77वें स्वतंत्रता दिवस पर इंटरनेशनल बनने निकला रुपया, जानिए भारतीय करेंसी के 1947 से विकास की कहानी
Rupee goes international: भारत अपनी आजादी की 77वीं वर्षगांठ मना रहा है और अगले 25 वर्षों के दौरान अपने लोगों के लिए लचीली आर्थिक वृद्धि को साकार करने के चौराहे पर है, जिसे देश की मोदी सरकार ने "अमृत काल" बताया है।
अर्थव्यवस्था के अन्य पहलुओं को एक तरफ रखते हुए, आइए एक नजर डालते हैं, कि भारतीय रुपये ने अपेक्षाकृत कमजोर मुद्रा से इंटरनेशनल बनने की तरफ अपनी यात्रा कैसे शुरू की है। किसी देश की मुद्रा का मूल्य और वैश्विक व्यापार के लिए उसका उपयोग, उसकी आर्थिक प्रगति को मापने के प्रमुख संकेतकों में से एक है।

भारतीय रुपया बनने चला इंटरनेशनल
भारत सरकार तेजी से इस दिशा में काम कर रही है, कि ज्यादा से ज्यादा देशों के साथ भारतीय रुपये में कारोबार शुरू किया जाए, ताकि डॉलर पर निर्भरता कम से कम किया जा सके। लिहाजा, 22 देशों के बैंकों ने क्रमिक डी-डॉलरीकरण योजनाओं के हिस्से के रूप में, स्थानीय मुद्रा में व्यापार करने के लिए भारतीय बैंकों में विशेष रुपया वोस्ट्रो खाते खोले हैं।
मोदी सरकार की तरफ से संसद के हाल ही में समाप्त हुए मानसून सत्र के दौरान, संसद को सूचित किया गया है।
सीधे शब्दों में कहें तो, वोस्ट्रो अकाउंट, घरेलू बैंकों को उन ग्राहकों को अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग सेवाएं प्रदान करने में सक्षम बनाते हैं, जिनकी वैश्विक बैंकिंग आवश्यकताएं हैं, यानि जो वैश्विक व्यापार करते हैं।
लोकसभा में एक लिखित जवाब में केंद्रीय राज्य मंत्री (विदेश मामले) राजकुमार रंजन सिंह ने देशों के नाम गिनाए। इनमें बेलारूस, बोत्सवाना, फिजी, जर्मनी, गुयाना, इज़राइल, केन्या, मलेशिया, मॉरीशस, म्यांमार, न्यूजीलैंड, ओमान, रूस, सेशेल्स, सिंगापुर, श्रीलंका, तंजानिया, युगांडा, बांग्लादेश, मालदीव, कजाकिस्तान और यूनाइटेड किंगडम शामिल हैं।
भारतीय रिज़र्व बैंक ने पिछले साल एक व्यवस्था बनाई थी, जिसमें भारत से निर्यात पर जोर देने और रुपये को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ाने के साथ वैश्विक व्यापार के विकास को बढ़ावा देने के लिए घरेलू मुद्राओं में लेनदेन की अनुमति दी गई थी।
भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) ने रुपये में अंतर्राष्ट्रीय भुगतान के लिए एक तंत्र का निर्माण किया है, जिसके बाद रुपये के अंतर्राष्ट्रीयकरण में तेजी आई है। आरबीआई ने 11 जुलाई 2022 को भारतीय रुपये में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए चालान और भुगतान की अनुमति दी थी।
आर्थिक मामलों के जानकारों का मानना है, कि आरबीआई की ये कोशिश अगर कामयाब हो जाती है, तो आगे जाकर भारतीय मुद्रा रुपये के अंतर्राष्ट्रीयकरण में काफी मदद मिल सकती है।
किसी मुद्रा को "अंतर्राष्ट्रीय" मुद्रा उस वक्त कहा जा सकता है, यदि उसे दुनिया भर में एक्सचेंज के माध्यम के रूप में व्यापक रूप से स्वीकार कर लिया जाए। यानि, ज्यादा से ज्यादा देश किसी मुद्रा में ना सिर्फ द्विपक्षीय कारोबार करने के लिए, बल्कि तीसरे देश भी उस देश की मुद्रा का इस्तेमाल करने के लिए तैयार होने लगे।
रुपये के अंतर्राष्ट्रीयकरण से संबंधित मुद्दों की जांच करने और आगे का रास्ता सुझाने के लिए, आरबीआई ने दिसंबर 2021 में एक इंटर डिपार्टमेंटल ग्रुप (आईडीजी) का गठन किया था।
ये पैनल हाल ही में एक रिपोर्ट लेकर आया है, जहां उसने विभिन्न अल्पकालिक और दीर्घकालिक सिफारिशें की हैं।
कम अवधि के लिए, समूह के सदस्यों ने मौजूदा बहुपक्षीय तंत्र में रुपये को अतिरिक्त निपटान मुद्रा के रूप में सक्षम करने की सिफारिश की है, यानि सीमा पार लेनदेन के लिए भारतीय भुगतान प्रणालियों को अन्य देशों के साथ एकीकृत करना, वैश्विक बांड सूचकांकों में जी-सेक (या सरकारी बांड) को शामिल करना, और रुपये के व्यापार निपटान के लिए अलग अलग देशों को अलग अलग तरह से न्यायसंगत प्रोत्साहन प्रदान करना।
