मददगार मधुमक्खियां

साल 2018 के शुरुआती तीन महीनों में फ़ोटोग्राफ़र जुर्रे रोंपा तंज़ानिया के जंगलों में घूमते हुए उन चुनिंदा लोगों से मिले जो कि तेज़ी से कम होते जा रहे तंजानियाई जंगलों को बचाने के लिए अपना दिन-रात एक किए हुए हैं.
तंज़ानिया के ज़ंज़ीबार द्वीपसमूह में घूमते हुए रोंपा का साबका उन मधुमक्खी पालने वालों से हुआ.
बीते कुछ सालों में खेती के लिए ज़मीन हासिल करने के लिए जंगलों को तेज़ी से काटा गया और अब इस द्वीपसमूह के कुछ भाग में ही जंगल बचे हैं.
ऐसे में जंगलों को एक बार फिर लगाने के प्रयास शुरू कर दिए हैं और इन प्रयासों में इन मधुमक्खी पालने वालों की अहम भूमिका है क्योंकि मधुमक्खियां पौधों में परागण की क्रिया को करने में सक्षम होती हैं.
जंगलों को आबाद करने की उनकी ये कोशिश व्यक्तिगत रूप से इनके लिए लिए फ़ायदेमंद होती भी दिख रही है क्योंकि ये लोग घने जंगलों में मधुमक्खियों के छत्ते लगाते हैं.
कभी गाय चराने वाले 60 वर्षीय किसान अली मनगुजा एक नर्सरी चलाते हैं.
वह अपने बचपन से मधुमक्खियां पाल रहे हैं और इससे जो शहद हासिल होता है उसे बेचकर वह अपनी नर्सरी के लिए पानी खरीदते हैं.
इस तरह से हासिल होने वाली अतिरिक्त आय मान्गुजा को उनके 11 लोगों के परिवार के भरण-पोषण में भी मदद करती है.
रोम्पा से बात करते हुए वह कहते हैं, "मैं ये काम तब तक करता रहूंगा जब तक मेरी ज़िंदगी रहेगी."
57 साल के मोहम्मद अब्दुला म्शती ऐसे ही एक दूसरे व्यक्ति हैं जो अतिरिक्त कमाई की ख़ातिर मधुमक्खियों को पालने में लगे हुए हैं.
वह बीते 30 सालों से एक किसान के रूप में काम कर रहे थे. इसके अलावा वह पॉल्ट्री फ़ार्मिंग का काम भी करते थे.
फ़ोटोग्राफ़र रोंपा से बात करते हुए वह कहते हैं, "पेंबा में शहद बहुत महंगा है और मिलना बहुत मुश्किल है. एक लीटर शहद की कीमत 24 हज़ार तंजानियाई शिलिंग यानी लगभग 600 रुपये है. हम शहद को दवाई की तरह भी इस्तेमाल करते हैं."












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