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Strait of Hormuz से गुजरने वाले जहाजों पर क्या Iran शुल्क वसूल सकता है? भारत पर क्या असर? समझें

Strait of Hormuz Charge: ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच 28 फरवरी 2026 से शुरू हुई जंग अब 38वें दिन को पार कर चुकी है। युद्ध खत्म करने के लिए ईरान ने एक नया और विवादास्पद प्रस्ताव रखा है कि होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले हर जहाज पर शुल्क वसूलना। तेहरान का कहना है कि किसी भी स्थायी शांति समझौते में इसे शामिल किया जाए। रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर बताया कि शुल्क जहाज के प्रकार, माल की मात्रा और अन्य स्थितियों पर निर्भर करेगा।

यह प्रस्ताव इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति का सबसे संवेदनशील गला है। अगर ईरान यहां शुल्क लगाने में सफल हो गया तो वैश्विक तेल व्यापार, भारत जैसी आयातक अर्थव्यवस्थाओं और खाड़ी देशों पर गहरा असर पड़ेगा। होर्मुज क्या है, ईरान का प्रस्ताव क्या कहता है, अंतरराष्ट्रीय कानून क्या कहता है, अन्य देशों की प्रतिक्रिया क्या है, पहले ऐसा कभी हुआ है या नहीं, और सबसे अहम कि भारत पर इसका क्या असर पड़ेगा? आइए स्टेप-बाई-स्टेप समझते हैं...

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होर्मुज जलडमरूमध्य: दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण 34 किलोमीटर

होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) ईरान और ओमान के बीच स्थित है। इसकी चौड़ाई सिर्फ 34 किलोमीटर (21 मील) है। यह फारस की खाड़ी को हिंद महासागर से जोड़ता है। दुनिया का लगभग 20% तेल (एक-पांचवीं हिस्सा) इसी रास्ते से गुजरता है। इसके अलावा उर्वरक, LNG और अन्य जरूरी सामान भी इसी मार्ग से आते-जाते हैं।

युद्ध के दौरान ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कोर ने इस जलडमरूमध्य को अवरुद्ध कर दिया था। नतीजा ये है कि बहुत कम जहाज गुजर पाए। कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि एक जहाज को पारगमन के लिए 2 मिलियन डॉलर तक चुकाने पड़े, हालांकि रॉयटर्स ने इसकी पुष्टि नहीं की।

ईरान का प्रस्ताव: शांति के बदले शुल्क

ईरान का कहना है कि युद्ध समाप्त करने वाले किसी भी स्थायी समझौते में होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर शुल्क लगाने की अनुमति होनी चाहिए। ईरान के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबदी ने पिछले सप्ताह कहा कि तेहरान ओमान के साथ एक प्रोटोकॉल का मसौदा तैयार कर रहा है। इसके तहत हर जहाज को परमिट और लाइसेंस लेना अनिवार्य होगा।

ईरानी अधिकारी का दावा है कि इसका मकसद पारगमन को प्रतिबंधित करना नहीं, बल्कि सुविधाजनक बनाना है। शुल्क जहाज के आकार, माल की प्रकृति और अन्य प्रचलित शर्तों पर आधारित होगा। ईरान इसे 'सेवा शुल्क' के रूप में पेश कर रहा है, न कि पारगमन टैक्स के रूप में।

Oman की भूमिका: बातचीत हुई, लेकिन समझौता?

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ओमान ने कहा कि उसने ईरान के साथ सुगम पारगमन सुनिश्चित करने के विकल्पों पर चर्चा की है। लेकिन ओमान ने स्पष्ट नहीं किया कि कोई औपचारिक समझौता हुआ है या नहीं। ओमान दोनों देशों का मध्यस्थ रह चुका है, इसलिए उसकी भूमिका अहम है।

अंतरराष्ट्रीय कानून (International Law) क्या कहता है? UNCLOS का फैसला

संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून सम्मेलन (UNCLOS) इस मामले का सबसे बड़ा कानूनी आधार है। इसमें साफ लिखा है कि अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों पर तटीय राज्य राज्य और सीमावर्ती देश ईरान और ओमान केवल पारगमन के लिए शुल्क नहीं मांग सकते।

हालांकि, कुछ विशिष्ट सेवाओं (जैसे पायलटिंग, टगिंग या पोर्ट सेवाएं) के लिए सीमित शुल्क लिया जा सकता है। लेकिन ये शुल्क किसी एक देश के जहाजों पर भेदभावपूर्ण नहीं हो सकते। UNCLOS के मुताबिक, होर्मुज जैसे प्राकृतिक जलडमरूमध्य में ट्रांजिट पैसेज का अधिकार है। यानी जहाज बिना रुकावट गुजर सकते हैं।

