रॉन डिसैंटिस: ट्रंप को पछाड़कर अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव जीत पाएंगे?

रॉन डिसैंटिस
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रॉन डिसैंटिस

पिछले महीने 24 मई को एक कार्यक्रम में फ़्लोरिडा राज्य के गवर्नर रॉन डिसैंटिस ने अमेरिका के 47वें राष्ट्रपति बनने के लिए रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतरने का ऐलान किया.

उम्मीद की जा रही थी कि यह एक शानदार कार्यक्रम होगा और युवा नेता के तौर पर वो अमेरिका के भविष्य का अपना सपना लोगों के सामने रखेंगे और टेक्नोलॉजी इसका एक बड़ा हिस्सा होगी.

ग़ौरतलब है कि टेक्नोलॉजी के नेतृत्व के लिए पहचाने जाने वाले एलन मस्क भी इस कार्यक्रम में शामिल हो रहे थे. लेकिन कार्यक्रम की शुरुआत ही समस्याओं में घिर गई क्योंकि उनकी वेबसाइट और ट्विटर पेज ठप्प हो गया.

आख़िर जब उन्होंने अपना संदेश लोगों तक पहुंचाया तो उसमें रिपब्लिकन पार्टी के उनके प्रमुख प्रतिद्वंदी और पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की झलक दिखाई दी.

रिपब्लिकन पार्टी की ओर से चुनाव लड़ने के लिए अब तक कई उम्मीदवार आ चुके हैं लेकिन अनुमान है कि मुख्य मुकाबला डोनाल्ड ट्रंप और रॉन डिसैंटिस के बीच होगा.

दुनिया जहान में इस हफ़्ते हम यह जानने की कोशिश करेंगे कि क्या रॉन डिसैंटिस अमेरिका के राष्ट्रपति बन सकते हैं?

अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव
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अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव

फ़्लोरिडा राज्य

फ्लोरिडा अमेरिका के बड़े राज्यों में से एक है और इसे अमेरिका का सनशाइन स्टेट कहा जाता है क्योंकि यहां गर्मियों का मौसम लंबा होता है और सर्दियों में बारिश कम होती है.

पिछले तीस सालों से अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों में फ़्लोरिडा महत्वपूर्ण राज्य रहा है. अमेरिका में ज्यादातर राज्य अक्सर एक ही पार्टी के उम्मीदवार को वोट देते हैं. रेड स्टेट और ब्लू स्टेट.

जहां अक्सर डेमोक्रेटिक पार्टी जीतती है उन्हें ब्लू स्टेट कहा जाता है और रिपब्लिकन पार्टी के गढ़ माने जाने वाले राज्य रेड स्टेट कहलाते हैं. और तीसरे स्टेट होते हैं पर्पल स्टेट या स्विंग स्टेट यानि वो राज्य जहां दोनों ही पार्टियों के उम्मीदवार जीत सकते हैं.

फ़्लोरिडा उन्हीं गिने चुने पर्पल स्टेट में से एक है. एक रोचक तथ्य यह भी है कि 1996 से 2020 के राष्ट्रपति चुनावों में फ़्लोरिडा राज्य जीतने वाला उम्मीदवार ही राष्ट्रपति बना है.

फ़्लोरिडा सेंट्रल यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्र के प्रोफ़ेसर ओब्री ज्यूवीट के अनुसार, “फ़्लोरिडा इसलिए भी स्विंग स्टेट कहलाता है क्योंकि पिछले छह राष्ट्रपति चुनावों में तीन बार डेमोक्रेटिक और तीन बार रिपब्लिकन उम्मीदवार जीते और कई बार इस राज्य में कांटे का मुकाबला हुआ है. और यहां जीते सभी उम्मीदवार राष्ट्रपति बने हैं.”

अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों में हर राज्य के तय इलेक्टोरल वोट होते हैं और इनकी संख्या की दृष्टि से फ़्लोरिडा तीसरा सबसे बड़ा राज्य है. इसलिए दोनों ही पार्टी के उम्मीदवार यहां एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा देते हैं.

