अगर चीन ताइवान पर आक्रमण करता है, तो QUAD क्या करेगा? क्या भारत होगा लड़ाई में शामिल?
नैन्सी पेलोसी की ताइवान यात्रा के साथ ही ये तय हो गया है, कि इंडो-पैसिफिक, जिसमें खुद भारत है और भारत के कमजोर पड़ोसी हैं, वहां चीन काफी आक्रामक तरीके से आगे बढ़ रहा है।
नई दिल्ली, अगस्त 03: यूएस हाउस ऑफ रिप्रजेंटिव की अध्यक्ष नैन्सी पेलोसी ताइवान के दौरे पर हैं और उनके दौरे से बौखलाए चीन ने साफ कर दिया है, कि अब वो ताइवान को चीन में मिलाने की एकीकरण प्रक्रिया को काफी तेज करेगा। यानि, अगर फिलहाल युद्ध ना भी हो, तो भी आने वाले निकट भविष्य में ताइवान पर चीन का हमला निश्चित है, लिहाजा सवाल ये उठता है, कि इंडो-पैसिफिक में जिस चीन को रोकने के लिए क्वाड का निर्माण हुआ था, वो ताइवान पर चीनी हमले की सूरत में क्या करेगा? और चूंकी भारत क्वाड का एक अहम हिस्सा है, लिहाजा सवाल ये भी हैं, कि क्या भारत इस लड़ाई में शामिल होगा?

क्या ताइवान का साथ देगा QUAD?
नैन्सी पेलोसी की ताइवान यात्रा के साथ ही ये तय हो गया है, कि इंडो-पैसिफिक, जिसमें खुद भारत है और भारत के कमजोर पड़ोसी हैं, वहां चीन काफी आक्रामक तरीके से आगे बढ़ेगा और आने वाले वक्त में इंडो-पैसिफिक को लेकर जियो-पॉलिटिक्स तेजी से बदलेगी। क्वाड के चार सदस्य देश, भारत, ऑस्ट्रेलिया, जापान और अमेरिका... इन चारों देशों के ताइवान के साथ अच्छे संबंध हैं और ये चारों देश लोकतांत्रिक हैं ताइवान भी एक लोकतांत्रिक देश है, लिहाजा, ताइवान और क्वाड, दोनों के पास एक-दूसरे के साथ संबंध बढ़ाने के कारण हैं, क्योंकि चीन क्षेत्रीय आधिपत्य का पीछा कर रहा है और नियम-आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के लिए दीर्घकालिक चुनौती पेश कर सकता है।

क्वाड के पास नहीं हैं कोई और विकल्प?
एक्सपर्ट्स का मानना है, कि अगर ताइवान को बचाने में ये देश नाकाम रहते हैं, तो फिर इंडो-पैसिफिक में चीन की शक्ति इतनी ज्यादा बढ़ जाएगी और वो इतना ज्यादा आक्रामक हो जाएगी, कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उसके वर्चस्व को चुनौती देना करीब करीब असंभव हो जाएगा। लेकिन, अमेरिका को छोड़कर क्वाड के बाकी देश चीन को लेकर रियायत बरत रहे हैं और अपने अपने हितों को देखते हुए चुप हैं। जैसे अभी तक ताइवान तनाव पर भारत की तरफ से कोई खास प्रतिक्रिया नहीं आई है, जबकि ये सबकुछ भारत के पड़ोस में हो रहा है और इसका सीधा असर आने वाले वक्त में भारत पर ही पड़ेगा। डिप्लोमेट की रिपोर्ट के मुताबिक, खराब संबंध होते हुए भी क्वाड के बाकी सदस्य राष्ट्र बीजिंग से अच्छा संबंध बनाना चाहते हैं और बीजिंग इस बात को जानता है, जैसे भारत की नरेन्द्र मोदी सरकार ने गलवान घाटी हिंसा से पहले तक चीन को लेकर काफी नरमी बरती।

