Explainer: पड़ोसियों की ब्लैकमेलिंग अब बर्दाश्त नहीं, श्रीलंका के नये राष्ट्रपति भारत को कितना परेशान कर सकते?
India-Sri Lanka Ties: श्रीलंका के राष्ट्रपति चुनाव में अनुरा कुमार दिसानायके की जीत भारत-श्रीलंका संबंधों में एक नया मोड़ लेकर आई है। नेशनल पीपुल्स पावर गठबंधन के पहले वामपंथी राष्ट्रपति के रूप में दिसानायके की जीत भारत के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि वो पहले ही बांग्लादेश और मालदीव जैसे देशों में सहयोगी सरकार को खो चुका है।
भारत समर्थक विपक्षी नेता सजित प्रेमदासा पर दिसानायके की जीत श्रीलंका के राजनीतिक प्लेटफॉर्म पर एक महत्वपूर्ण बदलाव को उजागर करती है, जिसमें दिसानायके 42.31 प्रतिशत मत हासिल करने में सफल रहे।

चुनावों के प्रति भारत का स्टैंड पूरी तरह से निष्पक्ष रहा है और किसी भी नेता ने भारत पर हस्तक्षेप के कोई आरोप नहीं लगाए हैं, हालांकि भारत चाहता था, कि मौजूदा राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे या सजित प्रेमदासा में से किसी को जनता पसंद करती, तो ज्यादा अच्छा रहता।
फरवरी में भारत आए थे दिसानायके
पारंपरिक रूप से भारत विरोधी रुख के लिए जानी जाने वाली मार्क्सवादी-लेनिनवादी पार्टी जेवीपी (जनता विमुक्ति पेरामुना) का नेतृत्व करने वाले दिसानायके की जीत ने भारत के सामने ऐसे नेता से जुड़ने की चुनौती पेश की है, जिसकी नीतियां और भारत के प्रति नजरिया अप्रत्याशित रहे हैं। हालांकि, इसी साल फरवरी में दिसानायके की भारत यात्रा, दोनों पक्षों के लिए सीधे जुड़ने का अवसर थी, एक ऐसा कदम जिसने उनकी बढ़ती लोकप्रियता और श्रीलंका के भविष्य पर उनके संभावित प्रभाव को भारत सरकार की तरफ से मान्यता दिए जाने को उजागर किया था। इस दौरान दिसानायके ने कई भारतीय नेताओं से मुलाकात की थी।
अपनी यात्रा के दौरान, दिसानायके ने गुजरात में अमूल प्लांट का निरीक्षण करने का फैसला किया था, जबकि पहले उन्होंने आरोप लगाया था, कि भारतीय कंपनी श्रीलंका की सरकारी डेयरियों को अपने नियंत्रण में लेना चाहती है। इससे भारत के साथ आर्थिक संबंधों के प्रति उनके दृष्टिकोण में सूक्ष्मता का संकेत मिलता है। इस यात्रा ने भारत-श्रीलंका आर्थिक संबंधों की जटिलताओं और चुनौतियों के बीच आपसी लाभ के अवसरों को रेखांकित किया था।

