बार में बैठकर ऐसे बनाई समीर ने हज़ार करोड़ की कंपनी
बड़े शहरों में अक्सर ऐसा देखा जाता है कि कुछ दोस्त किसी बार में बैठकर अपनी नौकरी छोड़कर अपना धंधा शुरू करने की बात करते हैं.
लेकिन ये कभी-कभी ही होता है कि इस तरह की गई बात के बाद वो दोस्त 1000 करोड़ रुपये की कीमत वाली कंपनी खड़ी कर लें.
लेकिन समीर देसाई के साथ कुछ ऐसा ही हुआ.
ये उस दौर की बात है जब दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं में संकट की स्थिति बनी हुई थी. दुनिया साल 2008 में सामने आए आर्थिक संकट से गुज़र रही थी.
इसकी वजह से बैंकों ने कर्ज़ देना बंद कर दिया था और छोटी कंपनियों दिक्कत में पड़ गईं.
आर्थिक संकट से चमकी किस्मत
ऐसे ही समय में 26 साल के मैनेजमेंट कंसल्टेंट समीर ने एक ऐसी कंपनी शुरू करने का विचार रखा जिससे छोटी कंपनियों को लोन लेने के लिए बैंकों पर निर्भर न रहना पड़े.
दरअसल, वह इंटरनेट पर एक मार्केटप्लेस बनाना चाहते थे जहां पर छोटी-छोटी कंपनियां अलग-अलग लोगों और कंपनियों की तरफ से जुटाए गए फंड में से अपनी ज़रूरत के हिसाब से लोन ले सकें.
ऑक्सफॉर्ड यूनिवर्सिटी में समीर के साथ पढ़ने वाले उनके दोस्तों जेम्स मीकिंग्स और एंड्र्यू मुलिंगर को ये विचार बेहद पसंद आया है.
इसके बाद तीनों ने इस कंपनी को खड़ा करने की तैयारियां शुरू कर दीं.
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कंपनी की कीमत डेढ़ खरब रुपये
साल 2009 में उन्होंने अपनी-अपनी नौकरियां छोड़कर फंडिंग सर्किल नाम की अपनी कंपनी के लिए काम शुरू कर दिया.
इसके बाद साल 2010 में इस कंपनी को आधिकारिक रूप से लॉन्च कर दिया गया.
सिर्फ एक महीने पहले इन तीन दोस्तों की ये कंपनी लंदन स्टॉक एक्सचेंज में पंजीकृत हो गई है.
इस समय इस कंपनी की कीमत एक हज़ार रुपये से ज़्यादा लगाई गई है. हालांकि, कंपनी का आईपीओ लॉन्च होने के वक़्त उसकी कीमत लगभग 1500 करोड़ रुपये आंकी गई थी.
35 साल के समीर बताते हैं कि उनके मन में इस कंपनी को शुरू का विचार 2008 के आर्थिक संकट आने से पहले ही आया था. क्योंकि छोटे आकार की कंपनियों के लिए लोन लेना बहुत मुश्किल होता था.
समीर कहते हैं, "बैंक से लोन लेने में 15 से 20 हफ़्तों का समय लगता था. मुझे अहसास हुआ कि कोई भी बैंक छोटी कंपनियों को अपने कोष का बहुत ही कम हिस्सा लोन पर देता है. लेकिन ये छोटी कंपनियां समाज के लिए बहुत अहम हैं क्योंकि ये निजी क्षेत्र में काम करने वाले 60 फीसदी लोगों को नौकरियां देती हैं. इन कंपनियों की सामाजिक ज़रूरत ज़्यादा है लेकिन बैंक इन कंपनियों की परवाह कम करते हैं."
दोस्तों से लिया कर्ज
लंदन में इस कंपनी को खड़ा करने के लिए समीर और उनके दोस्तों ने दर्जन भर निवेशकों से फंड हासिल किया. इसके साथ ही उन्होंने अपने दोस्तों और मिलने वाले लोगों से भी अपनी कंपनी में निवेश करवाया.
इस निवेश से ये लोग फंडिंग सर्किल की वेबसाइट को चलाने के लिए ज़रूरी तकनीकी ढांचा बनाने में सक्षम हुए.
लेकिन छोटी कंपनियों और निवेशकों को वेबसाइट पर लाना अपने आप में एक जटिल काम था.
समीर कहते हैं, "शुरुआती दिनों में ये कुछ इस तरह था कि दुनिया में अंडा पहले आया या मुर्गा. कंपनियों और निवेशकों की हालत भी कुछ ऐसी ही थी."
इस समस्या से निपटने के लिए समीर की कंपनी ने एक कैशबैक डील शुरू की.
इसके तहत कंपनी के कोष में निवेश करने वालों को लोन लेने वाली कंपनी से 7 फीसदी की दर से ब्याज़ मिलता था और फंडिंग सर्किल की ओर से अतिरिक्त 2 फीसदी ब्याज़ मिलता था.
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जब आना शुरू हुए निवेशक
छोटी कंपनियों को अपने प्लेटफॉर्म पर बुलाने के लिए समीर और उनके दोस्त पत्र भेजते थे. उन्होंने कंपनियों को इतने पत्र भेजे कि जेम्स के पिता का दिया हुआ प्रिंटर ही खराब हो गया.
हालांकि, कुछ समय बाद छोटी कंपनियां और निवेशकों की संख्या बढ़ने लगी. साल 2011 में फंडिंग सर्किल ने 23 करोड़ रुपये की फंडिंग जुटा ली. इसके बाद उनका कोष 23 अरब रुपये तक पहुंच गया.
अब तक पचास हज़ार छोटी कंपनियां और अस्सी हज़ार निवेशक उनकी कंपनी का इस्तेमाल कर चुके हैं.
इसके साथ ही उनकी ये कंपनी अब अमरीका के साथ साथ जर्मनी और नीदरलैंड तक पहुंच गई है.
फंडिंग सर्किल लोन लेने वालों से 1 फीसदी से लेकर 7 फीसदी की दर से ब्याज लेती है. इसके साथ ही फंडिंग सर्किल एक प्रतिशत सर्विस फीस लेती है.
हालांकि, समीर और उनके दोस्तों की इस कंपनी ने अब तक फायदा कमाना शुरू नहीं किया है.
लेकिन समीर कहते हैं कि ये जानबूझकर किया जा रहा है कि क्योंकि कंपनी ने अब तक विस्तार में भारी निवेश किया है.
वह बताते हैं, "हमारी कंपनी तेजी से प्रगति कर रही है. हमारे नज़रिये से देखें तो हम ये चाहते हैं कि फंडिंग सर्किल छोटी कंपनियों के सामने लोन लेने के लिए पहली पसंद बन जाए."
पिछले हफ़्ते ही इस कंपनी ने घोषणा की है कि फंडिंग सर्किल ने बीती 30 सितंबर तक छोटी फर्मों के लिए कुल दो खरब सड़सठ अरब रुपये का कर्ज जुटाया है.
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