पेशावर ब्लास्ट: तालिबान के आने पर पाकिस्तान में बजी तालियां, TTP ने कैसे देश को बनाया अपाहिज?
पिछले साल टीटीपी ने पूरे पाकिस्तान में 150 से ज्यादा हमले किए। यानि, हर दूसरे दिन हमला किया, जिसमें ज्यादातर बार पुलिस फोर्स और सैनिकों को निशाना बनाया गया। इसे बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी का भी समर्थन हासिल है।

Peshawar Mosque: पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिमी पेशावर शहर की एक मस्जिद में सोमवार को नमाज़ के दौरान एक आत्मघाती हमलावर ने खुद को उड़ा लिया, जिसमें कम से कम 72 लोगों की मौत हो गई और 150 से ज्यादा घायल हो गए हैं। पिछले कुछ महीनों में पाकिस्तान में हुआ ये सबसे भीषण आतंकी घटना है, जिसने पूरे पाकिस्तान को कंपा दिया है। एसोसिएटेड प्रेस के मुताबिक, पाकिस्तानी तालिबान के एक कमांडर सरबकाफ मोहमंद ने ट्विटर पर हमले की जिम्मेदारी ली है। यानि, जिस आतंकवाद को सालों से पालता-पोषता आया है, वही आतंकवाद अब पाकिस्तान को हर दिन डंस रहा है।

पेशावर ब्लास्ट में 72 की मौत
जियो न्यूज के मुताबिक, पेशावर पुलिस लाइंस इलाके में मस्जिद के अंदर 300 से ज्यादा नमाजी नमाज पढ़ रहे थे, तभी आत्मघाती हमलावर ने अपने शरीर में बंधे विस्फोटक में विस्फोट कर लिया। कुछ ही पल में हर तरफ चीख-पुखार मची थी और हर तरफ घायलों का अंबार लगा था। जब धुएं का गुबार हटा, तो हर तरफ मातम पसरा था। 72 लोग मारे जा चुके थे और दर्जनों लोग अपने हाथ-पैर या शरीर का कोई अंग गंवा चुके थे। खैबर पख्तूनख्वा प्रांत की राजधानी पेशावर में किए गये आत्मघाती बम धमाके की जिम्मेदारी तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) ने ली है और ये हमला, हाल के वर्षों में पाकिस्तान में सुरक्षा बलों पर सबसे घातक हमलों में से एक था। इससे पहले जनवरी में, पेशावर में भारी हथियारों से लैस टीटीपी आतंकवादियों के एक समूह ने एक पुलिस थाने पर हमला कर तीन पुलिस अधिकारियों की हत्या कर दी थी। टीटीपी ने पिछले साल नवंबर में सरकार के साथ संघर्ष विराम समाप्त करने के घोषणा की थी, जिसके बाद से सुरक्षा बलों पर आतंकवादी हमले तेज हो गए हैं। आइए एक नजर डालते हैं टीटीपी की पहले की चेतावनियों, उसके संक्षिप्त इतिहास पर और कैसे 2021 में तालिबान के काबुल पर कब्जा करने के बाद से यह फिर से पाकिस्तान के लिए सिरदर्द बन गया है।