क्या चीन को लेकर QUAD होगा सतर्क?
वहीं, जब चीन के व्यवहार की भविष्यवाणी करने की बात आती है, तो क्वाड को सतर्क रहना चाहिए। खासकर अनिवार्य रूप से उस वक्त, जब चीन के हितों की बात आती है और आप उससे कुछ रियायत की उम्मीद कर रहे हों। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने जोर देकर कहा है, कि ताइवान का चीन में "एकीकरण" उनका एक ऐतिहासिक मिशन है और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की एक अटल प्रतिबद्धता है। ताइवान जलडमरूमध्य में बीजिंग की उत्तेजक कार्रवाइयां, जैसे कि ताइवान के वायु रक्षा क्षेत्र में सैन्य विमानों की घुसपैठ और ताइवान जलडमरूमध्य के माध्यम से युद्धपोतों को संचालन करना, चीन की क्षमता को प्रदर्शित करने के लिए है, ताकि वह दूसरे देशों को अपनी ताकत दिखाने के साथ साथ उन्हें चेतावनी दे सके। इसके अलावा, यूक्रेन पर रूसी हमले ने सीधे तौर पर चीन को ताइवान पर हमला करने के लिए प्रोत्साहित किया है और भले ही फिलहाल इसकी संभावना कम हो, लेकन इसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है। इसलिए, ताइवान और चीन के बीच डीप फ्रीज जारी रहने या यहां तक कि तेज होने की संभावना है और आने वाले वक्त में संघर्ष तेज होने की पूरी संभावना है।
Koo AppU.S. House Speaker Nancy Pelosi on Wednesday (Aug. 3) met with President Tsai Ing-wen (蔡英文), who presented her with a special award. At a meeting held in the Office of the President, Tsai presented Pelosi with the Order of Propitious Clouds with Special Grand Cordon. Tsai said the award represented gratitude to Pelosi and to express Taiwan‘s wish for more cooperation. - Taiwan in India (@twinindia) 3 Aug 2022
कौन करेगा लोकतंत्र की रक्षा?
ताइवान विश्व का एक उदार लोकतंत्र है और क्वाड के सदस्यों के साथ लोकतांत्रिक मूल्यों को साझा करता है, लिहाजा ताइवान की रक्षा करना लोकतांत्रिक देशों का प्रमुख कर्तव्य हो जाता है और ताइवान इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट के अनुसार एशिया में आठवां सर्वश्रेष्ठ लोकतांत्रिक देश है। लिहाजा, यदि बीजिंग ताइवान को बलपूर्वक कब्जा करने में सफल होता है, तो सबसे पहले वो ताइवान के लोकतंत्र को उखाड़ कर फेंकेगा, जैसा उसने हांगकांग में किया है और चीन के सत्तावादी मॉडल की विजय को ताइवान में प्रदर्शित करेगा और संभवतः एशिया में यूक्रेन जैसा संकट पैदा करेगा। संक्षेप में समझें तो, ताइवान की सुरक्षा को मजबूत करने से, क्वाड को इंडो-पैसिफिक में लोकतांत्रिक देशों का समर्थन करने और चीन की आक्रामकता को संतुलित करने के अपने "वादे" को प्राप्त करने में मदद मिलेगी।

चीन को रोकने के लिए क्वाड क्या करेगा?
क्वाड सदस्यों के बीच मजबूत संबंध चीन को ताइवान पर हमला करने के अपने इरादे पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर सकते हैं और क्वाड समूह ने राजनयिक संबंधों को मजबूत करके, व्यापार विस्तार को सुविधाजनक बनाकर और सदस्यों के बीच एक खुफिया-साझाकरण नेटवर्क पर सहयोग करके अपने भीतर के संबंधों को बढ़ाया है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में "स्थिरता और समृद्धि को बढ़ावा देने" के लिए, ब्लॉक ने चीनी कार्यों की अपनी निगरानी क्षमताओं को मजबूत करने पर जोर दिया है। खासकर सैन्य ताकत को बढ़ाने पर भी क्वाड देशों का जोर रहा है, लिहाजा ऑस्ट्रेलिया, भारत और जापान अपनी नौसेना ताकत को बढ़ा रहे हैं। फिर भी, अगर चीन को जबरदस्ती संतुलित करने की बात आती है, तो क्वाड के प्रयास अभी भी अधूरे ही दिखते हैं और संकल्पों में अभी भी कमी ही दिखती है। क्योंकि, क्वाड अभी भी अपने आप को नाटो की तरह सैन्य गठबंधन नहीं कहता है और अपने आपको एक 'अच्छा फोर्स' कहता है, जिसका उद्येश्य आपसी सहायता है, जिसकी वजह से आलोचक क्वाड की आलोचना भी करते हैं। इसलिए, सैन्य संकट या संघर्ष की स्थिति में क्वाड ताइवान का कितना समर्थन कर सकता है, विशेष रूप से जब चीन ने गंभीर परिणामों की चेतावनी दी है, ये सवाल उठ रहे हैं।