भारत सरकार, जिसका प्रतिनिधित्व श्रीलंका में भारत के उच्चायुक्त संतोष झा कर रहे थे, उन्होंने दिसानायके से बातचीत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है और दोनों देशों के लोगों की समृद्धि के लिए उनके बीच संबंधों को गहरा करने के भारत के इरादे पर जोर दिया। संतोष झा ने राष्ट्रपति पद के लिए चुने जाने के फौरन बाद दिसानायके से मुलाकात की और द्विपक्षीय संबंधों को बढ़ाने के लिए दिसानायके के प्रशासन के साथ काम करने की भारत की तत्परता पर जोर दिया है, जो बताता है, कि श्रीलंका को लेकर भारत कोई भी रिस्क लेने के मूड में नहीं है।
भारत के कूटनीतिक जुड़ाव में बदलाव
श्रीलंका में भारत की रणनीतिक प्राथमिकताएं तमिल समुदाय की जरूरतों को संबोधित करने, भारतीय प्रोजेक्ट्स के सही समय पर निष्पादन में पारदर्शिता सुनिश्चित करने और क्षेत्रीय शक्ति गतिशीलता में संतुलन बनाए रखने के महत्व को रेखांकित करती हैं, खासकर चीन के बढ़ते प्रभाव के संबंध में।
दिसानायके की पार्टी के ऐतिहासिक रुख के बावजूद भारत सरकार का उनसे संपर्क, श्रीलंका के नए नेतृत्व के साथ रचनात्मक संबंध को बढ़ावा देते हुए अपने हितों की रक्षा के प्रति व्यावहारिक नजरिए को दर्शाता है।
दिसानायके बतौर विपक्षी नेता कई राष्ट्रीय मुद्दों पर टिप्पणियां करते रहे हैं, जिनमें विवादास्पद IMF बेलआउट डील पर फिर से बातचीत करना, भ्रष्टाचार और पारदर्शिता पर सख्त रुख शामिल है, हालांकि ये दोनों मुद्दे भारत के हितों के मुताबिक ही हैं।
लेकिन पर्यावरण संबंधी चिंताओं और संप्रभुता के मुद्दों पर अडानी समूह की पवन ऊर्जा परियोजना को रद्द करने का उनका वादा भारत के लिए परेशान करने वाला है।
हालांकि वो पारदर्शिता की कमी का हवाला देकर श्रीलंका में चलने वाली चीनी परियोजनाओं की भी आलोचना कर चुके हैं। लेकिन, भारत के लिए जो सबसे महत्वपूर्ण है, वो है हिंद महासागर में श्रीलंका का रूख। भारत कतई नहीं चाहेगा, कि श्रीलंका की कोई भी सरकार हिंद महासागर में चीन की एंट्री में सहायक हो, और राष्ट्रपति बनने के बाद दिसानायके का ये बयान, कि वो "जियोपॉलिटिक्स को समझते हैं और श्रीलंका का इस्तेमाल किसी भी देश के खिलाफ नहीं होने देंगे", या भारत के लिए राहत भरा है।
तमिल मुद्दे पर 1987 के 13वें संविधान संशोधन को लागू करने पर भारत का जोर और चीन द्वारा श्रीलंकाई बंदरगाहों के सैन्य उपयोग को रोकने वाला द्विपक्षीय समझौता क्षेत्रीय सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है। दिसानायके का यह आश्वासन कि वे श्रीलंका के भूभाग का इस्तेमाल भारत के हितों के खिलाफ नहीं होने देंगे, कुछ चिंताओं को कम करता है, लेकिन 13वें संशोधन पर उनका रूख अभी भी साफ नहीं है।
तमिलों के मुद्दे पर दिसानायके की पार्टी का रूख विरोधी रहा है, जिसकी वजह से भारत के लिए डिप्लोमेटिक जुड़ाव काफी संवेदनशील हो जाती है।
क्या दिसानायके भारत के खिलाफ जाने की कोशिश करेंगे?
दिसानायके श्रीलंका का नेतृत्व संभाल चुके हैं, इसलिए उनकी नीतियों और फैसलों पर भारत और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों की कड़ी नजर रहेगी। 13वें संशोधन के प्रति उनकी दुविधा और श्रीलंका में तमिल समुदाय के अधिकारों और राजनीतिक स्वायत्तता को प्राथमिकता देने की जरूरत, भारत के लिए इस क्षेत्र में समावेशी शासन और शांति की वकालत करने के लिए चुनौतियां और अवसर दोनों पेश करती हैं।
भ्रष्टाचार से निपटने और परियोजनाओं में पारदर्शिता बढ़ाने पर जोर भारत के मुताबिक है, क्योंकि चीन पर ही अपने प्रोजेक्ट्स की शर्तों को छिपाने का आरोप लगता है। इसलिए भारत इस मुद्दे को समर्थन देगा, कि दिसानायके का प्रशासन श्रीलंका में ज्यादा पारदर्शी और जवाबदेह शासन की दिशा में संभावित बदलाव करे, जिससे घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर श्रीलंका के साथ साथ भारत को भी फायदा होगा।
इसके अलावा भी, पिछले कुछ सालों में भारत की डिप्लोमेसी में एक बात साफ रही है, कि वो ब्लैकमेल करने वाले तत्वों को भाव नहीं दे रहा है और इसका शानदार नमूना मालदीव और बांग्लादेश में देखा जा चुका है।
भारत की गंभीर डिप्लोमेसी ने एंडी-इंडिया रवैया रखने वाले मोहम्मद मुइज्जू को दिल्ली के साथ संबंधों को सुधारने के लिए मजबूर कर दिया है और अब वो दिल्ली आने के लिए बेचैन हैं। वहीं, बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन होने के करीब डेढ़ महीने बाद जाकर भारतीय अधिकारियों ने बेगम खालिदा जिया की पार्टी के नेताओं से मुलाकात की है, जो बताता है, कि भारत किसी ब्लैकमेलिंग को स्वीकार नहीं करेगा।
वहीं, श्रीलंका अभी भी भारतीय मदद उठा रहा है और आर्थिक संकट के समय 4 अरब डॉलर की भारतीय क्रेडिट लाइन ने देश को आर्थिक संकट से उबरने और अपनी जनता को पेट्रोल-डीजल और दवाओं जैसी बुनियादी सुविधाओं को मुहैया करवाने में अहम भूमिका निभाई है, इसलिए इस बात की आशंका काफी कम है, कि दिसानायके का प्रशासन भारत के खिलाफ कोई कदम उठाएगा, लेकिन हां, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है, कि वो चीन के साथ संबंधों को बढ़ा सकता है।












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