New Zealand में उठी ईसाई राष्ट्र की मांग, ऑकलैंड में रैली के दौरान धार्मिक झंडों में लगाई आग
Religious Flags Burnt in New Zealand: न्यूजीलैंड जैसे शांतिप्रिय और विविधता को अपनाने वाले देश में हाल ही में एक ऐसी घटना घटी जिसने वहां रह रहे अल्पसंख्यक समुदायों की चिंता बढ़ा दी है। ऑकलैंड की सड़कों पर एक कट्टरपंथी ईसाई संगठन द्वारा आयोजित रैली के दौरान न सिर्फ धार्मिक झंडों को अपमानित किया गया, बल्कि हिंदू, सिख, बौद्ध और इस्लाम धर्म से जुड़े प्रतीकों को खुलेआम जलाया गया।
LGBTQ+ समुदाय और मीडिया को भी इस विरोध का निशाना बनाया गया। रैली में शामिल लोगों ने न्यूजीलैंड को 'ईसाई राष्ट्र' बनाने की मांग की और "नो इमिग्रेशन विदाउट असिमिलेशन" जैसे नारे लगाए। यह सब देखकर भारतीय समुदाय, जो न्यूजीलैंड की तीसरी सबसे बड़ी आबादी है, ने इस घटना की आलोचना की और सभी धर्मों और संस्कृतियों का सम्मान बनाए रखने की अपील की।

ऑकलैंड में हुआ विवादित मार्च
न्यूजीलैंड के ऑकलैंड शहर में 21 जून को यह रैली आयोजित की गई थी। इस घट्न ने देश के सामाजिक ताने-बाने को हिला कर रख दिया है। कट्टरपंथी ईसाई नेता ब्रायन तामाकी के समर्थकों ने हिंदू, सिख, बौद्ध, इस्लामिक और अन्य धार्मिक झंडों को फाड़ा, पैरों तले रौंदा और कुछ को आग के हवाले कर दिया। ये सब एक प्रदर्शन के दौरान हुआ, जिसमें सैकड़ों लोग शामिल थे। इस घटना के बाद देश की कई जातीय और धार्मिक समुदायों ने एकता और सौहार्द की अपील की है।
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"ईसाई राष्ट्र" की मांग
यह मार्च ऑकलैंड की क्वीन स्ट्रीट पर निकाला गया था। तामाकी ने इसे "ईसाई मूल्यों, कीवी पहचान और देश के भविष्य" के समर्थन में बताया। उन्होंने अपने भाषण में "कॉमनवेल्थ क्रूसेड" चलाने की घोषणा की, जिसका मकसद है ईसाई देशों को फिर से "पुनर्स्थापित" करना। इस अभियान को न्यूजीलैंड की बहुसांस्कृतिक पहचान पर सीधा हमला माना जा रहा है।
धर्मनिरपेक्षता पर सवाल
रैली से पहले, तामाकी और उनके साथियों ने प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन को एक खुला पत्र भेजा, जिसमें न्यूजीलैंड को धर्मनिरपेक्ष देश मानने की नीति को वापस लेने की मांग की गई।
भारतीय मूल के लोगों की बड़ी आबादी
न्यूजीलैंड की कुल आबादी 52.2 लाख है, जिनमें भारतीय मूल के लोग तीसरे सबसे बड़े समुदाय (2.92 लाख) हैं। उनसे आगे यूरोपीय (30.99 लाख) और माओरी समुदाय (8.87 लाख) हैं। भारतीयों में ज़्यादातर हिंदू और सिख हैं।
धार्मिक प्रतीकों का अपमान
रैली की शुरुआत ऑटिया स्क्वायर से हुई, जहां विभिन्न धर्मों के झंडों के साथ-साथ LGBTQ+ समुदाय और मुख्यधारा मीडिया के झंडों को भी अपमानित किया गया। कई झंडों को जला दिया गया। प्रदर्शनकारियों ने "नो इमिग्रेशन विदाउट असिमिलेशन" जैसे नारे भी लगाए।
पुलिस की मौजूदगी में हुआ सबकुछ
पुलिस और फायर ब्रिगेड मौके पर मौजूद थे, लेकिन किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई। आग बुझाने से पहले ही प्रदर्शनकारियों ने झंडों में लगाई आगे को खुद ही बुझा दिया।
भारतीयों का इतिहास
भारतीयों का न्यूजीलैंड से संबंध 18वीं सदी से है, जब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के जहाज ऑस्ट्रेलिया की यात्रा के दौरान यहां रुकते थे। इन जहाजों में भारतीय नाविक और सैनिक होते थे, जिनमें से कुछ न्यूजीलैंड में बस गए। 1980 के दशक तक यहां ज्यादातर गुजराती समुदाय के लोग रहते थे। इसके बाद पंजाबी समुदाय की संख्या भी बढ़ी।
सांस्कृतिक विविधता पर हमला
उप प्रधानमंत्री डेविड सीमोर ने इस रैली की निंदा करते हुए कहा कि न्यूजीलैंड विविधता को अपनाने वाला देश है और ऐसे अभियान देश की आत्मा के खिलाफ हैं। उन्होंने कहा कि इमीग्रेशन उन लोगों के लिए खुला है जो एक बेहतर, सहनशील समाज बनाना चाहते हैं।
नफरत से जुड़े अपराधों में बढ़ोतरी
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, न्यूजीलैंड में 2020 के बाद से जितने भी हेट क्राइम दर्ज हुए हैं। उनमें से करीब 75% मामले नस्ल या जातीयता के आधार पर हुए। ऐसे में इस तरह के अभियानों को देश में नफरत फैलाने का कारण माना जा रहा है।
सरकार की प्रतिक्रिया
जातीय समुदाय मंत्री मार्क मिशेल ने इस घटना को "चौंकाने वाला" बताया और कहा कि न्यूजीलैंड लॉ कमीशन ऐसे मामलों से निपटने के लिए सख्त कानून बना रहा है। इस घटना के बाद न्यूजीलैंड के विभिन्न जातीय समुदायों ने शांति, सौहार्द और सभी धर्मों के प्रति सम्मान बनाए रखने की अपील की है। उनका कहना है कि देश की खूबसूरती इसकी विविधता में है और इसे किसी भी हाल में टूटने नहीं दिया जाएगा।
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