वहीं लंबे समय के लिए जो सिफारिश की गई है, उसमें मसाला बांड पर टैक्स की समीक्षा शामिल थी (मसाला बांड भारतीय संस्थाओं द्वारा भारत के बाहर जारी किए गए रुपये-मूल्य वाले बांड हैं); सीमा पार व्यापार लेनदेन के लिए रियल टाइम ग्रॉस सेटलमेंट (आरटीजीएस) का अंतर्राष्ट्रीय उपयोग; भारत और अन्य वित्तीय केंद्रों की टैक्स व्यवस्थाओं में सामंजस्य स्थापित करने के लिए वित्तीय बाजारों में कराधान के मुद्दों की जांच करना; और भारतीय बैंकों की ऑफ-शोर शाखाओं के माध्यम से भारत के बाहर रुपये में बैंकिंग सेवाओं की अनुमति देना, शामिल है।
रुपये में अंतर्राष्ट्रीय बनने की क्षमता
भारत को सबसे तेजी से बढ़ते देशों में से एक बताते हुए, जिसने प्रमुख विपरीत परिस्थितियों में भी उल्लेखनीय लचीलापन दिखाया, आईडीजी ने कहा, कि उसे लगता है कि रुपये में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बनने की क्षमता है।
हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है, कि अमेरिकी डॉलर लगभग सभी देशों की आरक्षित मुद्रा है, जो अन्य मुद्राओं के लिए हानिकारक है, खासकर वित्तीय बाजारों में तेज अस्थिरता के समय में, क्योंकि यह दूसरे देशों की मुद्राओं को कमजोर करता है।
हालांकि, एसबीआई रिसर्च ने पिछले साल एक रिपोर्ट में कहा था, कि वैश्विक विदेशी मुद्रा भंडार में अमेरिकी डॉलर की हिस्सेदारी इक्कीसवीं सदी की शुरुआत से घट रही है और दिसंबर 2021 के अंत तक, 59 प्रतिशत के करीब गिर रही है, जो दो दशक पहले 70 प्रतिशत से ऊपर था।
डॉलर की कीमत बढ़ने की वजह से, जब देश दूसरे देशों से सामान खरीदते हैं, तो उन्हें ज्यादा भुगतान करना पड़ता है, लिहाजा घरेलू स्तर पर महंगाई बढ़ जाती है, जिसका सीधा असर उस देश की विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ता है। आयात की बढ़ती लागत से चालू खाता घाटा (सीएडी) भी बढ़ सकता है।
बढ़ता व्यापार घाटा भी रुपये की कमजोरी का एक अहम कारण है।
भारतीय रुपया इस समय 83 प्रति अमेरिकी डॉलर से ज्यादा पर कारोबार कर रहा है। आजादी के वक्त रुपये की कीमत डॉलर के मुकाबले 4 प्वाइंट के आसपास थी।
आजादी के बाद कैसे हुआ रुपये का विकास?
1947 के बाद से व्यापक आर्थिक मोर्चे पर बहुत कुछ हुआ है, जिसमें 1960 के दशक में खाद्य और औद्योगिक उत्पादन में गिरावट के कारण आर्थिक तनाव भी शामिल है।
फिर भारत-चीन और भारत-पाकिस्तान युद्ध हुए, जिससे खर्च और बढ़ गया और भुगतान संतुलन संकट पैदा हो गया। उच्च आयात बिलों का सामना करते हुए, भारत डिफ़ॉल्ट के करीब पहुंच गया था, क्योंकि विदेशी मुद्रा भंडार लगभग खत्म हो गया था।
1991 में, भारत ने खुद को एक गंभीर आर्थिक संकट में घिरा पाया, क्योंकि देश अपने आयात के लिए भुगतान करने और अपने विदेशी ऋण दायित्वों को चुकाने की स्थिति में नहीं था। जिसके बाद भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था को खोल दिया।
इस संकट के वक्त डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया तेजी से गिरता चला गया और डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया 26 प्वाइंट पर पहुंच गया।
आजादी के दौरान तत्कालीन बेंचमार्क पाउंड स्टर्लिंग के मुकाबले 4 रुपये से लेकर अब अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगभग 83 रुपये तक, पिछले 76 वर्षों में रुपये में 79 रुपये की गिरावट आई है।
हालांकि, एक उम्मीद की किरण भी है। भले ही गिरते रुपये से पूरी अर्थव्यवस्था को फायदा न हो, लेकिन डॉलर के बढ़ने की वजह से भारत जिन सामानों का निर्यात करता है, उसके लिए भारत को ज्यादा डॉलर मिलेंगे।
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