार्टियों के बीच संभावित चुनावी गठबंधन की बात चल रही है। हाल के दिनों में नेपाल के कई फैसले अमेरिका की तरफ झुके दिखाई देते हैं ऐसे में यह अनुमान लगाया जा रहा है कि चीन एक बार फिर से नेपाल के नजदीक आना चाहता है। हालांकि नेपाल के सियासी घराने में भी यह बात अब आम हो चली है कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के सात सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल की नेपाल यात्रा का मकसद पूरी तरह से राजनीतिक है।

नहीं टिक पाया गठबंधन
नेपाल में सबसे बड़ी कम्यूनिस्ट पार्टी सीपीएन-यूएमएल, मुख्य विपक्ष है। जबकि दूसरा सीपीएन नेपाली कांग्रेस के नेतृत्व वाले सत्तारूढ़ गठबंधन में भागीदार है। मई 2018 में दोनों वामपंथी पार्टियां मिलकर एक हो गई थीं लेकिन इनका विलय अधिक दिन ठहर नहीं पाया और कुछ महीनों तक चली अंदरूनी कलह के बाद यह अलग हो गईं। चीन ने इस पार्टी को एकजुट रखने के खूब प्रयास किए मगर यह गठबंधन टिक नहीं सका और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बीते साल मार्च में टूट गया।

चीन को इस बात का है डर
चीन को अंदेशा है कि अगर नेपाल की दो कम्युनिस्ट पार्टियों- माओइस्ट सेंटर और यूएमएल में एकता नहीं हुई, तो अगले आम चुनाव में नेपाली कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरेगी। तब वह पांच साल के लिए शासन में आ जाएगी। यह सरकार फिर से अमेरिका की करीबी रहेगी और उस हाल में चीन को नेपाली कांग्रेस और उसकी सरकार से उसे डील करना होगा। इसलिए चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने अभी से नेपाली कांग्रेस से संबंध बढ़ाने की रणनीति बनाई है।

दोनों दलों को एक करना मकसद
एक यूएमएल नेता, जिन्होंने चीनी नेताओं के साथ अक्सर बातचीत की है, ने कहा कि 2017 की तरह इस बार भी चीनी कम्युनिस्ट ताकतों के बीच एकता की संभावना को तौल रहे हैं। यूएमएल नेता ने चीनी राजनयिकों, राजनेताओं और अधिकारियों के साथ अनौपचारिक बातचीत का हवाला देते हुए कहा, "यात्रा का एक संभावित एजेंडा समान विचारधारा वाले वामपंथी बलों के बीच या केवल यूएमएल और माओवादी केंद्र के बीच चुनाव पूर्व या चुनाव के बाद गठबंधन को प्रोत्साहित करना हो सकता है।"

यूएमएल ने आरोपों को नकारा
यूएमएल के विदेश मामलों के विभाग के प्रमुख राजन भट्टराई ने इस धारणा का विरोध करते हुए कहा कि नेपाली कम्युनिस्ट पार्टियों के आंतरिक मामलों में बाहरी ताकतों की कोई भूमिका नहीं है। उन्होंने कहा कि अगर बाहरी लोगों ने नेपाल में वामपंथी ताकतों को एकजुट किया था, तो नेपाली कम्युनिस्ट पार्टियों में विभाजन क्यों हुआ?" भट्टाराई ने कहा कि लियू ने अभी-अभी पार्टी के अंतरराष्ट्रीय विभाग का कार्यभार संभाला है और यह उनकी नेपाल की परिचित यात्रा है।" "उन्होंने पहले नेपाली नेताओं के साथ आभासी बैठकें कीं और यह यात्रा उन बातचीत की निरंतरता है।"

नेपाल में हित बढ़ाएगा चीन
एक अन्य अधिकारी ने कहा कि यह यात्रा विदेश मंत्री नारायण खडका की चीन यात्रा का मार्ग प्रशस्त कर सकती है जो लंबे समय से लंबित है। सीपीसी और नेपाल के राजनीतिक दलों के बीच पार्टी-टू-पार्टी संबंध बनाना, चीन के नेतृत्व वाले बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव में तेजी लाना, आगामी चुनावों के लिए जमीनी हकीकत का आकलन करना और नेपाल में चीनी हितों को बढ़ावा देना चीनी अधिकारी के एजेंडे में अन्य मुद्दे हैं। जानकार सूत्रों का कहना है कि जो नेपाली नेताओं को चीन की भू-राजनीतिक संवेदनशीलता के बारे में भी याद दिला रहे होंगे।

नेपाल पश्चिम की ओर झुक गया है?
माओइस्ट सेंटर के उपाध्यक्ष राम कारकी के मुताबिक चीन इस सवाल को लेकर चिंतित है कि क्या नेपाल ने गुटनिरपेक्षता की नीति छोड़ दी है और वह पश्चिम की तरफ झुक गया है। उन्होंने कहा कि जहां तक नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टियो की एकता का सवाल है, तो चीन की उसमें दिलचस्पी है। लेकिन यह हमें देखना है कि हमारे लिए ये जरूरी है या नहीं। मुझे नहीं लगता कि चीन इतना प्रभावशाली है, जिससे वह नेपाल में कम्युनिस्ट समूहों को एकजुट कर दे।

नेपाल के अमेरिकी रूख से चीन चिंतित
काठमांडू स्थित चाइना स्टडी सेंटर के कार्यकारी अध्यक्ष सुंदर नाथ भट्टराई ने कहा कि चूंकि वे नेपाल के प्रमुख राजनीतिक दलों के साथ बैठक कर रहे हैं, इसलिए इस यात्रा का उद्देश्य नेपाली राजनीतिक दलों और सीपीसी के बीच संबंधों को बढ़ावा देना है। चीनी नेपाल में वामपंथी एकता के पक्षधर हैं क्योंकि इससे उनके लिए काम करना आसान हो जाएगा। चीन इस बात को लेकर चिंतित है कि यूक्रेन युद्ध के बाद से नेपाल पश्चिम की तरफ झुक गया है, लेकिन चीन-नेपाल संबंधों के विशेषज्ञों की राय है कि एक यात्रा से चीन अपने सभी मकसद हासिल कर लेगा, यह मुमकिन नहीं है। लेकिन इस यात्रा से उसे नेपाल की जमीनी हालात से परिचित होने में मदद जरूर मिलेगी।
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