टीटीपी की पहले की चेतावनियां
4 जनवरी को, टीटीपी ने पाकिस्तान में सत्तारूढ़ गठबंधन के शीर्ष नेताओं को निशाना बनाने की धमकी दी थी और कहा था, कि अगर सरकार ने उसके खिलाफ किसी भी तरह का अभियान चलाया, तो फिर वो मंत्रियों और अधिकारियों को निशाना बनाया। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन) और विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो जरदारी के नेतृत्व वाली पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) को चेतावनी देते हुए प्रतिबंधित समूह ने एक बयान में कहा था, कि "अगर ये दोनों पार्टियां अपने स्थिति और सेना के गुलाम बने रहेंगे, तो उनके प्रमुख लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी"। जनवरी की शुरुआत में, पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने दावा किया था, कि अफगानिस्तान की मिट्टी का इस्तेमाल आतंकवादी समूहों द्वारा उनके देश पर हमले करने के लिए किया जा रहा है, जिसके बाद काबुल में तालिबान सरकार ने तीखी प्रतिक्रिया दी थी। अल जज़ीरा के मुताबिक, रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा था, कि "हमने अफगानिस्तान सरकार से बात की है और हम यह कहते रहेंगे कि ... उनकी मिट्टी का इस्तेमाल सीमा पार आतंकवाद के लिए किया जा रहा है।"
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तालिबान-पाकिस्तान में तनाव
यह टिप्पणी उसी दिन की गई थी, जब इस्लामाबाद ने अफगानिस्तान में टीटीपी के ठिकानों पर हमला करने की धमकी दी थी और बदले में तालिबान ने साफ शब्दों में कह दिया, कि पाकिस्तान किसी तरह का एडवेंचर ना करे। तालिबानी नेताओं ने भारत-पाकिस्तान के बीच हुए 1971 युद्ध में पाकिस्तानी सेनाओं के सरेंडर की तस्वीरें भी ट्वीट करनी शुरू कर दी और पाकिस्तान को एक तरह से चेतावनी दी, कि अगर पाकिस्तान ने लड़ाई शुरू की, तो उसका वही अंजाम होगा। अफगानिस्तान में "विद्रोहियों के ठिकानों" के खिलाफ कार्रवाई पर पाकिस्तान के आंतरिक मंत्री राणा सनाउल्लाह के बयान पर प्रतिक्रिया करते हुए, तालिबान के बड़े नेता अहमद यासिर ने सीरिया में कुर्दों पर तुर्की की बमबारी का जिक्र किया और अपने ट्वीट में चेतावनी देते हुए कहा, कि अफगानिस्तान न तो सीरिया है, और न ही पाकिस्तान तुर्की। उन्होंने अपने ट्वीट में कहा था, कि "यह अफगानिस्तान है, गर्वित साम्राज्यों का कब्रिस्तान। हम पर सैन्य हमले के बारे में न सोचें, अन्यथा भारत के सामने किए गये सरेंडर की शर्मनाक पुनरावृत्ति होगी।"

तालिबान पर हाथ मलता पाकिस्तान
तालिबान की धमकी के तुरंत बाद, पाकिस्तान की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद, जो टीटीपी और अन्य मुद्दों से खतरे को संभालने के तरीके पर चर्चा करने के लिए दो दिनों तक लगातार बैठकें कर रही थी, उसने एक मजबूत बयान देने की कोशिश की। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, किसी भी देश का नाम लिए बिना कहा गया है, कि "किसी भी देश को आतंकवादियों को अभयारण्य और सुविधा प्रदान करने की अनुमति नहीं दी जाएगी और पाकिस्तान के पास अपने लोगों की सुरक्षा के संबंध में सभी अधिकार सुरक्षित हैं।" बयान में आगे कहा गया, कि "पाकिस्तान की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया जा सकता है और पाकिस्तान की एक-एक इंच जमीन पर राज्य का पूरा अधिकार कायम रहेगा।" जिसके बाद तालिबान ने इस्लामाबाद के बयानों को "भड़काऊ और निराधार" कहा। अलजजीरा के मुताबिक, तालिबान ने कहा, कि उसकी सरकार "पूरी कोशिश कर रही है कि अफगानिस्तान के क्षेत्र का उपयोग पाकिस्तान या किसी अन्य देश के खिलाफ नहीं किया जाए।"

टीटीपी का संक्षिप्त इतिहास
कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस, यूएस-आधारित नॉनपार्टिसन इंटरनेशनल अफेयर्स थिंक टैंक कहते हैं, कि "तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) पाकिस्तान में सरकार के खिलाफ लड़ने वाला सबसे बड़ा उग्रवादी संगठन है।" वहीं, संयुक्त राष्ट्र ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है, कि अफगानिस्तान के अंदर टीटीपी के हजारों लड़ाके हैं। थिंक टैंक का कहना है, कि टीटीपी "पाकिस्तान की जिहादी राजनीति का को-प्रोडक्ट" है जो 2001 में अफगानिस्तान पर अमेरिकी आक्रमण के बाद हुआ था। तालिबान, साल 2007 में अस्तित्व में आया था, जिसके बारे में थिंक टैंक का कहना है, कि वो अफगान तालिबान का "विस्तारित" रूप है। यानि, अफगान तालिबान और पाकिस्तान तालिबान, दरअसल एक ही हैं। यानि, जिस अफगान तालिबान से पाकिस्तान तालिबान के खिलाफ कार्रवाई के लिए कहना हास्यास्पद है। अफगान तालिबान वर्षों से टीटीपी के लिए एक "स्वाभाविक राजनीतिक और संगठनात्मक मॉडल" बन गया है, लिहाजा पाकिस्तान के लिए टीटीपी को खत्म करना असंभव है।