ओब्री ज्यूवीट कहते हैं, “अक्सर चुनावों से छह महीने पहले प्रचार के लिए राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति उम्मीदवार फ़्लोरिडा के बीस-तीस चुनावी दौरे करते हैं. जबकि कई राज्यों में वो एक बार भी नहीं जाते क्योंकि वो पहले से जानते हैं कि उस राज्य में लोग किस पार्टी को चुनेंगे. इसलिए यहां के मतदाताओं को लुभाने की पूरी कोशिश की जाती है.”

डोनाल्ड ट्रंप
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डोनाल्ड ट्रंप

फ्लोरिडा स्विंग स्टेट क्यों है?

मगर फ़्लोरिडा स्विंग स्टेट क्यों है? यानि कभी वहां से रिपब्लिकन तो कभी डेमोक्रेटिक उम्मीदवार जीतते हैं. यहां के मतदाताओं का मन क्यों बदलता है?

इसकी एक वजह है फ़्लोरिडा की आबादी का स्वरूप. यहां कि एक चौथाई आबादी हिस्पैनिक मूल की यानि लातिन अमेरिकी मूल के लोगों की है. वैसे तो आमतौर पर लातिनी लोग डेमोक्रेटिक पार्टी को पसंद करते हैं लेकिन क्यूबा से आए लोगों की बात अलग है.

ओब्री ज्यूवीट का कहना है, “क्यूबा के लोग रिपब्लिकन पार्टी समर्थक रहे हैं क्योंकि वो रिपब्लिकन पार्टी की कम्युनिस्ट विरोधी और कास्त्रो विरोधी सोच से सहानुभूति रखते हैं. उन्हें डेमोक्रेटिक पार्टी कम कम्युनिस्ट विरोधी लगती है.”

फ़ेलोरिडा की दूसरी सबसे बड़ी हिस्पैनिक मूल की आबादी का संबंध प्योर्तो रिको से है.

ओब्री ज्यूवीट का मानना है कि “प्योर्तो रिकन मतदाताओं का आमतौर पर झुकाव डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर होता है लेकिन वो बदलता भी रहता है.”

इन दोनों गुटों का चुनावी नतीजों पर बड़ा प्रभाव पड़ता है. पिछले चुनावों के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने फ़्लोरिडा में अपना घर बना कर पूरी ताकत से चुनाव प्रचार किया और यहां के इलेक्टोरल वोट जीत भी गये, लेकिन राष्ट्रपति चुनाव हार गए.

इस बार भी वो यहां पूरी कोशिश करेंगे. मगर कोविड महामारी के लिए लगाए गए प्रतिबंधों को हटाने को लेकर डिसैंटिस और ट्रंप की सोच एक जैसी थी.

राज्य का गवर्नर होने के चलते डिसैंटिस ने अन्य सभी राज्यों से पहले कोविड संबंधी नियंत्रण हटा दिए जिसे बहुत लोगों ने पसंद भी किया.

ओब्री ज्यूवीट कहते हैं कि इसका फ़ायदा उठाने के लिए कई लोग दूसरे राज्यों से फ़्लोरिडा आकर बस गए क्योंकि वो गवर्नर डिसैंटिस की नीतियों को पसंद करते हैं.

रॉन डिसैंटिस
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रॉन डिसैंटिस

रॉन डिसैंटिस की राजनीति

रॉन डिसैंटिस पहली बार 2012 में सांसद चुने गए. संसद में हमेशा उनका रुख़ रुढ़िवादी रहा और डोनाल्ड ट्रंप की विचारधारा से मेल खाता रहा. यहां तक कि जब वो 2018 में फ़्लोरिडा राज्य का गवर्नर बनने के लिए चुनावी मैदान में उतरे तो ट्रंप ने उनका समर्थन किया.

चुनावी सलाहकार एजेंसी फ़ायरहाउस के पार्टनर मैट टेरिल कहते हैं कि “कई लोगों का मानना है कि ट्रंप के समर्थन ने चुनाव का रुख़ डिसैंटिस के पक्ष में मोड़ दिया और वो चुनाव जीत गए.”

