Shinzo Abe: वो फैक्ट्री मजदूर, जिसने प्रधानमंत्री बनकर देश की अर्थव्यवस्था की सूरत ही बदल दी...
जापान के कंजर्वेटिव पार्टी के नेता शिंजो आबे ने साल 2006 में पहली बार जापान के प्रधानमंत्री का पद संभाला था, लेकिन बेहद नाटकीय अंदाज में उन्होंने सिर्फ एक साल बाद ही प्रधानमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया।
टोक्यो, जुलाई 08: जापान के सबसे लंबे समय तक प्रधान मंत्री रहे शिंजो आबे को मृत घोषित कर दिया गया है। उन्हें आज सुबह साढ़े 11 बजे (जापानी समयानुसार) भाषण देने के दौरान गोली मार दी गई थी और फिर उन्हें अस्पताल में भर्ती करावाया गया था, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका। वहीं, अगर उनके राजनीतिक करियर पर बात करें, तो शिंजो आबे ने जापानी अर्थव्यवस्था को अपस्फीति से बाहर निकालने के लिए अपनी "एबेनॉमिक्स" नीतियों की शुरुआत की, जो पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हुई और भारत में भी 'मोदीनॉमिक्स' शब्द वहीं से आया। शिंजो आबे का कार्यकाल में ही जापान की सेना को मजबूत किया गया और चीन के बढ़ते दबाव का पूरी ताकत से मुकाबला करने की तैयारी शुरू हुई, जो अब काफी आक्रामक तरीके से जारी है।
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शिंजो आबे का सफर
जापान के कंजर्वेटिव पार्टी के नेता शिंजो आबे ने साल 2006 में पहली बार जापान के प्रधानमंत्री का पद संभाला था, लेकिन बेहद नाटकीय अंदाज में उन्होंने सिर्फ एक साल बाद ही प्रधानमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया। लेकिन, देश की अर्थव्यवस्था को संभालने के वादे के साथ साल 2012 में उन्होंने दूसरी बार जापान के प्रधानमंत्री कार्यालय का कमान संभाला और फिर देखते ही देखते उन्होंने जापान की अर्थव्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन कर दिया। शिंजो आबे के प्रयास का ही नतीजा था, कि साल 2020 में ओलंपिक खेलों का आयोजन जापान में करवाया गया। नवंबर 2019 में शिंजो आबे जापान के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले पहले नेता बन गये। लेकिन 2020 की गर्मियों में, कोविड महामारी और उनके पूर्व न्याय मंत्री की गिरफ्तारी सहित कई घोटालों की वजह से उनकी लोकप्रियता कम हो गई और उन्होंने ओलंपिक गेम्स की अध्यक्षता किए बगैर ही इस्तीफा दे दिया। हालांकि, कोविड की वजह से ओलंपिक खेलों का आयोजन भी 2020 में रद्द कर दिया गया था।

जापान में लोगों ने पढ़ा 'आबेनॉमिक्स
67 साल के शिंजो आबे ने सबसे ज्यादा समय तक जापान का पीएम रहने का रिकॉर्ड बनाया और शिंजो आबे ने जापान की राजनीति के साथ ही वहां की अर्थव्यवस्था को भी एक नया रंग दिया। आबे की आर्थिक नीतियों ने एक नए शब्द 'आबेनॉमिक्स' को जन्म दिया। इसकी तर्ज पर ही भारत में पीएम मोदी की आर्थिक नीतियों को 'मोदीनॉमिक्स' नाम दिया गया। वह साल 2007 में पहली बार जापान के पीएम चुने गए थे। 2007 में भी वह इसी बीमारी के चलते एक बार पद से इस्तीफा दे चुके थे। साल 2005 से 2006 तक वह लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (एलडीपी) के चीफ कैबिनेट सेक्रेटरी थे।

देश के सबसे युवा प्रधानमंत्री
21 सितंबर 1954 को टोक्यो में जन्मे आबे सिंतारो आबे और योको किशी की संतान थे। जहां उनके दादा कैना आबे और पिता सिंतारो आबे जापान के मशहूर राजनेता रहे तो उनके नाना नोबोशुके किशी जापान के पूर्व प्रधानमंत्री थे। आबे पहली बार वर्ष 2006 से वर्ष 2007 तक जापान के पीएम बने। उस समय उनकी उम्र 52 वर्ष थी। आबे न सिर्फ युद्ध के बाद देश के सबसे युवा पीएम बने बल्कि वह पहले ऐसे पीएम भी बन गए जिनका जन्म दूसरे विश्व युद्ध के बाद हुआ था।

एक मजदूर के तौर पर कैरियर की शुरूआत
अप्रैल 1979 में आबे ने कोबे स्टील प्लांट में काम करना शुरू किया। लेकिन दो वर्ष तक वहां पर रुकने के बाद उन्होंने वर्ष 1982 में कंपनी छोड़ दी। आबे ने जहां ओसाका में रहकर अपने स्कूली स्तर की पढ़ाई पूरी की तो वहीं ओसाका की साइकेई यूनिवर्सिटी से राजनीति शास्त्र में ग्रेजुएशन किया। इसके बाद आगे की पढ़ाई के लिए वह जापान के घनिष्ठ मित्र देश अमेरिका चले गए। अमेरिका की सदर्न कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी से उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की। आबे ने नौकरी छोड़ने के साथ ही देश की राजनीति में प्रवेश कर लिया। आबे ने राजनेता बनने से पहले सरकार से जुड़े कई पदों पर अपनी जिम्मेदारियां निभाई।

पिता की मौत के बाद राजनीति में आए
वर्ष 1993 में आबे के पिता की मृत्यु हो गई थी। उनकी मौत के बाद आबे ने चुनाव लड़ा और वह यामागुशी से चुने गए। आबे को बाकी चार उम्मीदवारों की तुलना में सबसे ज्यादा वोट मिले थे। साल 2001 में नॉर्थ कोरियन नागरिकों ने जापान के नागरिकों का अपहरण कर लिया था। आबे, जापान की सरकार की ओर से मुख्य मध्यस्थ के तौर पर भेजे गए थे। आबे ने वर्ष 2002 में नॉर्थ कोरिया के उस समय के तानाशाह किम जोंग इल से मुलाकात की। उनके प्रयासों से संकट सुलझा और उनके चाहने वालों की संख्या बढ़ गई थी।आबे को नॉर्थ कोरिया के लिए उनके सख्त रवैये के लिए जाना जाता है। हालांकि आबे ने चीन और दक्षिण कोरिया के साथ संबंधों में सुधार करने की भी मांग की, जहां कड़वी युद्ध की यादें गहरी हैं, उन्होंने 2013 में टोक्यो के यासुकुनी तीर्थ का दौरा करके दोनों पड़ोसियों को परेशान किया, जिसे बीजिंग और सियोल ने जापान के पिछले सैन्यवाद के प्रतीक के रूप में देखा था।












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