एक म्यान "नेपाल" में दो तलवार "भारत-चीन" कैसे?
कहा जाता है कि एक म्यान में दो तलवार नहीं रखे जा सकते। लेकिन नेपाल इस कहावत को गलत सिद्ध करने की दिशा में काम कर रहा है। जी हां नेपाल कुछ ऐसा कर रहा है, कि भारत भी उससे खुश रहे और चीन से उसके संबंध और ज्यादा प्रगाढ़ हो जायें। चलिये पढ़ते हैं कि आखिर हिमालय की गोद में बसे इस छोटे से देश में चल क्या रहा है।
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नेपाल को यह पता है कि हिन्दी-चीनी भाई-भाई वाला नारा खत्म हो गया है। यानी भारत और चीन के बीच सीमा विवाद समेत कई अहम मुद्दे पर टकराव की स्थिति बनी हुई है, फिर भी वह चीन से निकटता बढ़ाकर भारत को मुंह चिढ़ाने की कोशिश में है।
दरअसल, यह चर्चा इसलिए करनी पड़ रही है कि नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली 20 मार्च, 2016 को एक हफ्ते के लिए चीन दौरे पर रवाना हुए हैं।
न्योता जिससे भारत खुश नहीं
बताते हैं कि नेपाल में करीब 20 हज़ार तिब्बती शरणार्थी हैं। चीन ने अब नेपाल से नई प्रत्यर्पण संधि करने को कहा है। चीन का कहना है कि विदेशों से सहायता प्राप्त ग़ैरसरकारी संगठन यानी एनजीओ और दूसरी ताक़तें चीन में असंतोष बढ़ा रही हैं। उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई के लिए आपसी क़ानूनी सहायता समझौता किया जाना चाहिए।
चीन का यह रवैया भारत, नेपाल और चीन रिश्तों पर पहले के नज़रिये के उलट है, जिसमें भारत की नेपाल में सबसे अधिक दिलचस्पी रहती थी। इससे साफ़ संदेश जाता है कि चीन की नेपाल में दिलचस्पी भले अधिक न हो, पर कुछ कम भी नहीं है।

ओली चीन को नेपाल में पनबिजली योजनाओं में बड़े पैमाने पर निवेश का न्योता देने जा रहे हैं। शुरू में यह निवेश 2200 मेगावाट की तीन परियोजनाओं के लिए होगा। इसके अलावा, चीन को नेपाल की मुख्य पर्यटन नगरी पोखरा में अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा बनाने का प्रस्ताव भी दिया जाएगा। ज़ाहिर है ये ऐसे न्योते हैं, जिनसे भारत को खुशी नहीं होगी। चीन ने पिछले साल अप्रैल में भूकंप से तबाह हुए नेपाल के इलाक़ों के पुनर्निर्माण में भी दिलचस्पी दिखाई थी।
तब गलतफहमी थी तो अब क्या?
गौरतलब है कि बीते फरवरी माह में भारत दौरे पर आए नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली ने कहा था कि हाल के दिनों में दोनों देशों के बीच जो ग़लतफ़हमी पैदा हुई थी, वह अब दूर हो गई हैं। इस दौरान भारतीय पीएम नरेन्द्र मोदी ने स्पष्ट किया था कि नेपाल में लागू नए संविधान की सफलता आम राय और संवाद पर निर्भर करेगी। भारत हमेशा नेपाल में शांति और विकास चाहता है।
ओली और मोदी की मुलाक़ात के दौरान दोनों देशों के बीच परिवहन और बिजली समेत कई क्षेत्रों में नौ सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर हुए थे। इसमें 25 करोड़ डॉलर यानी लगभग 17 अरब रुपए की मदद भी शामिल है, जो पिछले साल आए भूकंप के बाद पुनर्निर्माण के कामों पर ख़र्च होगा। तत्पश्चात ओली ने कहा था कि भारत हमेशा नेपाल का नज़दीकी दोस्त रहेगा। दरअसल, बीते वर्ष जब नेपाल की संविधान सभा एक अपरिपक्व संविधान लेकर आई, तो भारत ने इस पर आपत्ति जताई थी।
नेपाल में भारत विरोधी भावनाएं बढ़ीं
