हवा को जहरीला बनाने में अमेरिकी अव्वल, तीन अमेरिकी मिलकर ले लेते हैं एक की जान- स्टडी
कार्बन उत्सर्जन को लेकर प्रकाशित एक ताजा रिपोर्ट में पता चला है कि औसतन तीन अमेरिकी मिलकर इतना कार्बन डायऑक्साइड उत्पन्न करते हैं, जिससे एक आदमी की मौत हो जाती है।
वॉशिंगटन, जुलाई 30: पूरा विश्व प्रदूषण, ग्लोबल वॉर्मिंग और जलवायु परिवर्तन से बुरी तरह से परेशान है और ताजा रिपोर्ट से पता चला है कि तीन अमेरिकी मिलकर इतना प्रदूषण करते हैं, जिसके एक आदमी की मौत हो जाती है। ये हाल तब है, जब अमेरिका लगातार विकासशील देशों कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए दवाब बनाता है, लेकिन खुद अमेरिका कार्बन उत्सर्जन कम करने का नाम नहीं ले रहा है।

पर्यावरण का विनाश
कार्बन उत्सर्जन को लेकर प्रकाशित एक ताजा रिपोर्ट में पता चला है कि औसतन तीन अमेरिकी मिलकर इतना कार्बन डायऑक्साइड उत्पन्न करते हैं, जिससे एक आदमी की मौत हो जाती है। स्टडी में पता चला है कि पर्यावरण को लेकर अमेरिकियों का लाइफस्टाइल काफी ज्यादा खराब है और 3 अमेरिकी मिलकर पर्यावरण को गर्म करने वाले इतनी मात्रा में ऐसी जहरीली गैस का उत्सर्जन करते हैं, जिससे एक आदमी की जान चली जाती है। इसके साथ ही स्टडी में पता चला है कि अमेरिका में मौजूद एक कोयला पॉवर प्लांट इतनी मात्रा में जहरीली गैस पैदा करता है, जिससे हर साल 900 लोगों की मौत हो जाती है और आश्चर्य की बात ये है कि ऐसे कोल पॉवर प्लांट अमेरिका में सैकड़ों की संख्या में हैं।

अमेरिका की जिम्मेदारी कब होगी तय ?
रिपोर्ट के मुताबिक ये स्टडी सामाजिक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन को लेकर की गई है और इस स्टडी में ये पता लगाया गया है कि किस क्षेत्र में कितना कार्बन डायऑक्साइड या कितनी मात्रा में जहरीली गैस का उत्सर्जन होता है और उससे कितना नुकसान पहुंचता है। रिपोर्ट में इस बात पर विशेष ध्यान दिया गया है कि जहरीली गैसों के उत्पादन से किस स्तर तक जलवायु संकट पैदा हो रहा है और उससे कितने लोगों की मौत हो रही है। इस स्टडी में पता चला है कि तीन अमेरिकी मिलकर इतनी संख्या में जहरीली गैस का उत्पादन करते हैं, जिससे एक आदमी मारा जाता है। ये शोध कई सार्वजनिक स्वास्थ्य अध्ययनों के आधार पर किया गया है, ताकि यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि 2020 में हर 4,434 मीट्रिक टन CO2 उत्पादन से वैश्विक स्तर पर एक आदमी की समय से पहले मौत हो गई है।

मौतों के आंकड़ो में हो सकता है इजाफा
कोलंबिया विश्वविद्यालय के अर्थ इंस्टीट्यूट के डैनियल ब्रेस्लर, जिन्होंने इस स्टडी को लिखा है, उन्होंने कहा है कि कार्बन डायऑक्साइड के उत्सर्जन से जो मौतें हो रही हैं, वो तो निश्चित हैं, लेकिन अगर उसमें गर्मी और बाढ़ से होने वाली मौतों के आंकड़ों को भी जोड़ लिया जाए तो जो मौत का आंकड़ा स्टडी में बताया गया है, वो 'काफी कम' हो सकता है। क्योंकि, बाढ़, गर्मी और जलवायु परिवर्तन की वजह से उठने वाले समुद्री तूफान से भी बड़ी संख्या में लोगों की मौत हो जाती है और इसके पीछे भी पर्यावरण का बढ़ता तापमान जिम्मेदार है।

''सख्त नीति बनाना बेहद जरूरी''
द गार्डियन ने डैनियस ब्रेस्लर के हवाले से लिखा है कि ''अगर आप जलवायु परिवर्तन के लिए सख्त कानून बनाते हैं, और अगर उसे पालन किया जाता है, तो कई लोगों की जिंदगी को बचाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि, "मैं इस बात से हैरान हूं कि मौतों की संख्या कितनी ज्यादा है। वहीं, मौतों की संख्या अनिश्चित है और अगर वैश्विक स्तर पर इसकी गणना की जाए तो मौतों का आंकड़ा काफी ज्यादा बढ़ सकता है''। आपको बता दें कि इन आंकड़ों को दरकिनार कर अमेरिका हमेशा से विकासशील देशों पर प्रदूषण बढ़ाने का आरोप लगाता रहता है। भारत के ऊपर भी अमेरिका अपने विकासकार्यों को कम करते हुए कार्बन उत्सर्जन कम करने का दवाब बनाता है, लेकिन अमेरिका खुद क्या कर रहा है, इसकी पोल खोलने के लिए ये रिपोर्ट काफी है।












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