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India-China: मोदी 3.0 में भारत और चीन के बीच कैसे होंगे रिश्ते? जुलाई के पहले हफ्ते में मिलेगा ब्लूप्रिंट

India-China Relation: 15 जून 2020 से पहले तक ऐसा लग रहा था, कि मोदी सरकार शायद बातचीत के जरिए चीन के साथ रिश्ते को सुधारने में सफल हो सकती है, लेकिन 15 जून को गलवान घाटी में हुए हिंसक झड़प ने इस तरह की सभी उम्मीदों को हमेशा के लिए खत्म कर दिया।

गलवान घाटी हिंसा में कम से कम 20 भारतीय जवान वीरगति को प्राप्त हुए थे और उस घटना के अब जबकि चार साल पूरे हो चुके हैं, भारत के लोग उस घटना को भूले नहीं है। गलवान घाटी हिंसा ने भारत-चीन संबंध में सुधार की किसी भी संभावना को हिलाकर रख दिया है।

India-China Relation

पिछले चार सालों में भारत और चीन के बीच सैन्य स्तर पर दर्जन भर से ज्यादा बार बातचीत हो चुकी है, लेकिन कुछ क्षेत्रों में सैनिकों की वापसी के अलावा कोई बड़ा ब्रेकथ्रू नहीं मिला है। सीमा पर दोनों ही तरफ से 50 से 50 हजार जवान तैनात हैं और एक नया संघर्ष छिड़ने की संभावना हमेशा बनी रहती है।

लेकिन, अब जबकि नरेन्द्र मोदी लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बने हैं, तो मोदी 3.0 में चीन को लेकर उनकी सरकार की नीति कैसी होने वाली है, इसका पता अगले महीने के पहले हफ्ते में चलेगा, जब दोनों देश के नेता एक जगह पर ही मौजूद होंगे। और चीन के साथ संबंधों को संभालना, नरेंद्र मोदी सरकार के लिए अपने तीसरे कार्यकाल में सबसे बड़ी चुनौती है।

कजाकिस्तान में होगी मोदी-जिनपिंग मुलाकात?

कजाकिस्तान की राजधानी अस्ताना में 3 और 4 जुलाई को शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन आयोजित होने वाला है, जिसमें भाग लेने के लिए एससीओ के सदस्य देशों के राष्ट्रप्रमुखों का जुटना होगा।

हालांकि, अस्ताना शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के नेताओं के शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात होगी या नहीं, फिलहाल यह देखना बाकी है, लेकिन पिछले कुछ हफ्तों में कुछ घटनाक्र्म से शिखर सम्मेलन को लेकर कुछ संकेतों का पता चलता है।

दो इंटरव्यू से जग रही उम्मीदें

अप्रैल महीने में प्रधानमंत्री मोदी ने न्यूजवीक पत्रिका को दिए इंटरव्यू में कहा था, कि "भारत के लिए, चीन के साथ संबंध महत्वपूर्ण और सार्थक हैं। मेरा मानना ​​है, कि हमें अपनी सीमाओं पर लंबे समय से चली आ रही स्थिति को तत्काल संबोधित करने की आवश्यकता है, ताकि हमारे द्विपक्षीय संबंधों में असामान्यता को पीछे छोड़ा जा सके।"

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था, कि "भारत और चीन के बीच स्थिर और शांतिपूर्ण संबंध न केवल हमारे दोनों देशों के लिए, बल्कि पूरे क्षेत्र और दुनिया के लिए महत्वपूर्ण हैं।" उन्होंने आगे कहा था, कि "मुझे उम्मीद है, और मेरा मानना ​​है, कि कूटनीतिक और सैन्य स्तरों पर सकारात्मक और रचनात्मक द्विपक्षीय जुड़ाव के माध्यम से, हम अपनी सीमाओं पर शांति और स्थिरता बहाल करने और बनाए रखने में सक्षम होंगे।"

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इस बयान पर चीन की तरफ से सकारात्मक प्रतिक्रिया दी गई थी।

चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता ने कहा था, कि भारत और चीन के बीच संबंध "सीमा की स्थिति से कहीं ज्यादा आगे के हैं।" उन्होंने कहा, कि दोनों देश "सीमा की स्थिति से संबंधित मुद्दों को संभालने के लिए कूटनीतिक और सैन्य चैनलों के माध्यम से मजदूत संचार बनाए हुए हैं, जिसमें सकारात्मक प्रगति हुई है।"

चीनी प्रवक्ता ने कहा था, कि "हमें उम्मीद है, कि भारत चीन के साथ मिलकर काम करेगा, द्विपक्षीय संबंधों को रणनीतिक ऊंचाई और दीर्घकालिक नजरिए से देखेगा, विश्वास का निर्माण जारी रखेगा और बातचीत और सहयोग में जुड़ा रहेगा।" उन्होंने कहा था, कि "चीन को उम्मीद है, कि भारत, संबंधों को स्थिर रास्ते पर लाने के लिए मतभेदों को उचित रूप से संभालने का प्रयास करेगा।"

पीएम मोदी के अलावा, मई में भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने लद्दाख में सीमा गतिरोध के बीच चीन के साथ बाकी मुद्दों के समाधान की उम्मीद जताई थी। जयशंकर ने पीटीआई को दिए एक इंटरव्यू में कहा था, कि ये लंबित मुद्दे मुख्य रूप से "पेट्रोलिंग अधिकारों" और "पेट्रोलिंग क्षमताओं" के इर्द-गिर्द घूमते हैं।

वहीं, जब इन मुद्दों को हल करने की संभावित समयसीमा के बारे में प्रधानमंत्री मोदी के बयान को आधार बनाकर एस. जयशंकर से पूछा गया, तो उन्होंने कहा था, कि प्रधानमंत्री ने एक "बड़ी तस्वीर" के नजरिए से ऐसा कहा है।

भारतीय विदेश मंत्री ने 'पेट्रोलिंग अधिकार' और 'पेट्रोलिंग क्षमता' का जिक्र किया है, जो उनके पहले के रूख 'डिसइंगेजमेंट' और 'डीएस्केलेशन' से अलग है।

लेकिन, कुछ मुद्दे ऐसे भी हैं, जिनपर भारत ने चीन को उसी की भाषा में जवाब भी दिया है।

पहला- प्रधानमंत्री मोदी जब तीसरी बार चुनाव जीते, तो ताइवान के राष्ट्रपति लाई चिंग-ते ने उन्हें एक्स पर बधाई दी और प्रधानमंत्री मोदी ने उसपर अपनी प्रतिक्रिया दी, जिसने चीन को आगबबूला कर दिया। चीन ने "ताइवान के अधिकारियों और चीन के साथ राजनयिक संबंध रखने वाले देशों के बीच सभी प्रकार की आधिकारिक बातचीत" का विरोध किया, और भारत से 'एक चीन' नीति के प्रति अपनी प्रतिबद्धता से ना भटकने के लिए कहा।

भारत और ताइवान के बीच औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं हैं, और दोनों देशों ने वाणिज्य, संस्कृति और शिक्षा पर ध्यान केंद्रित किया है। अब अपने तीसरे दशक में प्रवेश कर चुके इस रिश्ते की रूपरेखा को चीनी संवेदनशीलता के कारण जानबूझकर कम रखा गया है।

दूसरा- संयुक्त राज्य अमेरिका संसद के सात सदस्यीय द्विदलीय प्रतिनिधिमंडल ने बुधवार को धर्मशाला में दलाई लामा से मुलाकात की है, जहां कांग्रेस अध्यक्ष नैन्सी पेलोसी ने घोषणा की, कि तिब्बती आध्यात्मिक नेता की "विरासत हमेशा जीवित रहेगी", जबकि शी जिनपिंग "चले जाएंगे और कोई भी उन्हें किसी भी चीज का श्रेय नहीं देगा"।

इसके ठीक एक दिन बाद अमेरिकी कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल ने प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी, विदेश मंत्री एस जयशंकर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल से मुलाकात की।

