रूस के हमले में बची यूक्रेन की महिला कैसे बनी झूठे रूसी दावों का शिकार
यूक्रेन में चेर्निहीव के एक स्कूल पर हुए हवाई हमले के बाद वहां के सोशल मीडिया पर ख़ून से लथपथ एक महिला का वीडियो वायरल हो गया.
हालांकि उनकी स्टोरी को जल्द ही रूस समर्थक सोशल मीडिया एकाउंटों ने हाइजैक कर लिया. उन्हीं एकाउंट में से एक रूसी विदेश मंत्रालय का भी था. सोशल मीडिया पर उस स्टोरी को 'फ़ेक' यानी नकली होने के झूठे आरोप लगाए गए.
उस हमले के बारे में तानिया कहती हैं, "कोई व्हिसल, हलचल या गोलाबारी की आवाज़ नहीं हुई. बस कुछ इमारत से टकराया और फिर चारों ओर अंधेरा छा गया. वो इमारत ढह गई थी."
असल में मार्च के शुरू में तानिया एक हवाई हमले की चपेट में आ गई थीं. वो कीएव के उत्तर में स्थित चेर्निहीव के स्कूल नंबर 21 में एक मानवीय सहायता अभियान के तहत कपड़े चुनने में मदद कर रही थीं. उसी समय एक मिसाइल स्कूल की इमारत से आ टकराई.
हालांकि अधिकारियों ने उस स्कूल का नाम नहीं बताया, लेकिन बीबीसी ने सोशल मीडिया ऐप टेलीग्राम पर डाली गई तस्वीरों के ज़रिए उस जगह की पुष्टि कर ली.
उस दिन यूक्रेन के अधिकारियों ने बताया था कि रूस के विमानों ने दो स्कूलों पर हमला किया, जिसमें 9 लोग मारे गए जबकि 4 लोग घायल हो गए.
उस हमले में तानिया बेहोश हो गई थीं. वो कहती हैं कि जब उन्हें होश आया, तो महसूस किया कि वो जीवित हैं और चल सकती हैं.
वो उठ खड़ी हुईं तो पाया कि चारों ओर लोग बड़ी दहशत में थे. उन्होंने फ़र्श पर पड़े शव भी देखे. उनमें से एक महिला हमले के ठीक पहले उनके बगल में ही खड़ी थीं.
ऐसे माहौल में वो डरकर अपने घर चली गईं.
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वहां जाकर उन्होंने अपने इंस्टाग्राम एकाउंट पर एक वीडियो पोस्ट किया. उस वीडियो में वो वैसे ही ख़ून से लथपथ थीं और उनके चेहरे पर चोटों के निशान दिख रहे थे. वीडियो में उन्होंने बताया था कि उनके साथ आख़िर हुआ क्या था.
उस वीडियो क्लिप में वो कह रही थीं, "मैं स्कूल नंबर 21 में थी जब विस्फोट हुआ. इसमें मैं बच गई. सभी को गुडलक. मुझे लगता है कि आप मुझसे ज़्यादा भाग्यशाली हैं."
"मैं यह स्टोरी क्यों रिकॉर्ड कर रही हूँ? सिर्फ़ इसलिए कि उस स्कूल में बहुत से बच्चे थे. मुझे नहीं पता कि वे ज़िंदा बचे हैं या नहीं. इस वीडियो को बस अपने रूस के सभी दोस्तों को भेजें."
कुछ ही घंटों में उनका वो वीडियो यूक्रेन में वायरल हो गया. इस क्लिप को केवल इंस्टाग्राम पर ही हज़ारों बार देखा गया और यूक्रेन की कई न्यूज़ वेबसाइटों ने भी इसे चलाया.
तानिया ने बीबीसी को बताया कि उसके बाद उनके हज़ारों नए फॉलोअर्स बने हैं. इंस्टाग्राम पर उन्हें दर्जनों मैसेज मिले हैं. कुछ समर्थन वाले हैं तो कुछ धमकाने वाले.
उन्हें मैसेज करने वालों में रूस के लोग भी शामिल हैं. उनमें से कई ने रूसी अधिकारियों के कारनामों के लिए उनसे माफ़ी मांगी. लेकिन कइयों ने उनकी स्टोरी पर यकीन नहीं किया और उन्हें 'फ़ेक' यानी नकली क़रार दिया.
मनगढ़ंत स्टोरी पेश करने का दावा
जल्द ही तानिया के दोस्तों ने उन्हें रूस और बेलारूस के मीडिया संस्थानों में चल रही ख़बरों के स्क्रीनशॉट भेजना शुरू कर दिया. वहां उनके वीडियो को मनगढ़ंत बताया जा रहा था.
उन रिपोर्टों ने उन्हें एक 'छात्रा' बताया जा रहा था और दावा किया गया कि उनके चेहरे पर लगे घाव सच्चे नहीं थे. ये भी आरोप लगाए गए कि उनके चेहरे पर जो ख़ून थे, वो असली नहीं लग रहे थे. ये भी कहा गया कि वो बमबारी से बचे किसी शख़्स की तुलना में बहुत 'नॉर्मल' व्यवहार कर रही थीं.
लेकिन रूस समर्थक मीडिया के दावे झूठे हैं. असल में तानिया कोई 'छात्रा' नहीं हैं. उनकी उम्र 29 साल है और हमले के पहले वो वेट्रेस का काम करती थीं.
