मार्शल लॉ लगने से हटने तक, विपक्ष ने कैसे लोकतंत्र की हिफाजत की? जानिए 6 घंटे का साउथ कोरियन ड्रामा
South Korea's martial law Explained: लोकतंत्र का इतिहास भले ही 2 हजार साल से ज्यादा पुराना है, लेकिन इसे अकसर कुचलने की, बंधक बनाने की या अलग अलग तरीकों से अपने इशारे पर नचाने की कोशिश की गई है। भारत में चाहे 1971 में लगा आपातकाल हो, या पाकिस्तान में बार बार लगता मार्शल लॉ हो, या डोनाल्ड ट्रंप के समर्थकों की देश की संसद पर कब्जा करने की कोशिश है, सैकड़ों ऐसे उदाहरण पड़े हैं, जब लोकतंत्र को तानाशाही शासन में तब्दील करने की कोशिश की गई है।
दक्षिण कोरिया में भी यही हुआ है, जहां बाहरी खतरे का डर दिखाकर एक राष्ट्रपति ने देश में तानाशाही शासन स्थापित करने की कोशिश की, टैंक और बंदूक के दम पर लोकतंत्र को बंधक बनाने की कोशिश की और याद दिलाने की कोशिश की, कि क्यों जनता को सरकारों से हमेशा सवाल पूछना चाहिए, कि लोकतंत्र का अस्तित्व बना रहे।

तो फिर दक्षिण कोरिया में अचानक क्या हुआ?
कोरिया प्रायद्वीप सालों तक संघर्ष में उलझा रहा और अंत में दो देश बने, उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया। उत्तर कोरिया एक तानाशाह के चंगुल में फंस गया, लेकिन दक्षिण कोरिया ने लोकतंत्र के रास्ते पर चलकर देश के मुकद्दर को संवारने का रास्ता चुना।
जिसे कम के कम दो बार कुचलने की कोशिश की गई।
मंगलवार की देर रात, जब देश की जनता सोने की तैयारी कर रही थी, उस वक्त देश के राष्ट्रपति यूं सुक योल ने अचानक एक फैसला सुनाते हैं और ऐलान करते हैं, कि 'राज्य विरोधी ताकतों को खत्म करने' के लिए देश में मार्शल लॉ लगाया जा रहा है।
यानि, देश में सैन्य शासन की स्थापना की जा रही है, जिसका मकसद देश विरोधी ताकतों को खत्म करना है।
लेकिन, अंत में पता चलता है, कि राष्ट्रपति को किसी देश विरोधी ताकतों से खतरा नहीं था, बल्कि उनकी अपनी राजनीति को खतरा था। राष्ट्रपति यूं सुक योल बेहद अलोकप्रिय हो चुके हैं और देश में उनकी अप्रूवल रेटिंग सिर्फ 25 बची है, जो दक्षिण कोरिया के इतिहास में सबसे कम रेटिंग है।
यानि, राष्ट्रपति यूं सुक योल बुरी तरह से अलोकप्रिय हैं, लेकिन सत्ता छोड़ना नहीं चाहते हैं और इसीलिए उन्होंने सत्ता को हथियाने का रास्ता चुना।
दक्षिण कोरिया के संसद में विपक्ष का वर्चस्व है और उनके लिए अपने एजेंडे को लागू करना काफी मुश्किल हो गया था।
मार्शल लॉ का आदेश पारित होने के फौरन बाद सेना और सशस्त्र पुलिस अधिकारियों ने देश की संसद को घेर लिया। संसद के बाहर प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए हेलिकॉप्टर को बुला लिए गये और स्थानीय मीडिया के कवरेज में देश की संसद के ऊपर हेलिकॉप्टर को उड़ते देखा गया।