पहले ऐसा कहीं हुआ है? नहरें vs जलडमरूमध्य

  • सुएज नहर (मिस्र) और पनामा नहर: ये मानव-निर्मित हैं, इसलिए शुल्क लिया जाता है।
  • तुर्की जलडमरूमध्य (बोस्फोरस, डार्डानेल्स): 1936 के मॉन्ट्रो कन्वेंशन के तहत तुर्की सेवाओं की लागत कवर करने के लिए मानकीकृत शुल्क ले सकता है, लेकिन सामान्य पारगमन शुल्क नहीं।
  • सिंगापुर जलडमरूमध्य: सिंगापुर कोई पारगमन शुल्क नहीं लेता।

ईरान का प्रस्ताव एकतरफा है, जो आधुनिक इतिहास में अनोखा होगा। जहाजरानी उद्योग के अधिकारियों का कहना है कि किसी जलडमरूमध्य पर इस तरह का शुल्क पहले कभी नहीं लगाया गया।

खाड़ी देशों की चिंता: 'कोई भी देश इसे बंधक नहीं बना सकता'

  • संयुक्त अरब अमीरात: सप्ताहांत में कहा कि जलमार्ग को 'किसी भी देश द्वारा बंधक' नहीं बनाया जा सकता। शांति समझौते में स्वतंत्र नौवहन शामिल होना चाहिए।
  • कतर: सभी देशों को जलडमरूमध्य का स्वतंत्र उपयोग का अधिकार है। कोई भी वित्तीय तंत्र चर्चा बाद में की जाए, जब जलमार्ग फिर खुल जाए।

अमेरिका का रुख: ट्रंप का साफ संदेश

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को कहा कि ईरान के साथ किसी भी शांति समझौते में तेल की निर्बाध आवाजाही शामिल होनी चाहिए। ट्रंप का पूरा फोकस होर्मुज को बिना किसी शुल्क या बाधा के खुला रखने पर है।

क्या ईरान वाकई शुल्क लगा पाएगा? व्यावहारिक चुनौतियां

विशेषज्ञों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय विरोध के बावजूद ईरान को शुल्क लगाने के लिए मजबूत सैन्य और राजनयिक समर्थन चाहिए। होर्मुज को खुला रखने के लिए कोई भी कार्रवाई ईरानी तट पर लंबा जमीनी अभियान मांग सकती है। राजनयिक रूप से चीन सबसे बड़ा प्रभाव डाल सकता है। चीन ईरान का बड़ा तेल खरीदार है और जलडमरूमध्य से गुजरने वाले तेल का सबसे बड़ा आयातक है।

भारत पर क्या असर? ऊर्जा सुरक्षा का सबसे बड़ा सवाल

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है। उसका 80% से ज्यादा कच्चा तेल होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर आता है। अगर ईरान शुल्क लगाता है तो, तेल की कीमतें बढ़ेंगी। महंगाई बढ़ेगी। अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। भारत ने हमेशा नौवहन की स्वतंत्रता (Freedom of Navigation) का समर्थन किया है। मतलब कि भारत अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानूनों का पालन करते हुए समुद्र में सभी देशों के जहाजों (व्यापारिक और सैन्य) की निर्बाध आवाजाही के पक्ष में है। लेकिन ईरान के साथ पुराने संबंधों के कारण वह सावधानी बरत रहा है। भारत इस पूरे मामले में बैलेंस्ड पोजीशन अपनाए हुए है।

कानून vs हकीकत क्या?

अंतरराष्ट्रीय कानून (UNCLOS) साफ कहता है कि प्राकृतिक जलडमरूमध्य पर पारगमन शुल्क नहीं लगाया जा सकता। लेकिन हकीकत अलग है। ईरान युद्ध के बाद अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। अगर शांति समझौते में यह प्रावधान शामिल हो गया तो वैश्विक व्यापार का नया नियम बन सकता है। खाड़ी देश, अमेरिका और यूरोप इसका विरोध कर रहे हैं। चीन और रूस ईरान के करीबी हैं।

नतीजा ये है कि होर्मुज फिर से विवाद का केंद्र बन गया है। भारत के लिए यह चुनौती है। हमें अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए वैकल्पिक मार्ग (जैसे रूस से तेल, UAE से पाइपलाइन) और मजबूत डिप्लोमेसी की जरूरत है। अभी स्थिति तनावपूर्ण है। 48 घंटे का अल्टीमेटम खत्म होने वाला है। क्या ईरान शुल्क लगाने में सफल होगा? या अंतरराष्ट्रीय दबाव उसे रोक देगा? ये वक्त बताएगा।

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