Project-75I: किलर पनडुब्बी बनाने के लिए जर्मनी ने भारत को दिया 'गेमचेंजर' ऑफर, AIP टेक्नोलॉजी ही क्यों चाहिए?
Project-75I India: भारत सरकार इंडियन नेवी के लिए 6 नई पनडुब्बियां बनाना चाह रही है, जो AIP टेक्नोलॉजी से लैस हो और इसके लिए भारत सरकार ने एक प्रोजेक्ट का डिजाइन किया है, जिसका नाम 'Project-75I' है। I का मतलब इंडिया है।
इन पनडुब्बियों में फ्यूल सेल एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) टेक्नोलॉजी से लैस होगी, ताकि पनडुब्बियों के पानी के अंदर रहने की क्षमता में भारी इजाफा होने के साथ साथ इससे निकलने वाली आवाज भी काफी कम हो जाए, ताकि दुश्मन के सोनार पनडुब्बियों को ट्रैक ना कर सके।

लेकिन, AIP टेक्नोलॉजी में लिथियम-आयन बैटरी का इस्तेमाल होता है, जो पनडुब्बियों को लंबे समय तक समुद्र की गहराई में छिपे रहने की क्षमता देगी और जरूरत पड़ने पर तेज रफ्तार के साथ से अपने लक्ष्य का पीछा करने की क्षमता भी देती है। भारतीय नौसेना किसी ऐसे पनडुब्बी की तलाश में नहीं है, जो बहुत बड़ा और बहुत तेज हो, बल्कि भारतीय नौसेना का मकसद एक ऐसे पनडुब्बी का निर्माण करना है, जो समुद्र में लंबे समय तक बिना बिना किसी आवाज के छिपी रह सके और काफी ज्यादा घातक हो।
भारत के लिए जर्मनी का ऑफर क्या है?
लिहाजा, भारत ने अपने इस प्रोजेक्ट के लिए कॉन्ट्रैक्ट निकाला है और जर्मन शिपबिल्डर थिसेनक्रुप, जो भारतीय कॉन्ट्रैक्ट हासिल करने की रेस में सबसे आगे है, उसने अपनी 214-क्लास की पनडुब्बियों की पेशकश भारत से की है। इस पनडुब्बी में 212 CD क्लास पनडुब्बी में इस्तेमाल की गई एडवांस टेक्नोलॉजी और AIP के लेटेस्ट डेलवपमेंट को जोड़ा गया है, जो इस पनडुब्बी को घातक बना देती है।
212 CD क्लास की पनडुब्बियां, विशेष रूप से नॉर्वेजियन नौसेना के लिए बनाई गई हैं और बाल्टिक सागर में उसकी ऑपरेशनल जरूरत के मुताबिक उसे डिजाइन और डेवलप किया गया है।
भारत को जिस 214-क्लास की पनडुब्बियों की पेशकश की गई है, उसे स्पेशल तौर पर भारत की जरूरतों के मुताबिक डिजाइन किया जाएगा और ये 212 CD क्लास पनडुब्बी का नेक्स्ट जेनरेशन होगा, जिसमें AIP टेक्नोलॉजी के एडवांस वर्जन का इस्तेमाल होगा। यह लिथियम-आयन बैटरी से लैस होगी और इसमें एडवांस सेंसर और लड़ाकू प्रणाली होगी, साथ ही इसमें स्टील्थ सुविधाओं से कोई समझौता नहीं किया जाएगा।
प्रोजेक्ट-75I के लिए tkMS प्रोग्राम हेड डॉ. क्रिश्चियन फ्रूहलिंग ने यूरेशियन टाइम्स को एक स्पेशल इंटरव्यू में बताया है, कि "इस प्रोजेक्ट के लिए हमारे पास सबसे बड़ा एडवांटेज AIP टेक्नोलॉजी है। पनडुब्बी का डिजाइन HDW क्लास 214 पनडुब्बी की तरह ही होगा, जो वर्तमान में दुनिया भर की कई नौसेनाओं के साथ सेवा में है। इसे भारतीय नौसेना की जरूरतों के मुताबिक बनाया जाएगा और इसमें एडवांस टेक्नोलॉजी को शामिल किया जाएगा।"
उन्होंने कहा, कि "कुल मिलाकर करें, तो प्रोजेक्ट-75I के लिए हमारा डिजाइन सिद्ध है, एडवांस है और यह स्पेशली भारत के लिए है।"
AIP टेक्नोलॉजी को क्यों कहा जा रहा गेमचेंजर?