लेकिन, मार्शल लॉ कुछ घंटे ही टिका रह पाया, लेकिन तमाम बाधाओं के बावजूद देश के विपक्षी सांसद, किसी तरह से संसद पहुंचने में कामयाब रहे। विपक्षी सांसदों को जब तक संसद पहुंचने से रोका जाता, वो सेना को चकमा देते हुए सदन में पहुंच गये।
मार्शल लॉ के आदेश को खारिज करने के लिए दक्षिण कोरिया के संविधान के मुताबिक 150 सांसदों की मंजूरी की जरूरत होती है, लेकिन जब तक सेना रोक पाती, सदन में 190 सांसद पहुंच चुके थे, जिनमें कई सांसद सत्ताधारी पार्टी के भी थे, जिन्होंने लोकतंत्र बचाने के लिए राष्ट्रपति के फैसले के खिलाफ वोट डाला।
संसद से जैसे ही आपातकाल खिलाफ प्रस्ताव पास हुआ, ठीक वैसे ही देश की सेना संसद से बाहर निकल आई और फिर तानाशाह राष्ट्रपति के पास आपातकाल को खत्म करने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचा था।
देश में स्थानीय समय के मुताबिक, साढ़े 10 बजे आपातकाल की घोषणा की गई थी, लेकिन सुबह साढ़े चार बचे राष्ट्रपति यूं सुक येओल ने कैबिनेट मीटिंग के दौरान औपचारिक रूप से इसे हटा दिया। मतदान के तुरंत बाद सुरक्षा बलों ने नेशनल असेंबली का मैदान छोड़ दिया।
मार्शल लॉ हटाने का ऐलान करते हुए भी राष्ट्रपति यूं सुक येओल ने संसद द्वारा प्रमुख सरकारी अधिकारियों और वरिष्ठ अभियोजकों पर महाभियोग चलाने के प्रयासों की आलोचना की। उन्होंने सांसदों पर "विधायी और बजटीय हेरफेर के बेईमान कृत्यों" का भी आरोप लगाया।
राष्ट्रपति यूं सुक येओल देंगे इस्तीफा?
दक्षिण कोरिया की राजनीति फिलहाल काफी तनावपूर्ण है और राष्ट्रपति यूं सुक येओल की पार्टी ने भी आपातकाल के फैसले को 'गलत कदम' बताया है।
जबकि, मार्शल लॉ हटाए जाने के बाद देश की मुख्य विपक्षी पार्टी 'डेमोक्रेटिक पार्टी', जो 300 सीटों वाली संसद में बहुमत रखती है, उसने राष्ट्रपति यूं सुक येओल से फौरन इस्तीफा देने या महाभियोग का सामना करने की मांग की।
डेमोक्रेटिक पार्टी ने एक बयान में कहा, कि "राष्ट्रपति यूं सुक येओल की मार्शल लॉ घोषणा, संविधान का स्पष्ट उल्लंघन था।"
बयान में आगे कहा गया, कि "उन्होंने आपातकाल घोषित करने के लिए बनाए गये किसी भी नियम का पालन नहीं किया और उनकी मार्शल लॉ लागू करने की घोषणा मूल रूप से अमान्य थी और संविधान का गंभीर उल्लंघन थी। यह विद्रोह का एक गंभीर कृत्य था और उनके खिलाफ महाभियोग चलाने के लिए के लिए एकदम सही आधार प्रदान करता है।"
दक्षिण कोरियाई मीडिया के अनुसार, यूं सूक येओल के चीफ ऑफ स्टाफ, सलाहकारों और वरिष्ठ सचिवों ने इस्तीफे की पेशकश की है।
क्या दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति यून सूक येओल पर महाभियोग चलाया जा सकता है?
