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Ramesh Shukla Death: भारत के इस ब्राह्मण के निधन पर UAE के शाही परिवार में पसरा मातम, भावुक कर देगी कहानी

Ramesh Shukla Death: यूं तो दूसरे देशों में कई भारतीय या फिर भारतीय मूल के लोगों का निधन होता है लेकिन कुछ भारतीय मूल के लोग ऐसे होते हैं जो अपनी छाप उस मुल्क पर छोड़ जाते हैं। इन्हीं में से एक थे रमेश शुक्ला, जिनका UAE में निधन हुआ तो UAE के शाही परिवार तक में मातम पसर गया। आइए जानते हैं कौन थे रमेश शुक्ला (Ramesh Shukla) जिन्हें कहा जाता था 'शाही फोटोग्राफर'।

कौन थे रमेश शुक्ला?

दुबई ने एक ऐसे प्रवासी भारतीय फोटोग्राफर को खो दिया, जिसने छह दशकों से भी ज्यादा समय तक UAE के बदलाव को अपने कैमरे में कैद किया। यह थे Ramesh Shukla, जिन्हें लोग प्यार से 'शाही फोटोग्राफर' कहते थे। उनके कैमरे ने UAE के गठन से लेकर उसके ग्लोबल हब बनने तक के ऐतिहासिक पल रिकॉर्ड किए। उनकी कई मशहूर तस्वीरें आज भी UAE की सामूहिक यादों और यहां तक कि मुद्रा पर दर्ज हैं।

Ramesh Shukla Death

87 साल की उम्र में निधन

रमेश शुक्ला का रविवार को दुबई के Rashid Hospital में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। वह 87 साल के थे। परिवार ने इस दुखद खबर की पुष्टि की। वह पिछले एक साल से हृदय संबंधी समस्याओं से जूझ रहे थे, लेकिन अपने आखिरी दिनों तक काम के लिए उतने ही जुनूनी रहे। उनके बेटे नील शुक्ला के मुताबिक, अस्पताल में भी वह उत्साहित रहते थे और अचानक हार्ट अटैक आने से पहले तक अपने प्रोजेक्ट्स की बातें कर रहे थे।

शेख हमदान ने दी श्रद्धांजलि

उनके निधन के बाद पूरे UAE में श्रद्धांजलि का सिलसिला शुरू हो गया। खास तौर पर Hamdan bin Mohammed bin Rashid Al Maktoum ने उनके योगदान को याद किया। उन्होंने कहा कि शुक्ला ने देश के अहम पलों को हमेशा के लिए संरक्षित कर दिया। वह सिर्फ फोटोग्राफर नहीं थे, बल्कि इतिहास के गवाह थे। उनकी तस्वीरों ने अमीरात के लोगों को अपना अतीत देखने का मौका दिया और दुनिया को UAE की तरक्की समझने का नजरिया दिया।

1965 में नाव से पहुंचे थे अमीरात

रमेश शुक्ला 1965 में मुंबई से नाव के जरिए अमीरात पहुंचे थे। उस समय UAE का गठन भी नहीं हुआ था। तब यहां न गगनचुंबी इमारतें थीं, न चौड़ी सड़कें और न ही तेल की समृद्धि ने पूरी तस्वीर बदली थी। उन्होंने उस दौर से लेकर आज के मॉडर्न UAE तक का सफर अपनी आंखों और कैमरे से देखा।

ऊंट दौड़ से मिला पहला बड़ा मौका

उनका पहला बड़ा ब्रेक शारजाह में ऊंट दौड़ की तस्वीरें खींचते समय मिला। उस कार्यक्रम में Zayed bin Sultan Al Nahyan और अन्य शासक मौजूद थे। उनकी बेहतरीन फोटोग्राफी ने उन्हें जल्द ही राजकीय कार्यक्रमों में जगह दिला दी। समय के साथ वह हर बड़े सरकारी आयोजन में नजर आने लगे, हमेशा शांत लेकिन हर अहम पल को कैद करते हुए।

'शाही फोटोग्राफर' की पहचान कैसे मिली?

हालांकि उन्हें कभी आधिकारिक तौर पर 'रॉयल फोटोग्राफर' की उपाधि नहीं दी गई, लेकिन यह नाम सबसे पहले Rashid bin Saeed Al Maktoum ने इस्तेमाल किया था। उन्होंने माना कि शुक्ला ने राष्ट्र के निर्माण और उसके महत्वपूर्ण पड़ावों को रिकॉर्ड करने में असाधारण भूमिका निभाई। इसके बाद यह नाम उनकी पहचान बन गया।

2 दिसंबर 1971 की ऐतिहासिक तस्वीर

रमेश शुक्ला की सबसे प्रतिष्ठित तस्वीरों में से एक 2 दिसंबर 1971 की है, जब Zayed bin Sultan Al Nahyan ने संघ की घोषणा पर हस्ताक्षर किए और UAE का आधिकारिक गठन हुआ। यह तस्वीर UAE के इतिहास की सबसे अहम छवियों में गिनी जाती है।

'स्पिरिट ऑफ द यूनियन' और 50 दिरहम का नोट

उनकी एक और मशहूर तस्वीर "स्पिरिट ऑफ द यूनियन" कहलाती है, जिसमें संस्थापक नेता UAE के झंडे के नीचे साथ खड़े हैं। यही तस्वीर आज UAE के 50 दिरहम के नोट पर छपी है। सोचिए, एक फोटोग्राफर की तस्वीर रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन जाए- यह उनकी कला की सबसे बड़ी पहचान है।

म्यूजियम में सुरक्षित है उनकी विरासत

आज उनकी तस्वीरें Etihad Museum और Zayed National Museum जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में सुरक्षित रखी गई हैं। ताकि आने वाली पीढ़ियां UAE के इतिहास को उनकी नजर से देख सकें। उनके निधन के साथ UAE के दृश्य इतिहास का एक बड़ा अध्याय खत्म हो गया।

कैमरे के पीछे शख्स नहीं इतिहास खड़ा

रमेश शुक्ला के परिवार में उनकी पत्नी तरुण शुक्ला और बेटे नील शुक्ला हैं। एक प्रवासी के तौर पर उन्होंने जिस देश को अपनाया, उसी देश ने उन्हें अपनी पहचान का हिस्सा बना लिया। युद्ध, राष्ट्रीय उत्सव, नेतृत्व परिवर्तन और बड़े ऐतिहासिक मौकों के दौरान रमेश शुक्ला हमेशा कैमरे के पीछे खड़े रहे। उनकी तस्वीरें संग्रहालयों, आधिकारिक रिकॉर्ड, मेट्रो डिस्प्ले, किताबों और यहां तक कि मुद्रा में भी जीवित हैं।

तस्वीरों में जिंदा रहेगी याद

सबसे अहम बात यह है कि उनकी तस्वीरें UAE की सामूहिक स्मृति का हिस्सा बन चुकी हैं। लेंस के पीछे का इंसान भले अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन जिस राष्ट्र की कहानी उन्होंने दर्ज की, वह उन्हें हमेशा याद रखेगा।

इस खबर पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट में बताएं।

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