क्या ताइवान की रक्षा करेगा क्वाड?
ताइवान के समर्थन पर क्वाड की धारणाएं एकजुट नहीं हैं। मई में, जापानी प्रधानमंत्री किशिदा फुमियो ने रेखांकित किया था कि "ताइवान जलडमरूमध्य में शांति और स्थिरता न केवल जापान की सुरक्षा के लिए बल्कि, अंतर्राष्ट्रीय समाज की स्थिरता के लिए भी महत्वपूर्ण है।" उन्होंने "बल द्वारा यथास्थिति को बदलने" के चीन के प्रयास का विरोध करने के लिए ब्लॉक से समन्वित प्रतिक्रिया का भी आग्रह किया था। हाल ही में, जापान के 2022 रक्षा श्वेत पत्र ने ताइवान को टोक्यो के "अत्यंत महत्वपूर्ण भागीदार" के रूप में बताया, जबकि इस बात पर जोर दिया, कि ताइवान के आसपास की सुरक्षा पर "तत्काल की भावना के साथ बारीकी से निगरानी की जानी चाहिए।"

'वन चायना पॉलिसी' का क्या करेगा अमेरिका?
अमेरिका के आधिकारिक तौर पर "वन चाइना पॉलिसी" पर अपना रुख बनाए रखने के बावजूद, अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने ताइवान पर आक्रमण करने के लिए ताइवान पर सैन्य रूप से रक्षा करने का संकल्प लिया है। अमेरिका में ताइवान को लेकर 'ताइवान संबंध अधिनियम' भी पास किया गया और अमेरिका ने साफ तौर पर कहा है, कि अगर ताइवान पर हमला किया जाता है, तो अमेरिका ताइवान की सैन्य मदद करेगा। शांगरी-ला डायलॉग में, अमेरिकी रक्षा सचिव लॉयड ऑस्टिन ने चीन की ताइवान को लेकर उत्तेजक गतिविधियों की निंदा की और "बल के किसी भी उपयोग या अन्य प्रकार के जबरदस्ती का विरोध करने के लिए वाशिंगटन की प्रतिबद्धता को रेखांकित किया जो ताइवान के लोगों की सुरक्षा या सामाजिक या आर्थिक व्यवस्था को खतरे में डाल देगा। वहीं, अमेरिकी नौसेना के युद्धपोत ताइवान स्ट्रेट में मौजूद हैं और वाशिंगटन की "एक स्वतंत्र और खुले इंडो-पैसिफिक" क्षेत्र के प्रति प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करते हैं।
ताइवान पर क्या होगा भारत का रूख?
क्वाड देशों में सिर्फ भारत ही एकमात्र सदस्य देश है, जिसने अभी तक सार्वजनिक रूप से ताइवान को क्वाड में शामिल होने का समर्थन किया है। भारत के लिए ताइवान का महत्व राजनीतिक से ज्यादा आर्थिक है। भारतीय नेताओं की नजर में, नई दिल्ली पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, यदि वह चीन के साथ अपनी विकासात्मक साझेदारी को छोड़ देता है। आंतरिक रूप से, भारत और चीन - विकासशील शक्तियों के लिए ब्रिक्स मंच के दोनों सदस्य और साथ ही शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के भी सदस्य हैं, लेकिन इसकी संभावना काफी कम है, कि चीन के साथ काफी ज्यादा तनाव होने के बाद भी भारत मौखिक तौर पर ताइवान का समर्थन करेगा, जिससे नई दिल्ली का बीजिंग के साथ संबंध कमजोर होगा, लिहाजा इस बात की उम्मीद न्यूनतम है, कि ताइवान पर हमले की स्थिति में भारत 'शांति की अपील' के अलावा कोई और मदद ताइवान को देगा, भले ही भारत और चीन आपस में दुश्मन क्यों ना हों।












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