जिसपर चीन ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की, और अमेरिका से "ज़िज़ांग को चीन के हिस्से के रूप में मान्यता देने और "ज़िज़ांग स्वतंत्रता" का समर्थन नहीं करने की अपनी प्रतिबद्धताओं का पालन करने" का "आग्रह" किया। चीन तिब्बत को ज़िज़ांग के नाम से पुकारता है।

नैंसी पेलोसी ने अगस्त 2022 में ताइवान की यात्रा की थी, जिसपर चीन ने काफी खतरनाक प्रतिक्रिया दी थी, मगर उन्होंने चीनी प्रतिक्रिया को नजरअंदाज कर दिया था। 12 जून को, प्रतिनिधि सभा ने तिब्बत-चीन विवाद अधिनियम के लिए एक प्रस्ताव को बढ़ावा देने वाले द्विदलीय प्रस्ताव को पारित किया, जिसे पहले ही सीनेट ने मंजूरी दे दी थी।

लिहाजा अब सवाल ये हैं, कि इन घटनाओं के संदर्भ में भारत और चीन के बीच के संबंध को कैसे देखा जाए?

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भारत-चीन के बीच अब कैसे होंगे संबंध?

कुछ विश्लेषकों का मानना ​​है, कि भारतीय प्रधानमंत्री और जयशंकर ने जो कहा है, कि वो सीमा की स्थिति को हल करने के उनके इरादे को स्पष्ट रूप से दर्शाया है, लेकिन मोदी और शी जिनपिंग के बीच अस्ताना में संभावित बैठक से पहले पेलोसी की दलाई लामा से मुलाकात के माध्यम से भी इसने एक संकेत भेजा है।

कुछ अन्य लोगों का मानना ​​है, कि नई दिल्ली शुरू में लोकसभा चुनाव के बाद सीमा की स्थिति को हल करना चाहती थी, लेकिन एनडीए को उम्मीद से कम जनादेश मिलने के बाद उसने अपना विचार बदल दिया है। सरकार इस आलोचना से सावधान थी, कि भारत की शर्तों के अलावा कोई भी समझौता आलोचना का कारण बन सकता है।

सरकार के लिए स्थिर सीमाएं आर्थिक विकास के अपने एजेंडे पर ध्यान केंद्रित करने के लिए महत्वपूर्ण हैं, खासकर तब, जब चुनाव परिणामों से पता चला है कि नौकरियों की कमी और कीमतों में वृद्धि के कारण भाजपा को नुकसान उठाना पड़ा है। ऑस्ट्रेलिया और चीन के बीच चल रही बातचीत भी भारत के लिए भी मायने रखता है।

मैल्कम टर्नबुल और स्कॉट मॉरिसन की सरकार के दौरान ऑस्ट्रेलिया और चीन के संबंध काफी खराब हुए, लेकिन मौजूदा एंथनी अल्बनीज, जो एक वामपंथी विचारधारा वाले नेता हैं, उन्होंने चीन के साथ संबंध काफी हद तक सुधार लिए हैं, जबकि वे इस बातचीत के दौरान ऑस्ट्रेलिया के मूल हितों से समझौता नहीं कर रहे हैं। पिछले हफ़्ते सात साल में पहली बार ऑस्ट्रेलिया आए चीनी प्रधानमंत्री ली कियांग ने कहा, कि उन्होंने अल्बानीज के साथ "स्पष्ट, गहन और फलदायी" बातचीत की है और दोनों देश अपने मतभेदों और असहमतियों को ठीक से प्रबंधित करने पर सहमत हुए हैं।

प्रधानमंत्री मोदी और शी जिनपिंग के बीच पिछली दो बैठकें - नवंबर 2022 में बाली में जी20 नेताओं की बैठक के दौरान और अगस्त 2023 में दक्षिण अफ्रीका में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान - सकारात्मक परिणाम नहीं दे पाईं। द्विपक्षीय संबंध सीमा विवाद के बंधक बने हुए हैं, और शायद ही कोई राजनीतिक हलचल हुई है। हालांकि, दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंध कायम रहे हैं और द्विपक्षीय व्यापार 2023 में रिकॉर्ड 136 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया है, लेकिन चीनी धोखे ने भारतीय सरकार को सावधान कर रखा है।

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