हालांकि वो छोटे अंतर से चुनाव जीते लेकिन गवर्नर बनने के बाद उन्होंने क्षेत्र की राजनीति पर अपनी पकड़ काफ़ी मज़बूत कर ली है. जब 2020 में दोबारा चुनाव हुए तो उन्होंने भारी जीत हासिल की और रुढ़िवादी एजेंडा आगे बढ़ाना शुरू कर दिया.

मार्च 2022 में उन्होंने राज्य में एक विवादास्पद बिल पास कराया जिसका नाम था 'डोंट से गे’ जिसके तहत स्कूलों में छात्रों के सामने लैंगिक पसंद के मुद्दे पर बहस को प्रतिबंधित कर दिया गया.

मैट टेरिल कहते हैं, “पूरे देश में रिपब्लिकन मतदाताओं के लिए शिक्षा एक बड़ा मुद्दा है. अमेरिका में सबकी अलग राय है कि स्कूल में क्या पढ़ाया जाना चाहिए और क्या नहीं.”

मगर कई तबकों में इसकी आलोचना हुई. ख़ासतौर पर फ्लोरिडा में रोज़गार देने वाली सबसे बड़ी कंपनी डिज़नी की ओर से जिसका सबसे बड़ा थीम पार्क डिज़नीलैंड फ्लोरिडा में है.

डिज़नी में पूरे अमेरिका में 10 लाख से ज़्यादा लोग काम करते हैं और यह अरबों डॉलर का टैक्स जमा करती है. रोचक बात यह है कि रॉन डिसैंटिस ने अपनी पत्नी केसी से यहीं शादी की थी.

मगर डिज़नी के विरोध को नज़रअंदाज़ करते हुए उन्होंने टैक्स और नियंत्रण के नियमों में कंपनी को दी जाने वाली रियायतें रद्द कर दीं.

डिज़नी ने भी राज्य में नए थीम पार्क के निर्माण की योजना स्थगित कर दी. दोनों के बीच यह लड़ाई अभी भी जारी है.

डिज़नी और डिसैंटिस के बीच तीखा विवाद चल रहा है.
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डिज़नी और डिसैंटिस के बीच तीखा विवाद चल रहा है.

डिसैंटिस ने एक और क़ानून पास कर दिया जिसके तहत राज्य में 'छह सप्ताह बाद गर्भपात’ पर प्रतिबंध लगा दिया गया.

हालांकि यह बलात्कार या कौटुम्बिक व्याभिचार का शिकार महिलाओं पर लागू नहीं होता.

गर्भापात के अधिकार को लेकर अमेरिका में बहस पहले से छिड़ी हुई है मगर इस बार रिपब्लिकन पार्टी के नेताओं ने भी डिसैंटिस के इस फ़ैसले की आलोचना की.

मैट टेरिल कहते हैं, “उनके इस फ़ैसले से रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक मतदाताओं के बीच ध्रुवीकरण तो हुआ ही लेकिन उनकी पार्टी के भीतर भी इसका असर दिख रहा है. ट्रंप ने भी इस मुद्दे पर डिसैंटिस को घेरा है.”

डिसैंटिस ने फ्लोरिडा के निवासियों को सार्वजानिक जगहों पर बिना लाइसेंस के हथियार ले जाने की इजाज़त भी दे दी है.

मैट टैरिल कहते हैं कि डिसैंटिस अपनी सोच और फ़ैसलों का आक्रामक तरीके से बचाव करते हैं. मगर उनकी सोच और नीतियां ट्रंप की नीतियों से काफ़ी मिलती जुलती हैं. तो ऐसे में यह दोनों रिपब्लिकन पार्टी की राष्ट्रपति उम्मीदवारी हासिल करने के लिए कैसे एक दूसरे से लड़ेंगे?