टीटीपी का पाकिस्तान में मकसद क्या है?
टीटीपी का मकसद पाकिस्तान में वही शरिया कानून को लागू करना है, जो अफगानिस्तान में लागू किया गया है। अफगानिस्तान और पाकिस्तान की राजनीति और सुरक्षा के विशेषज्ञ अब्दुल सईद ने 2021 में कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस के लिए लिखा था, कि "हालांकि टीटीपी ने अपने उग्रवादी अभियान को पाकिस्तान के सैन्य अभियानों के खिलाफ एक रक्षात्मक युद्ध के रूप में तैयार किया था, लेकिन टीटीपी का मुख्य मकसद उसी नक्शेकदम पर चलकर पाकिस्तान में इस्लामिक शासन की स्थापना करना है, जिस रास्ते पर अफगान तालिबान चला है।" ये संगठन खैबर पख्तूनख्वा के कबायली इलाके, जिन्हें फेडरल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्राइबल एरिया (FATA) कहा जाता है, उसे राज्य से अलग करने की भी मांग करता है।

टीटीपी ने पाकिस्तान की नाक में किया दम
पेशावर में आर्मी पब्लिक स्कूल पर हमला करने और 134 बच्चों और शिक्षकों को मौत के घाट उतारने के बाद पाकिस्तान की सेना ने टीटीपी के खिलाफ सबसे गंभीर अभियान का संचालन शुरू किया था। भारी हथियारों से लैस पाकिस्तानी तालिबान लड़ाकों ने 16 दिसंबर 2014 को सैनिक स्कूल पर हमला किया था, जिसमें 150 लोग मारे गए थे, जिनमें से कम से कम 134 छात्र थे। पाकिस्तानी सेना के अनुसार, हमले में शामिल सभी सात आतंकवादी मारे गए। उस समय टीटीपी के कई नेता और लड़ाके अफगानिस्तान भाग गए थे। सबसे बड़ी दिक्कत ये है, कि पाकिस्तान के नेता और पाकिस्तान की सेना ने ही दर्जनों आतंकी संगठनों का निर्माण किया है और उनके दिमाग में जिहाद का जहर भरा है और अब लोग इतने जिहादी मानसिकता के हो गये हैं, कि पूरे पाकिस्तान में टीटीपी के समर्थक बैठे हैं, जो टीटीपी के जरिए पाकिस्तान में भी सख्त इस्लामिक शासन की स्थापना करने का सपना देख रहे हैं।

पाकिस्तान में टीटीपी का खौफ
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, तालिबान के काबुल अधिग्रहण के बाद से टीटीपी एक बार फिर पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिम कबायली इलाकों में सक्रिय हो गया है, जो खैबर पख्तूनख्वा प्रांत का हिस्सा है। अल जज़ीरा की रिपोर्ट में पाकिस्तान की निगरानी एजेंसियों का हवाला देते हुए कहा गया है, कि पिछले साल अकेले, पाकिस्तान भर में 150 से अधिक हमलों के लिए टीटीपी जिम्मेदार था, जिसमें कुछ सौ लोग मारे गए थे। 28 नवंबर 2022 को, टीटीपी के रक्षा प्रमुख मुफ्ती मुजाहिम ने पाकिस्तान के साथ संघर्ष विराम की समाप्ति की घोषणा की थी, और देशव्यापी हमलों का आह्वान किया था। तब से हमले तेज हो गए हैं, जिसमें इस्लामाबाद में एक आत्मघाती बम विस्फोट भी शामिल है जिसमें एक पुलिस अधिकारी की मौत हो गई।
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