आंख भी नहीं दिखनी चाहिए! अफगानिस्तानी महिलाओं के लिए तालिबान का नया फरमान, लगे पोस्टर्स
तालिबान देश में पूर्ण शरिया निर्धारित समाज की स्थापना करना चाहता है, जहां महिलाओं के पास कोई आजादी नहीं रहती है और तालिबान राज में महिलाएं जानवरों जैसी जिंदगी बिताने पर मजबूर हैं।
काबुल, मई 07: भुख और आर्थिक बदहाली से तपड़ते अफगानिस्तान में तालिबान ने महिलाओं के लिए नया फरमान जारी किया है और कहा है कि, अफगानिस्तान में रहने वाली औरतों की आंखे भी नहीं दिखनी चाहिए। महिलाओं के अधिकार को कुचलते हुए तालिबान ने शनिवार को एक नया फरमान जारी किया है, जिसमें अफगान महिलाओं को सार्वजनिक रूप से बुर्का पहनने का आदेश दिया गया है।

तालिबान का नया फरमान
डॉन की रिपोर्ट के मुताबिक, तालिबान प्रमुख हैबतुल्लाह अखुंदजादा ने यह फरमान जारी किया है और बाद में तालिबान अधिकारियों ने काबुल में एक समारोह में इसे जारी किया है। तालिबान प्रमुख हैबतुल्लाह अखुंदजादा ने फरमान जारी करते हुए कहा कि, 'उन्हें चदोरी (सिर से पैर तक बुर्का)' पहनना होगा, क्योंकि यह पारंपरिक और सम्मानजनक है'। हालांकि यह फरमान नया है और अगस्त में अफगानिस्तान की सत्ता में लौटने के बाद से तालिबान महिलाओं की तमाम आजादियों को छीन चुका है और उन्हें सिर से लेकर पैर तक बुरके में ढंकने के लिए मजबूर कर चुका है। इससे पहले तालिबान की धार्मिक पुलिस ने राजधानी काबुल के चारों ओर पोस्टर लगाकर अफगान महिलाओं को अपने ही घर में छिपकर रहने का आदेश दिया था।

अफगानिस्तान में लगाए गये पोस्टर
तालिबान के धार्मिक मंत्रालय के आदेश पर तालिबान के आतंकवादियों ने पूरे अफगानिस्तान में पोस्टर्स लगा दिए हैं, जिसमें सिर से पैर तक बुर्के में ढंकी महिलाओं की तस्वीर है। तस्वीर के साथ पोस्टर पर एक संदेश लिखा है, "शरिया कानून के मुताबिक मुस्लिम महिलाओं को हिजाब जरूर पहनना चाहिए।" तालिबान ने 1990 के दशक में अपने शासन के दौरान महिलाओं के लिए बुर्का पहनना अनिवार्य कर दिया था। काबुल में महिलाएं पहले से ही अपने बालों को स्कार्फ से ढकती हैं, हालांकि कुछ मामूली पश्चिमी कपड़े पहनती हैं। हालांकि, मीडिया आउटलेट के अनुसार, काबुल के बाहर बुर्का आम रहा है।

बुर्का नहीं पहनने पर सजा
अब, तालिबान इस नए फरमान के साथ अफगानिस्तान में हर महिला को पूरी तरह से बुर्का पहनने के लिए मजबूर कर रहा है। पिछले साल दिसंबर में, तालिबान ने एक और दमनकारी निर्देश जारी किया था और कहा था कि, सड़क मार्ग से लंबी दूरी की यात्रा करने वाली अफगान महिलाओं को अकेले यात्रा करने की इजाजत नहीं है और उनके साथ परिवार का कोई ना कोई पुरूष सदस्य का होना अनिवार्य है।

लड़कियों के लिए स्कूल बंद
इसके अलावा, तालिबान ने लड़कियों के लिए सभी माध्यमिक विद्यालयों को बंद करने का भी फैसला लिया है और अफगानिस्तान लड़कियों के लिए सभी स्कूलों को बंद कर दिया गया है। तालिबान शासन के इस फैसले की दुनिया भर में निंदा बढ़ गई थी। कई कार्यकर्ताओं और राजनीतिक दलों ने तालिबान से लड़कियों के लिए माध्यमिक विद्यालयों पर प्रतिबंध पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया है। मनोवैज्ञानिकों ने कहा है कि तालिबान द्वारा स्कूलों में जाने पर प्रतिबंध लगाने वाली छठी कक्षा से ऊपर की अफगान छात्राओं को इस कदम के कारण मानसिक तनाव का सामना करना पड़ रहा है। एचआरडब्ल्यू के अनुसार, महिलाओं और लड़कियों को भी स्वास्थ्य देखभाल तक पहुंचाने से रोक दिया गया है। रिपोर्टों से पता चलता है कि हिंसा का सामना करने वाली महिलाओं और लड़कियों के पास बचने का कोई रास्ता नहीं है।

गाड़ी चलाने पर भी प्रतिबंध
सुन्नी बहुल आबादी वाला अफगानिस्तान रूढ़िवादी और पितृसत्तात्मक देश है। लेकिन फिर भी अफगानिस्तान के कुछ बड़े शहरों में महिलाओं का गाड़ी चलाते हुए देखा जा सकता था। लेकिन, दो दिन पहले तालिबान ने महिलाओं के गाड़ी चलाने पर प्रतिबंध लगा दिया है और देश के परिवहन कार्यालयों को आदेश दिए हैं, कि वो महिलाओं को ड्राइविंग लाइसेंस जारी नहीं करें। हेरात भी ऐसे ही शहरों में शामिल है जहां महिलाएं गाड़ी चलाते दिख जाया करती थीं, लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। बता दें कि तालिबान ने दुबारा सत्ता हासिल करने के बाद अपने पिछले शासन की तुलना में ज्यादा नरम शासन का वादा किया था। लेकिन यह पहली बार नहीं है जब महिलाओं के अधिकारों पर अंकुश लगाया गया हो। तालिबान द्वारा विशेष रूप से लड़कियों और महिलाओं को निशाना बनाया जा रहा है। उन्हें माध्यमिक शिक्षा और कई सरकारी नौकरियों से भी बाहर कर दिया गया है।












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