अमेरिकी चुनाव
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अमेरिकी चुनाव

ट्रंप बनाम डिसैंटिस

अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव में दोनों पार्टियां अपने उम्मीदवारों का चुनाव करती हैं जिन्हें प्राइमरी कहा जाता है. प्राइमरी चुनाव अगले साल फ़रवरी में होंगे जिसमें रिपब्लिकन पार्टी के सदस्य अपना उम्मीदवार चुनेंगे.

डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार का चयन राष्ट्रपति जो बायडेन के चुनाव लड़ने की घोषणा के साथ ही तय हो गया है.

बीबीसी के उत्तर अमेरिकी मामलों के विश्लेषक और पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज डब्लू बुश के विशेष सहायक रॉन क्रिस्टी कहते हैं कि एक समय एक दूसरे के करीबी समझे जाने वाले डोनाल्ड ट्रंप और रॉन डिसैंटिस अब कट्टर प्रतिद्वंद्वी हो गए हैं और उनके संबंध कड़वे हो गए हैं.

उनके मुताबिक़, “गवर्नर डिसैंटिस ने संकेत दिया है कि उन दोनों के बीच लंबे अरसे से बातचीत नहीं हुई है. वहीं ट्रंप उनका ज़िक्र अपमानजनक नामों से करते हैं. ट्रंप मानते हैं कि डिसैंटिस को उनका अहसानमंद होना चाहिए और वफ़ादारी दिखानी चाहिए. क्योंकि ट्रंप मानते हैं उनकी वजह से ही डिसैंटिस गवर्नर बन पाए. और वो उनके राष्ट्रपति चुनाव लड़ने के फ़ैसले को विश्वासघात की तरह देखते हैं.”

आख़िरकार यह राजनीति है और अब ट्रंप अपने आपको डिसैंटिस से अलग दिखाने के लिए उन पर तंज करते रहते हैं मगर अधिकांश मुद्दों पर ट्रंप और डिसैंटिस की नीति और सोच एक जैसी है.

रॉन क्रिस्टी ने कहा, “दोनों ही मज़बूत राष्ट्रीय रक्षा के हिमायती हैं, अमेरिका की दक्षिणी सीमा का सुरक्षा और निगरानी और गर्भपात विरोध पर उनकी राय एक जैसी है. दोनों ही निजी टैक्स में कटौती के समर्थक हैं. अधिकांश लोग डिसैंटिस को ट्रंप की कॉपी की तरह देखते हैं मगर जिनकी छवि पर ट्रंप जैसे विवाद हावी नहीं हैं.”

लगता यही है कि यह कांटे की और तीखी लड़ाई होगी मगर जीत किसकी होगी?

रॉन क्रिस्टी का कहना है, “ऊपर से देखें तो रिपब्लिकन पार्टी की उम्मीदवारी की रेस में ट्रंप का पलड़ा भारी है. लेकिन सतह के नीचे लोगों में नयी पीढ़ी के हाथ में नेतृत्व देखने की चाह भी है. लोग चाहते हैं कि ऐसा नेता उम्मीदवार बने जो भविष्य की ओर देखता हो और लोगों को बांटता ना हो. ऐसे में कुछ और उम्मीदवार भी मैदान में आ सकते हैं और अगर दूसरे युवा और आशावादी उम्मीदवार इस रेस में शामिल होते हैं तो ट्रंप का समर्थन कम भी हो सकता है. और अगर कोई आशावादी नयी पीढी का नेता रिपब्लिकन पार्टी की उम्मीदवारी हासिल कर लेता है तो वो जो बाइडेन को हरा भी सकता है.”

ताज़ा सर्वेक्षणों के अनुसार, ट्रंप इस रेस में डिसैंटिस से आगे हैं मगर ट्रंप कई क़ानूनी मामलों में भी घिरे हैं.

क्रिस्टी कहते हैं हो सकता है दूसरे उम्मीदवार भी मैदान में आएं लेकिन हो सकता है उनका लक्ष्य राष्ट्रपति नहीं बल्कि उपराष्ट्रपति पद हो.

2024 की गर्मियों में रिपब्लिकन पार्टी की उम्मीदवारी के लिए चुनाव होंगे और फिर उसके बाद राष्ट्रपति चुनाव.