जर्मन कंपनी ने जो ऑफर दिया है, उस AIP सिस्टम में फ्यूल-सेल पर आधारित होगा और लिथियम-आयन बैटरी का कॉम्बिनेशन, भारतीय नौसेना के लिए एक गेम-चेंजिंग क्षमता लाएगा, क्योंकि भारतीय नौसेना का कार्यक्षेत्र एक लंबे समुद्री क्षेत्र, पश्चिम में अदन की खाड़ी से लेकर पूर्व में मलक्का जलडमरूमध्य तक फैला हुआ है। और जिस रफ्तार से चीन अपनी समुद्री क्षमता का विस्तार कर रहा है, उसे देखते हुए, भारतीय नौसेना को भी एक विश्वसनीय पनडुब्बी फोर्स की जरूरत है।
फ्यूल-सेल AIP, पनडुब्बी को कम गति पर लंबी दूरी तक चलने की क्षमता देता है, जबकि लिथियम-आयन बैटरी इसे अपने लक्ष्य तक पहुंचने के लिए तेज रफ्तार से आगे बढ़ने की इजाजत देती है। यूरोपीय देश इसका उपयोग नहीं करते हैं, लेकिन जापान इसका उपयोग कर रहा है। और अगर टीकेएमएस को अनुबंध मिलता है तो वह भारतीय नौसेना के लिए दो तकनीकों को एकीकृत करेगा।
फ्रूहलिंग ने कहा, कि "पनडुब्बियां लंबे समय तक पानी में डूबी रह सकती हैं और उनकी गति भी बहुत तेज हो सकती है। लिगाजा यह संयोजन समझ में आता है।" उन्होंने कहा, कि "सरल शब्दों में कहा जाए, तो यह तकनीक भारतीय नौसेना को पानी में डूबे रहने के दौरान बंगाल की पूरी खाड़ी को कवर करने में मदद करेगी। एक पनडुब्बी सबसे ज्यादा असुरक्षित तब होती है, जब वह अपनी इलेक्ट्रिक बैटरियों को चलाने के लिए ऑक्सीजन लेने के लिए पेरिस्कोप की गहराई पर होती है।
साथ ही, नई 212 और 214 क्लास की पनडुब्बियों में हाइड्रोजन-संचालित ईंधन सेल-आधारित AIP तकनीक उन्हें एक बार में तीन सप्ताह तक पानी में डूबे रहने की क्षमता देती है। इन समुद्री दिग्गजों को बनाने वाली tkMS के पास Howaldtswerke-Deutsche Werft (HDW) भी है, जो दुनिया की पहली युद्धकालीन पनडुब्बी बनाने वाली कंपनी है।
भारत की मौजूदा पनडुब्बी क्षमता कैसी है?
