ताइवान में राष्ट्रपति अमेरिका का, संसद में चीन समर्थक पार्टियों को बहुमत.. जिनपिंग बनाम बाइडेन में कौन जीता?
Taiwan Election: ताइवान के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति विलियम लाई को बिना किसी संसदीय बहुमत के कार्यालय में चार साल के कठिन कार्यकाल का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि ताइवान की संसद में चीन समर्थित विपक्षी पार्टी ने बहुमत हासिल कर लिया है, जो चीन के साथ फिर से व्यापार समझौतों को शुरू करना चाहती है।
ताइवान के ऊपर हमेशा बीजिंग से सैन्य खतरे का तलवार लटकता रहता है और इस बीच ताइवान के इलेक्शन के नतीजे काफी दिलचस्प हो गये हैं। क्योंकि, अगला राष्ट्रपति अमेरिका समर्थक, तो संसद चीन समर्थक होने वाली है।

ताइवान की सत्तारूढ़ डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (डीपीपी) के विलियम लाई ने शनिवार को हुए चुनाव में भारी बहुमत से जीत हासिल कर ली, लेकिन उनकी पार्टी ने संसद पर नियंत्रण खो दिया है, लिहाजा अब अगले चार सालों तक विलियम लाई को संसद में कोई भी कानून पारित करवाने के लिए, या फिर ताइवान को चलाने के लिए खर्च करने के लिए विपक्षी पार्टी पर निर्भर रहना होगा।
विलियम लाई, जो फिलहाल देश के उप-राष्ट्रपति हैं, वो 20 मई को अपने राष्ट्रपति पद के कार्यकाल की शुरूआत करेंगे।
चुनावी नतीजों के बाद चीन के ताइवान मामलों के कार्यालय ने बयान जारी करते हुए, डीपीपी के विलियम लाई की जीत पर कहा, कि "डीपीपी, ताइवान की मुख्यधारा की जनता की राय का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती है।" हालांकि, चीन ने विलियम लाई का नाम नहीं लिया, लेकिन उन्हें अप्रत्यक्ष तौर पर अलगाववादी करार दिया।
वहीं, डीपीपी के पूर्व उप महासचिव लिन फी-फैन, जो अब पार्टी थिंक टैंक के वरिष्ठ सदस्य हैं, उन्होंने रॉयटर्स को बताया, कि वह "काफी चिंतित" हैं कि नई सरकार के चार साल "बहुत कठिन" होंगे, खासकर चीन से संबंधित मुद्दों को लेकर।
राष्ट्रपति पर कैसे प्रेशर बना सकता है चीन?
लिन फी-फैन ने कहा, कि "विपक्षी सांसद, जो मिलकर विधायी बहुमत बनाते हैं, वो अब चीन के साथ आदान-प्रदान बढ़ा सकते हैं और विवादास्पद सेवा व्यापार समझौते को फिर से शुरू करने के लिए कह सकते हैं, जिसे ताइवान ने एक दशक पहले बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन के कारण स्थगित कर दिया था।"
उन्होंने कहा, "यही बात हमें चिंतित करती है। स्थानीय सरकारें और संसद, केंद्र सरकार पर दबाव बनाने के लिए एक लाइन बना सकती हैं।"
आपको बता दें, कि ताइवान की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कुओमितांग (केएमटी) और ताइवान पीपुल्स पार्टी (टीपीपी) दोनों ने व्यापार सेवा समझौते को फिर से शुरू करने के लिए अभियान चलाया है और अब संसद में इन दोनों पार्टियों को बहुमत हासिल हो गया है।
हालांकि, फिलहाल इन दोनों विपक्षी पार्टियों ने साफ नहीं किया है, कि वो संसद में एकसाथ आएंगे या नहीं, लेकिन टीपीपी के अध्यक्ष वेन-जे ने शनिवार को कहा, कि वे "महत्वपूर्ण अल्पसंख्यक" की भूमिका निभाएंगे।
राष्ट्रपति चुनाव में पराजित केएमटी उम्मीदवार होउ यू-इह ने रविवार को दोनों दलों के एक साथ आने के सवाल का सीधे तौर पर जवाब नहीं दिया और केवल इतना कहा, कि "विपक्षी दलों पर विपक्षी दल होने की जिम्मेदारी है"।
वहीं, चीन ने विलियम लाई के बातचीत के आह्वान को खारिज कर दिया है। विलियम लाई और उनकी पार्टी, बीजिंग के संप्रभुता के दावों को खारिज करती है और कहती है कि केवल ताइवान के लोग ही अपना भविष्य तय कर सकते हैं।
वहीं, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स के पूर्व संपादक हू ज़िजिन, जो एक प्रमुख चीनी टिप्पणीकार हैं, उन्होंने एक सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा है, कि यह अप्रासंगिक है कि जब अंततः द्वीप को चीनी नियंत्रण में लाने की बात आई तो ताइवानियों ने किसे वोट दिया?
उन्होंने लिखा, "मुख्य भूमि की ताकत पहले से ही यहां है, और देश के पुनर्एकीकरण को पूरा करने के लिए 1.4 अरब लोगों की इच्छा भी यहां है। ताइवान के स्थानीय चुनाव कौन जीतता है, यह निश्चित तौर पर महत्वपूर्ण बात नहीं है।"

चीन के पास अब क्या विकल्प हैं?
ताइवान को चीन अपना पवित्र क्षेत्र कहता है और चीन का कहना है, कि एकीकरण के लिए वो बल प्रयोग की संभावनाओं से इनकार नहीं करता है।
चीन में सूचो विश्वविद्यालय के प्रोफेसर विक्टर गाओ ने कहा, कि 60% मतदाताओं ने विलियम लाई का समर्थन नहीं किया और केएमटी ने संसद में ज्यादा सीटें जीतीं हैं, जिसका अर्थ है, कि चुनावों ने "तूफान पैदा नहीं किया है"।
उन्होंने कहा, कि "यह बहुत स्पष्ट है, कि चीन के पास शांतिपूर्ण पुनर्मिलन को बढ़ावा देने और ताइवान की स्वतंत्रता के लिए किसी भी प्रयास के प्रति शून्य-सहिष्णुता को बढ़ावा देने के लिए असीमित धैर्य है। अंत में, ट्रिगर खींचने वाली पार्टी चीन नहीं होगी, बल्कि वे लोग होंगे, जो ताइवान की स्वतंत्रता के लिए दबाव डालेंगे।"
यानि, चीन का मानना है, कि ताइवान के अंदर से चीन के साथ एकीकरण के लिए आवाज फैले, इसका वो ज्यादा इंतजार नहीं करेगा। लेकिन, फिलहाल अगले चार सालों तक चीन के साथ अच्छे संबंधों का वकालत करने वाली पार्टियों ने बहुमत हासिल कर लिया है, लिहाजा अब यह तय है, कि अगले चार साल, अमेरिका समर्थित विलियम लाई के लिए सरकार चलाना आसान नहीं होगा, और चीन, संसद के जरिए उनके रास्ते को काफी ज्यादा मुश्किल बना देगा।












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