परमाणु बम बनाकर ही दम लेगा सऊदी अरब, प्रिंस सलमान का कौन देगा साथ, अमेरिका, चीन या पाकिस्तान?
Saudi Arabia Nuclear Weapon: अगर ईरान परमाणु बम बना लेता है, तो फिर सऊदी अरब भी अगला परमाणु बम हासिल कर लेगा। सितंबर के अंत में एक इंटरव्यू में सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने यही कहा था, जब उनसे पूछा गया था, कि अगर ईरान घोषणा करता है, कि उसने परमाणु हथियार विकसित कर लिया है, तो फिर रियाद क्या करेगा?
जब प्रिंस सलमान से पूछा गया, कि ईरान अगर परमाणु बम बना लेता है, तो फिर सऊदी अरब इसपर क्या प्रतिक्रिया देगा, तो उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा, कि "हमें भी एक लेना होगा।"

इस महीने, ब्रेकिंग डिफेंस ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया है, कि सऊदी अरब, इजरायल के साथ अमेरिका की मध्यस्थता वाले समझौते के हिस्से के रूप में परमाणु ऊर्जा सहायता पर जोर दे रहा है और सऊदी अरब की इस इच्छा को अगर पूरा किया गया, तो मध्य पूर्व में परमाणु हथियारों की होड़ शुरू हो सकती है।
मध्य-पूर्व में परमाणु हथियारों का होड़?
ब्रेकिंग डिफेंस की रिपोर्ट में कहा गया है, कि सऊदी अरब 2015 ज्वाइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन (JCPOA) के तहत पश्चिम द्वारा ईरान को दी गई समान क्षमताओं के साथ एक घरेलू परमाणु कार्यक्रम को शुरू करने के लिए अमेरिकी समर्थन मांग रहा है।
यानि, सऊदी अरब कह रहा है, कि साल 2015 में पश्चिमी देशों ने घरेलू परमाणु ऊर्जा के लिए जिस तरह का समझौता ईरान के साथ किया था, वही समझौता सऊदी अरब करने के लिए तैयार है।
रिपोर्ट में बताया गया है, कि सऊदी अरब आगे जाकर परमाणु हथियार विकसित करने के विकल्प के साथ यूरेनियम संवर्धन के लिए अमेरिकी समर्थन चाहता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है, कि बाइडेन प्रशासन 2024 के चुनावों में अमेरिकी को विदेश नीति को जीत दिलाने के लिए इज़राइल-सऊदी अरब के बीच समझौता करवाना चाहता है, लिहाजा ये डील हो सकती है।
अगर अमेरिका के साथ नहीं हुआ समझौता?
रिपोर्ट के मुताबिक, अगर अमेरिका के साथ समझौता नहीं हो पाता है, तो फिर ईरान के साथ शक्ति संतुलन स्थापित करने के लिए सऊदी अरब, चीन या फिर रूस की तरफ रूख कर सकता है।
लिहाजा, अमेरिका नहीं चाहेगा, कि सऊदी अरब को परमाणु बम बनाने में चीन या रूस मदद करे, ऐसे में अमेरिका के लिए तय करना मुश्किल है, कि वो सऊदी का साथ दे या नहीं?
वहीं, ओबामा प्रशासन ने 2015 में ईरान के साथ JCPOA परमाणु समझौता किया था, जिसे डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने 2018 में एकतरफा
बाइडेन प्रशासन 2015 में हस्ताक्षरित समझौते को बदलने के लिए ईरान के साथ एक नए परमाणु समझौते पर बातचीत कर रहा है, जिसे पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 2018 में रद्द कर दिया था। वहीं, एक बार फिर से बाइडेन प्रशासन उस समझौते की बहाली के लिए तेहरान के साथ बातचीत कर रहा है। ऐसे में बार बार अमेरिका का अपने ही समझौते से पलटना, सऊदी अरब के मन में संदेह पैदा कर रहा है, लिहाजा वो किसी वैकल्पिक साझेदार की तलाश की कर रहा है, जिनमें चीन, रूस या फिर पाकिस्तान भी हो सकता है।
कई रिपोर्ट्स में कहा गया है, कि पाकिस्तान को बार बार आर्थिक संकट से बचाने के पीछे सऊदी अरब के मन में परमाणु बम बनाने का लालच है।

प्रिंस सलमान का परमाणु प्रेम
यह पहली बार नहीं था, जब बिन सलमान ने परमाणु हथियार पर इस तरह का भड़काऊ बयान दिया हो। सीबीएस के लिए मार्च 2018 के एक साक्षात्कार में, मोहम्मद बिन सलमान ने कहा था, कि "सऊदी अरब कोई परमाणु बम हासिल नहीं करना चाहता है, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है, अगर ईरान ने परमाणु बम विकसित किया, तो हम जल्द से जल्द परमाणु बम हासिल करेंगे।"
सऊदी अरब लंबे समय से अपने कट्टर प्रतिद्वंद्वी ईरान के परमाणु कार्यक्रम से परेशान रहा है।
पीयर-रिव्यू रिसर्च जर्नल ऑफ ह्यूमैनिटीज एंड सोशल साइंसेज में मार्च 2022 के एक लेख में, सोमयह सादात मूसावियन और अन्य लेखकों ने उल्लेख किया है, कि सऊदी अरब ने ईरान के अहमदीनेजाद प्रशासन के दौरान ईरान की परमाणु गतिविधियों का सक्रिय रूप से विरोध किया था।
हालांकि, मूसावियन और अन्य लोगों ने इस बात को नोट किया, कि बाद में ईरान के परमाणु कार्यक्रम को देखते हुए सऊदी अरब ने अपनी स्थिति में परिवर्तन लाया और खतरे को अपनी मिलिट्री मजबूती से निपटाने की दिशा की तरफ आगे बढ़ गया।
इसके अलावा, अल जज़ीरा ने अगस्त 2020 में बताया था, कि सऊदी अरब ने चीन की सहायता से अल उला के पास एक सुदूर रेगिस्तानी जगह पर एक यूरेनियम येलोकेक प्रसंस्करण संयंत्र बनाया है, जिससे राज्य के परमाणु कार्यक्रम और संभावित परमाणु हथियार विकास के बारे में चिंताएं बढ़ गई हैं।
अल जज़ीरा का कहना है, कि सऊदी ऊर्जा मंत्रालय ने इस परमाणु फैसिलिटी के निर्माण की बात से इनकार कर दिया है, लेकिन सऊदी अरब के भीतर यूरेनियम की खोज के लिए चीनी संस्थाओं के साथ अनुबंध करने की बात सऊदी प्रशसान ने स्वीकार की है, और परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण विकास पर सहयोग के लिए 2012 में एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं।
अल जज़ीरा की रिपोर्ट में कहा गया है, कि सऊदी अरब ने एक अनुसंधान रिएक्टर का निर्माण किया है और दो सिविल परमाणु ऊर्जा रिएक्टरों के निर्माण के लिए बोलियाँ आमंत्रित की हैं।
रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी अरब ने इस हफ्ते सोमवार को कहा है, कि उसने संयुक्त राष्ट्र के परमाणु निगरानीकर्ता द्वारा अपनी परमाणु गतिविधियों की हल्की-फुल्की निगरानी को समाप्त करने का फैसला किया है और पूर्ण सुरक्षा उपायों पर स्विच करेगा। ये एक ऐसा बदलाव है, जिसकी मांग एजेंसी वर्षों से कर रही है।
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