इससे दोनों देशों में तल्खी बढ़ी। भारत की तरफ़ से तेल और ज़रूरी सामानों की आपूर्ति कथित रूप से रोकने के कारण नेपाल में भारत विरोधी भावनाएं बढ़ीं। बताते हैं कि नाकाबंदी तब हटी जब ओली ने भारत आने के लिए यह शर्त रखी। इस शर्त में यह संदेश था कि वह पहले भारत का दौरा करने की दशकों पुरानी परंपरा तोड़कर चीन जा सकते हैं। भारत ने ओली का ज़ोरदार स्वागत किया, लेकिन दौरे में कुछ ख़ास निकलकर नहीं आया। इतना तक कि दोनों देश साझा बयान भी जारी नहीं किए। भारत के एक शीर्ष राजनयिक ने उस वक्त कहा था कि साझा बयान का मतलब है कि दोनों देशों के पास एक साझा संदेश है। मतलब ये कि दोनों के बीच फ़ासला बढ़ रहा है।
यह भी उल्लेखनीय है कि सितम्बर 2015 में भारतीय सीमा पर व्यापारिक अवरोध पैदा होने के बाद नेपाल ने चीन से आपसी सीमा पर जल्द-से-जल्द दो व्यापारिक मार्ग खोलने का अनुरोध किया था। नेपाल के नए संविधान पर भारत-नेपाल के बीच कूटनीतिक गतिरोध और भारत-नेपाल सीमा पर व्यापारिक अवरोध के बीच काठमांडू चीन के साथ व्यापार खोलने के विकल्प पर विचार करने लगा था। जबकि नेपाल का 90 फीसदी से अधिक व्यापार भारत के साथ होता है, क्योंकि दोनों देशों के नागरिकों को एक-दूसरे देश जाने के लिए वीजा की जरूरत नहीं पड़ती।
देरी के कारण समस्या बढ़ी
मीडिया के मुताबिक, भारत-नेपाल सीमा चौकियों पर आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बाधित होने के बीच नेपाल ने बीजिंग को उन मार्गों को फिर से चालू करने का अनुरोध किया था, जो अप्रैल 2015 में आए भूकंप के बाद अवरुद्ध हो गए थे। नेपाल के वाणिज्य और आपूर्ति मंत्रालय के अधिकारियों ने चीनी दूतावास के अधिकारियों से इस बाबत वार्ता की थी।
अधिकारियों ने तातोपानी और रासुवगधी सीमा चौकियों को खोलने में चीन की मदद मांगी थी। मंत्रालय के सचिव नइंद्र प्रसाद उपाध्याय ने चीन से किए गए अनुरोध की पुष्टि की थी। रासुवगधी मार्ग का औपचारिक संचालन दिसंबर 2014 में शुरू हुआ था। भूकंप के बाद बाराबिसे-तातोपानी-खासा और नुवाकोट-रासुवगधी-केरुंग मार्ग बंद हो गया था। उल्लेखनीय है कि तराई क्षेत्र में गत 40 दिन से हड़ताल के कारण भारत की ओर से नेपाल को आपूर्ति बाधित हो गई थी। साथ ही नेपाल में नया संविधान लागू होने के बाद भारत की ओर से सीमा चौकियों पर सख्त जांच और देरी के कारण समस्या बढ़ी।
क्या होगा भारत का रुख
ताजा प्रकरण यह है कि नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली 20 मार्च को एक सप्ताह के दौरे पर चीन के लिए रवाना हुए। ठीक एक महीने पहले उन्होंने भारत का भी दौरा किया था। लेकिन ओली का ये दौरा 'संतुलन साधने' की प्रक्रिया से कुछ बढ़कर है।
माना जा रहा है कि चीन और भारत नेपाल के विकास, शांति और स्थिरता में सहयोग कर वहां अपनी स्थिति मज़बूत करना चाहते हैं। मगर नेपाल में भारत की लोकप्रियता में गिरावट, इसकी देखरेख में चल रही परियोजनाओं में देरी और सबसे बड़ी बात नेपाल की राजनीति में भारत की बढ़ती मौजूदगी और हाल की नाकेबंदी के कारण को भारत को आत्मविश्लेषण करने की आवश्यकता है।
भारत यात्रा में ओली ने कहा था कि मेरी भारत यात्रा सफल रही और इससे द्विपक्षीय रिश्तों को हुए नुक़सान की भरपाई करने में मदद मिली। मगर चीन यात्रा के लिए ओली की लंबी मांग सूची में यह संदेश साफ़ है कि चीन नेपाल के लिए महत्वपूर्ण है। बहरहाल, देखना है कि नेपाल की चीन के साथ प्रगाढ़ता पर भारत अपना क्या रूख अख्तियार करता है और नेपाली पीएम ओली क्या करते हैं?












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