तालिबान जबरन काबुल में नहीं घुसे, मैंने उन्हें बुलाया था: हामिद करज़ई
अफ़ग़ानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करज़ई ने कहा कि हिंसा और लूटपाट को रोकने के लिए उन्होंने तालिबान को राजधानी काबुल में प्रवेश करने के लिए कहा था.
हामिद करज़ई ने न्यूज़ एजेंसी एसोसिएटेड प्रेस को दिए एक साक्षात्कार में बताया, "तालिबान के नेताओं ने हमें आश्वासन दिया था कि उसके लड़ाके अफ़ग़ान राजधानी में प्रवेश नहीं करेंगे."
"लेकिन, अफ़ग़ानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी अपने सभी वरिष्ठ अधिकारियों के साथ अचानक काबुल से चले गए और तालिबान से समझौता नहीं हो सका."
इस साल अगस्त में अमेरिकी सेना के जाने के बाद तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान पर कब्ज़ा कर लिया था और तत्कालीन सरकार को सत्ता से हटा दिया था.
तालिबान लड़ाकों ने एक-एक कर काबुल के आसपास के क्षेत्रों को अपने नियंत्रण में ले लिया था और वो राजधानी के बाहर आकर रुक गए थे. उस समय तालिबान लड़ाकों के कभी भी राजधानी में प्रवेश करने की आशंका जताई जा रही थी.
तब अशरफ़ ग़नी ने अचानक अफ़ग़ानिस्तान छोड़ दिया और तालिबान ने 15 अगस्त को काबुल पर भी क़ब्ज़ा कर लिया.
तालिबान ने उस समय कहा था कि राजधानी में प्रवेश करने का उनका कोई ईरादा नहीं था, लेकिन शहर में अफ़रा-तफ़री और लूटपाट से बचने के लिए उन्होंने काबुल में क़दम रखा.
हामिद करज़ई ने कहा, "इसलिए अफ़ग़ानिस्तान में सरकारी ढांचा और सुरक्षा एजेंसियां पंगु हो गई थीं. उन्होंने ख़ुद तालिबान को काबुल में आने का न्योता दिया था."
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क्या थी असली योजना
हामिद करज़ई ने साक्षात्कार में बताया कि वो और अब्दुल्लाह अब्दुल्लाह दोहा में तालिबान नेताओं के संपर्क में थे और योजना ये थी कि तालिबान तत्कालीन सरकार के साथ राजनीतिक समझौते के आधार पर ही काबुल में प्रवेश करें.
उन्होंने कहा, "तालिबान के साथ राजनीतिक समझौते पर अंतिम फ़ैसला लेने के लिए मेरी और अब्दुल्लाह की 15 अगस्त को दोहा जाने की योजना थी."
करज़ई के मुताबिक़ दोपहर को ही राष्ट्रपति ग़नी के देश छोड़ने की अफ़वाहें उड़ने लगीं.
उन्होंने गृह मंत्री से बात की तो पता चला कि काबुल पुलिस प्रमुख सहित सभी अधिकारी राजधानी से चले गए हैं और सत्ता में कोई नहीं है.
हामिद करज़ई कहते हैं कि अगर राष्ट्रपति ग़नी देश में रहे होते तो तालिबान के साथ समझौता करने की और एक सिस्टम बनाने की संभावना रहती.
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ज़ाहिर शाह के समय का संविधान और लोया जिरगा
करज़ई ने कहा, "अब अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान का नियंत्रण है. अंतरराष्ट्रीय समुदाय को तालिबान से बातचीत करने और मानवीय तबाही को रोकने की ज़रूरत है."
"तालिबान को कभी-कभी ग़लत तरीके से पेश किया जाता है. उदाहरण के लिए ये सही नहीं है कि अफ़ग़ानिस्तान में महिलाएं घर से नहीं निकल सकतीं."
करज़ई ने बताया कि उन्होंने तालिबान को मौजूदा संकट से उबारने के लिए एक योजना दी है. इस योजना में लोया जिरगा का आयोजन और पूर्व शासक मोहम्मद ज़हीर शाह के समय के संविधान को अस्थायी रूप से लागू करना शामिल है. लोया जिरगा अगली सरकार, संविधान और राष्ट्रीय झंडे पर फ़ैसला ले सकती है.
हालांकि, उन्होंने कहा कि महिलाओं के काम करने के अधिकार, लड़के और लड़कियों के पढ़ने के अधिकार और जीवन के हर क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी ऐसे मामले हैं जिनसे समझौता नहीं किया जा सकता और इनकी सुरक्षा करनी चाहिए.
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ग़नी और तालिबान की स्थिति
काबुल छोड़ने के बाद अशरफ़ ग़नी ने कहा था कि उन्होंने देश में युद्ध और ख़ून-ख़राबे से बचने के लिए राजधानी से जाने का फ़ैसला लिया था.
उन्हें ख़ुफ़िया सूचना मिली थी कि तालिबान उन्हें मारना चाहता है.
वहीं, दूसरी तरफ़ तालिबान ने राजधानी में प्रवेश करने से पहले कहा था कि उनके लड़ाके राजधानी के बाहर ही रहेंगे और सत्ता हस्तांतरण के लिए बातचीत होगी.
राजधानी पर क़ब्ज़े के बाद तालिबान ने अपनी अंतरिम सरकार की घोषणा कर दी है. वह अफ़ग़ानिस्तान के झंडे की जगह अपना सफ़ेद झंडा इस्तेमाल कर रहे हैं.
हामिद करज़ई ने भले ही तालिबान को सुझाव दिया हो, लेकिन अभी तक उन्होंने लोया जिरगा और समावेशी सरकार में कोई रुचि नहीं दिखाई है.
लेकिन, अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद विश्लेषक, राजनेता और अंतरराष्ट्रीय समुदाय का मानना है कि तालिबान की सरकार एक गठबंधन सरकार नहीं है. इसमें महिलाओं की भी भागीदारी नहीं है.
तालिबान अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मान्यता पाने की कोशिश में लगे हैं, लेकिन अभी तक किसी भी देश ने उन्हें मान्यता नहीं दी है.
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