जो बाइडेन
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जो बाइडेन

व्हाइट हाउस

अमेरिका में नवंबर 2024 में राष्ट्रपति चुनाव होंगे. लंदन यूनिवर्सिटी कॉलेज में अमेरिकी राजनीति की प्रोफ़ेसर जूली नॉर्मन का कहना है कि इस बार अमेरिका में दो दलों और उसके समर्थकों के बीच ऐसा ध्रुवीकरण है जैसा पहले कभी नहीं रहा.

वो कहती हैं, “दोनों पार्टियां और उनके समर्थक एक दूसरे को फूटी आंख नहीं देखना चाहते. वो एक दूसरे को दुष्ट और ख़ूद को मूल्यवान ठहराते हैं एक दूसरे की नीतियों को बर्दाश्त नहीं करते. आम लोगो में भी इस वजह से गहरी दरार देखने को मिलती है. लोग कहते पाए जाते हैं कि अगर आप उस पार्टी का समर्थन करते हैं तो हमारा आपसे कोई संबंध नहीं. ऐसे में उनके बीच कोई समझौता होने की उम्मीद नहीं रह जाती.”

जूली नॉर्मन के अनुसार, अगर रिपब्लिकन पार्टी डोनाल्ड ट्रंप या डिसैंटिस के नेतृत्व में चुनाव जीत जाती है तो अमेरिका जो बाइडेन के राष्ट्रपति बनने के समय जितना रुढ़िवादी था उससे कहीं और अधिक कट्टर बन जाएगा और इसका असर समाज के कई हिस्सों में दिखाई दोगा.

“ट्रंप या डिसैंटिस, दोनों में से कोई भी राष्ट्रपति बनता है तो सरकारी खर्च में कटौती होगी. अप्रवासन यानि इमिग्रेशन और गर्भपात के मुद्दे पर कड़ा रुख़ दिखेगा. मगर किस तरह की नीतियां मंज़ूर हो पाती हैं यह इस बात पर निर्भर करेगा कि संसद का स्वरूप क्या बनता है.”

मगर आम मतदाताओं की प्राथमिकता का क्या होगा? इस बारे में जूली नॉर्मन का मानना है कि आजीविका का संघर्ष ख़ास नहीं बदलेगा.

“जहां तक आम मतदाता का सवाल है उसके लिए सबसे महत्वपूर्ण है घर खर्च में होने वाली वृद्धि, बढ़ती महंगाई. इसमें ख़ास फ़र्क नहीं पड़ेगा और बहुत कुछ इस बात पर भी निर्भर होगा कि अर्थव्यवस्था क्या मोड़ लेती है.”

अभी सबसे बड़ा सवाल है कि क्या डिसैंटिस राष्ट्रपति चुनाव जीत सकते हैं? उनके सामने पहली चुनौती है प्राइमरी के चुनावों में ट्रंप को पछाड़ कर रिपब्लिकन पार्टी की उम्मीदवारी हासिल करना जो कि आसान नहीं है.

हालांकि ये भी अनुमान लगाया जा रहा है कि अगर वो पहली बाधा पार कर लेते हैं तो उन्हें जो बाइडेन का सामना करना होगा जो कुछ लोगों की राय में अपेक्षाकृत कम मुश्किल होगा बशर्ते कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था में ख़ास सुधार न हो और लोगों का रुझान ट्रंप जैसी रुढ़िवादी नीतियों के प्रति बरकरार रहे और वो ये सोचें कि बाइडेन जैसे बुज़ुर्ग नेता को अब नया मौका देना ठीक नहीं है.

तो ऐसी स्थिति में रॉन डिसैंटिस अमेरिका के अगले राष्ट्रपति बन सकते हैं.

और अगर वो हार भी जाते हैं तो तुलनात्मक रूप में युवा होने के नाते वो अगली बार फिर चुनावी मैदान में उतर सकते हैं.

क्योंकि अगर ट्रंप पिछली बार हारने के बावजूद लौट सकते हैं तो डिसैंटिस क्यों नहीं लौट सकते!

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