भारती नौसेना को इस वक्त 24 पनडुब्बियों की जरूरत है, लेकिन अभी बेड़े में सिर्फ 16 पनडुब्बियां ही हैं। और इनमें से भी सिर्फ 6 पनडुब्बियां ही नई हैं, बाकी पनडुब्बियां 30 साल से ज्यादा पुरानी हो चुकी हैं और अब वो रिटायर होने की तरफ बढ़ रही हैं।
भारतीय नौसेना पहले से ही 209 क्लास की पनडुब्बियों को ऑपरेट कर रही है। उनमें से दो, INS शिशुमार और INS शंकुश की मरम्मत की गई है। मझगांव डॉकयार्ड लिमिटेड (MDL) के साथ साझेदारी में जर्मन कंपनी tkMS इन मरम्मतों का काम कर रही है। दोनों कंपनियों ने संयुक्त रूप से भारतीय नौसेना के लिए चार पनडुब्बियों का निर्माण किया है।

टेक्नोलॉजी ट्रांसफर
INS शिशुमार और INS शंकुश की मरम्मत की गई है और दोनों कंपनियों ने भारतीय नौसेना के लिए 4 पनडुब्बियों का निर्माण संयुक्त रूप से किया है। जर्मन फर्म 1980 के दशक से MDL के साथ काम कर रही है। 209 क्लास की पहली दो नावें जर्मनी में बनाई गई थीं, और बाकी दो निर्माण भारत में एमडीएल शिपयार्ड में किया गया था। इन पनडुब्बियों को मरम्मत या नवीनीकरण के लिए कभी जर्मनी नहीं भेजा गया और यह काम पूरी तरह से NDL ही करता है।
और फिर से ये दोनों ही कंपनियां प्रोजेक्ट-75I के लिए बोली लगाने के लिए एक साथ आ रही हैं।
डॉ. क्रिश्चियन फ्रूहलिंग ने कहा, कि "पश्चिमी देशों के लिए पनडुब्बियां बनाने में tkMS अद्वितीय है, जिसका इतिहास अन्य देशों में पूरी तरह से स्वायत्त पनडुब्बी इंडस्ट्री के निर्माण को सक्षम करने का है।"
प्रोजेक्ट-75I के तहत, पहली नाव से लेकर आगे तक पनडुब्बियों का निर्माण पूरी तरह से भारत में किया जाएगा। tkMS डिजाइन और महत्वपूर्ण एलिमेंट्स की आपूर्ति करेगा। वहीं, MDL इस प्रोजेक्ट के लिए बोली लगाने वाली कंपनी होगी, जबकि tkMS विदेशी सहयोगी होगा।
माना जा रहा है, कि कॉन्ट्रैक्ट फाइनल होने के बाद पहली पनडुब्बी को बनने में कम से कम 7 साल लगेंगे। और उसके बाद हर साल एक पनडुब्बी का निर्माण हो सकेगा। फ्रूहलिंग ने कहा, कि "हमने MDL के साथ मिलकर प्रोजेक्ट डिजाइन का काम शुरू कर दिया है।"
वहीं, इंडियन नेवी से कॉन्ट्रक्ट हासिल करने की इस रेस में स्पेन की नवांटिया भी है, लेकिन उसके पास अभी तक तक ऑपरेशनल AIP टेक्नोलॉजी नहीं है। लिहाजा, अब यह देखने वाली बात होगी, कि भारत सरकार जर्मन कंपनी को कॉन्ट्रैक्ट देती है, या फिर स्पेन की कंपनी के AIP टेक्नोलॉजी क्षमता हासिल करने का इंतजार करती है।
वहीं, मोदी सरकार के एक बार फिर से सत्ता में आने के बाद माना जा रहा है, कि भारत में पनडुब्बियों के निर्माण के लिए सरकार-से-सरकार अनुबंध एक संभावना है। यानि, भारत सरकार और जर्मनी की सरकार के बीच कॉन्ट्रैक्ट पर साइन हो सकती है। लेकिन, भारत के लिए यह क्षमता हासिल करना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि चीन लगातार काफी ज्यादा शांत रहने वाली और समुद्र में का्फी लंबे समय तक छिपकर रहने वाली पनडुब्बियों के निर्माण के लिए आगे बढ़ रहा है और उसकी पनडुब्बियां हिंद महासागर क्षेत्र में अब लगातार दिखाई दे रही हैं।
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