महाशक्तियों के बीच पिसेगा पाकिस्तान? रूस की वजह से सऊदी अरब ने दिया बड़ा झटका

सऊदी अरब सरकार ने फैसला किया है कि 10 अरब डॉलर की लागत से ग्वादर बंदरगाह पर तेल रिफाइनरी बनाने के बजाए वो कराची बंदरगाह पर बनाएगा।

इस्लामाबाद, जून 15: चीन की वजह से पाकिस्तान को अमेरिका झटके दे रहा है तो अब रूस की वजह से पाकिस्तान को सऊदी अरब ने सिरदर्द देना शुरू कर दिया है। सऊदी अरब सरकार ने पाकिस्तान को बहुत बड़ा झटका देते हुए फैसला किया है कि वो पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह में तेल रिफाइनरी नहीं बनाएगा। सऊदी अरब का ग्वादर बंदरगाह पर तेल रिफाइनरी नहीं बनाना बहुत बड़ा झटका है, क्योंकि इसकी लागत 10 अरब डॉलर की है। वहीं, पाकिस्तानी मीडिया का कहना है कि सऊदी अरब सरकार ने तेल रिफाइनरी बनाने से इनकार सिर्फ रूस की वजह से किया है।

सऊदी ने दिया पाकिस्तान की झटका

सऊदी ने दिया पाकिस्तान की झटका

सऊदी अरब सरकार ने फैसला किया है कि 10 अरब डॉलर की लागत से ग्वादर बंदरगाह पर तेल रिफाइनरी बनाने के बजाए वो कराची बंदरगाह पर बनाएगा। पाकिस्तान के लिए ये एक बड़ा झटका इसलिए है, क्योंकि ग्वादर बंदरगाह पाकिस्तान में चीन की महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव यानि बीआरआई प्रोजेक्ट का हिस्सा है और सऊदी अरब के ग्वादर पोर्ट से तेल रिफाइनरी बनाने से पांव खींचने की वजह से ग्वादर पोर्ट के निर्माण में जितना खर्च किया गया है, उसके बर्बाद होने की संभावना बन गई है। क्योंकि, सऊदी सरकार के इस फैसले से यही माना जा रहा है कि ग्वादर पोर्ट निवेश के हब के तौर पर अपनी अहमियत खोता जा रहा है।

सऊदी नहीं करेगा रिफाइनरी निर्माण

सऊदी नहीं करेगा रिफाइनरी निर्माण

पाकिस्तान के ऊर्जा और तेल मामलों के विशेष सलाहकार ताबिश गौहर ने मीडिया से बात करते हुए इस बात की पुष्टि करते हुए कहा कि सऊदी अरब ग्वादर बंदरगाह पर तेल रिफाइनरी का निर्माण नहीं करेगा। सऊदी अरब कराची के पास बने एक पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स के साथ मिलकर तेल रिफाइनरी का निर्माण करेगा। ताबिश गौहर ने कहा कि अगले पांच साल में पाकिस्तान में एक और रिफाइनरी का निर्माण हो सकता है, जिसकी क्षमता 2 लाख बैरल प्रतिदिन की होगी। आपको बता दें कि सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने साल 2019 में पाकिस्तान का दौरा किया था और उसी दौरान पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच तेल रिफाइनरी को लेकर एमओयू हुआ था, जिसकी लागत 10 अरब डॉलर थी। सऊदी अरब ने जिस वक्त पाकिस्तान के साथ एमओयू साइन किया था, उस वक्त पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार खत्म होने के कगार पर था। तय एमओओयू के मुताबिक सऊदी अरब ने ग्वादर बंदरगाह में तेल रिफाइनरी बनाने का फैसला किया था, जिसे अब उसने बदलकर कराची बंदरगाह कर दिया है।

ग्वादर बंदरगाह पर मुश्किलें

ग्वादर बंदरगाह पर मुश्किलें

पाकिस्तान के पेट्रोलियम सेक्टर में काम करने वाले एक बड़े अधिकारी ने निक्केई एशिया से नाम ना छापने की शर्त पर बताया कि 'ग्वादर बंदरगाह में तेल रिफाइनरी बनाना कभी भी आसान नहीं था। ग्वादर में तेल रिफाइनरी बनाना तभी संभव हो सकता है जब कराची से पाइपलाइन की दूरी 600 किलोमीटर होती। कराची ही अब तक तेल आपूर्ति का केन्द्र रहा है और कराची से उत्तरी पाकिस्तान में तो पाइपलाइन है, लेकिन पूर्वी पाकिस्तान में नहीं है और बिना पाइपलाइन के ग्वादर से टैंकर के जरिए पेट्रोलियम पदार्थों को भेजना काफी महंगा होगा।' उस अधिकारी ने भी कहा कि 'ग्वादर बंदरगाह में जो स्थिति है और जो आधारभूत संरचना है, उसे देखकर अगले 15 सालों तक तेल रिफाइनरी का निर्माण संभव नहीं होगा।

रूस की वजह से सऊदी ने खींचे पांव

रूस की वजह से सऊदी ने खींचे पांव

पाकिस्तानी अधिकारी ने कहा कि रूस की वजह से सऊदी अरब ने ग्वादर बंदरगाह पर तेल रिफाइनरी बनाने से रूस की वजह से पांव पीछे खींचा है। अधिकाराी ने कहा कि पाकिस्तान की ऊर्जा क्षेत्र में रूस भी निवेश की बात कर रहा है और इसीलिए सऊदी अरब पीछे हट गया है। दरअसल, 2019 में गाजप्रोम के उप-प्रमुख विताल्य ए. मार्केलोव की अध्यक्षता में एक प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान आया था और इस दौरान प्रितिनिधिमंडल ने पाकिस्तान की अलग अलग ऊर्जा परियोजनाओं में 1.4 अरब डॉलर का निवेश करेगा। और माना जा रहा है कि इसी वजह से सऊदी अरब इस परियोजना से पीछे हट गया है।

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