हमला होने के दूसरे दिन उन्होंने अपनी जो तस्वीरें बीबीसी के साथ शेयर कीं, वो हमले वाले दिन इंस्टाग्राम पर डाले गए वीडियो में दिख रही चोटों से साफ़ मेल खा रही थीं.
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जहां तक उनके बहुत शांत दिखने के आरोपों की बात है, तो तानिया ने बीबीसी को बताया कि उन्होंने जब अपना वीडियो रिकॉर्ड किया था, तो वो 'बहुत सदमे में थीं.
वो कहती हैं, "मैं शांत थी और डरी हुई नहीं थी. बस सदमे में थी. उसके कुछ घंटों बाद मुझे दौरे आ रहे थे. अगले दो दिनों तक मैं न कुछ खा सकी और न सो सकी. बस मैं रो रही थी. वो एक बहुत बुरा सपना था."
रूस की कुछ मीडिया रिपोर्टों में ये दावा भी किया गया कि यूक्रेन के सभी स्कूल रूसी हमले की शुरुआत से ही बंद हो गए थे. इसलिए दावा किया जा रहा था कि हमले की चपेट में बहुत से बच्चे नहीं आ सकते.
हालांकि मानवीय सहायता पहुंचाने के लिए स्कूलों को एक कलेक्शन प्वाइंट के रूप में उपयोग में लाया जा रहा था. तानिया कहती हैं कि स्थानीय लोग स्कूल को सुरक्षित स्थान मान रहे थे, इसलिए कई लोग अपने साथ बच्चे भी लेकर आए थे.
अधिकारियों ने भी इस दावे की पुष्टि की. चेर्निहीव क्षेत्रीय राज्य प्रशासन के प्रमुख व्याचेस्लाव चौस ने हमें बताया कि उस स्कूल का बेसमेंट खुला था, ताकि स्थानीय लोग हमले की स्थिति में छिप सकें.
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फ़ेक फ़ैक्ट-चेकर्स
तानिया अकेली नहीं हैं. उन जैसे कई यूक्रेनी नागरिकों पर रूस के मीडिया संस्थानों और सरकार ने हमलों को लेकर झूठ बोलने का आरोप लगाया है.
तानिया के बारे में झूठे दावे करने के आरोप लगाने वाले प्रमुख स्रोतों में 'वॉर ऑन फ़ेक' नाम का एक एकाउंट था. उसके वीडियो को टेलीग्राम पर अब तक 4 लाख से अधिक बार देखा जा चुका है.
सोशल मीडिया पर रूस के विदेश मंत्रालय और दूतावासों की ओर से कई भाषाओं में 'फ़ैक्ट-चेकिंग' प्रोजेक्ट चलाए जा रहे हैं. इसमें 'यूक्रेन में जो हो रहा है उसके बारे में निष्पक्ष जानकारी' देने का दावा किया जाता है.
हालांकि इसकी कई फ़ैक्ट-चेकिंग सही है, लेकिन इसमें तानिया के आरोपों को लेकर की गई झूठी पड़ताल भी शामिल है. इसके कंटेंट में रूस की बातें दोहराई जाती हैं: जैसे कि यूक्रेन हमलावर है, यूक्रेन के लोग बड़े पैमाने पर युद्ध अपराध कर रहे हैं, और रूस को लेकर लगाए गए आरोप मनगढ़ंत है, आदि.
'वॉर ऑन फ़ेक' फेक पर प्रसारित की जा रही स्टोरीज़ या उसके तर्कों की गूंज कई जगहों पर सुनी जा सकती है. रूस के सोशल नेटवर्क प्लेटफ़ॉर्म 'वीके,' रूस के कई क्षेत्रीय मीडिया संस्थानों, वहां की समाचार एजेंसी और बेलारूस के सरकारी टीवी पर देखी जा सकती है.
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पोलैंड में भी याद आती है वो घटना
तानिया का कहना है कि उन्होंने जब अपने दावों को झूठा क़रार देकर फैलते हुए देखा तो उन्हें ग़ुस्सा नहीं, बल्कि दुख हुआ.
वो कहती हैं, "मुझे इन झूठों पर यकीन करने वालों के लिए दुख और खेद हुआ. वे इतने डरे हुए हैं कि वे इस युद्ध की वास्तविकता या इसमें जो हो रहा है, उसे स्वीकार करने से डरते हैं. इसलिए उनके लिए इस युद्ध पर यकीन न करने के बहाने या वजह ढूंढना या मेरी कहानी को झूठ बताना बहुत आसान है. उनके लिए यह मानना आसान है कि यूक्रेन एक थिएटर है और यूक्रेन के लोग एक्टर."
तानिया अब यूक्रेन से पोलैंड जा चुकी हैं. अब उनके चेहरे पर घावों के दाग़ हैं. हमले से उनकी आंखें ख़राब हो गई हैं. वो कहती हैं कि वो हादसे के बाद होने वाला ट्रॉमा से जूझ रही हैं.
वो कहती हैं, "मैं अब पोलैंड में हूं, फिर भी मुझे वो घटना याद आती रहती है. सच कहूं, तो मैं अभी अपने घर लौटने के लिए तैयार नहीं हूं.
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