1- संसदीय समीकरणों के आधार पर देखा जाए, तो राष्ट्रपति यूं सुक योल पर महाभियोग लगाना मुश्किल मालूम होता है। इसके लिए संसद के दो-तिहाई या 300 में से 200 सांसदों के समर्थन की आवश्यकता होगी।
2- फिलहाल डेमोक्रेटिक पार्टी सहित विपक्षी दलों के पास कुल मिलाकर 192 सीटें हैं।
3- हालांकि, विपक्ष इस बात से उत्साहित है, कि जब देश की संसद ने मार्शल लॉ को खारिज करने के लिए 190-0 से मतदान किया, क्योंकि समाचार एजेंसी एपी की रिपोर्ट के मुताबिक, आपातकाल के खिलाफ किए गये मतदान में राष्ट्रपति के पार्टी के कम से कम 10 सांसदों ने वोट डाला है।
4- वहीं, सत्तारूढ़ पीपुल पावर पार्टी के नेता हान डोंग-हुन ने, राष्ट्रपति यूं से मार्शल लॉ लागू करने के अपने फैसले को स्पष्ट करने के लिए कहा है और उनसे रक्षा मंत्री किम योंग ह्यून को बर्खास्त करने का आग्रह किया, जिन्होंने मार्शल लॉ की सिफारिश की थी।
5- यदि यूं सुक योल पर महाभियोग लगाया जाता है, तो प्रधानमंत्री हान डक-सू राष्ट्रपति पद का कार्यभार संभालेंगे। संवैधानिक न्यायालय द्वारा उनके भाग्य का फैसला किए जाने तक बाद में उनकी संवैधानिक शक्तियों को भी छीन लिया जाएगा।
दक्षिण कोरिया में पहले भी लगा है आपातकाल
विपक्ष के साथ-साथ राष्ट्रपति यूं की खुद की कंजर्वेटिव पार्टी के नेताओं ने भी इस फैसले का विरोध किया है, जिसने तानाशाही शासन की भयावह यादों को फिर से ताजा कर दिया, जिसे देश ने इतिहास में झेला है, लेकिन 1980 के बाद से नहीं देखा है।
दक्षिण कोरिया में इससे पहले साल 1979 में मार्शल लॉ की घोषणा की गई थी और उस वक्त सैन्य तानाशाल पार्क चुंग-ही ने देश के लोकतंत्र का गला घोंट डाला था, लेकिन बाद में तख्तापलट के दौरान ही उनकी हत्या भी कर दी गई। साल 1987 में दक्षिण कोरिया में लोकतंत्र लागू हुआ और उसके बाद से देश में कभी मॉर्शल लॉ नहीं लगा।
राष्ट्रपति के लिए अब पद बचाना मुश्किल
एक्सपर्ट्स का मानना है, कि राष्ट्रपति यूं सुक योल के लिए अब पद बचाना काफी मुश्किल है। इसी साल अप्रैल में विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी ने विशाल बहुमत से संसदीय चुनाव जीता है और राष्ट्रपति के लिए संसद में बिल पास कराना काफी मुश्किल हो गया है।
इसके अलावा, वो कई घोटालो में फंसे हैं और उनकी पत्नी को लेकर भी एक स्कैंडल जुड़ा है। उनकी पत्नी के खिलाफ आरोप हैं, कि उन्होंने एक डिजाइनर बैग गिफ्ट में ली थी। इसके अलावा, स्टॉक मार्केट से संबंधित एक स्कैम में भी उनकी पत्नी का नाम है, लिहाजा देश की जनता में उनको लेकर काफी गुस्सा है।
हालांकि, फिलहाल ये साफ नहीं है, कि राष्ट्रपति यूं सुक योल के खिलाफ क्या कार्रवाई हो पाएगी, लेकिन उनके फैसले से देश की जनता स्तब्ध है और अब उनके लिए पद पर रहना काफी मुश्किल होगा। वो हर तरफ से घिर चुके हैं और देश में उनके खिलाफ अविश्वास पैदा हो चुका है, लिहाजा अब उनके खिलाफ प्रदर्शन काफी तेज हो जाएंगे। ऐसे में अगर पार्टी के अंदर उनके खिलाफ अगर और संसद जाते हैं, तो उनके लिए पद छोड़ने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचेगा।












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