Explainer: नेपाल सरकार में चीन के पालतू केपी शर्मा ओली की एंट्री, भारत के साथ रिश्तों पर क्या पड़ेगा असर?
मालदीव के बाद अब भारत के एक और पड़ोसी देश नेपाल में चीनी समर्थित सरकार बनने जा रही है। नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल प्रचंड ने सोमवार को पूर्व प्रधानमंत्री केपी ओली के साथ नया गठबंधन बनाने का ऐलान किया है। इसके साथ ही प्रचंड और पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा की पार्टी नेपाली कांग्रेस का 15 महीने पुराना गठबंधन टूट गया है।
पीएम प्रचंड और देउबा की पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में खटास के बाद यह गठबंधन टूटा है। सत्तारूढ़ कांग्रेस और सीपीएन के बीच लंबे समय से अविश्वास पनप रहा था। नई सरकार में पुष्प कमल दहल प्रचंड ही पीएम रहेंगे। उन्होंने बिहार में नीतीश कुमार की तरह विपक्षी पार्टी संग सांठगांठ कर सबसे बड़ी पार्टी को सरकार से दूर कर दिया है।

इस बदलाव के बाद एक बार फिर से नेपाल में पूर्ण रूप से वामपंथी पार्टी की सरकार बन गई है। प्रचंड के साथ-साथ ओली को भी चीन की तरफ झुकाव के लिए जाना जाता है। दोनों नेता एक ही पार्टी में थे लेकिन कम्युनिष्ट पार्टी में टूट के बाद दोनों की राह अलग हो गई थी।
भारत विरोधी नेता हैं ओली
नेपाल में केपी शर्मा ओली 2018 से मई 2021 के बीच प्रधानमंत्री थे। प्रधानमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल अपने चीनी पक्षपाती फैसलों और भारत विरोधी भावनाओं को भड़काने वाले बयानों के लिए मशहूर था।
उनके कार्यकाल के दौरान 2020 में भारत और नेपाल के बीच सीमा को लेकर एक विवाद सामने आया था। ओली सरकार ने भारत के एक हिस्से को अपना दिखाते हुए नया नक्शा जारी किया था, जिसका भारत ने आधिकारिक तौर पर विरोध किया था। नेपाल में तब संसद ने नए नक्शे को अप्रूव कर दिया था।
अपने कार्यकाल में ओली ने 1950 की भारत-नेपाल मैत्री संधि को संशोधित करने का भी समर्थन किया था। नवंबर में भी वह चुनाव प्रचार के दौरान सीमा विवाद का जिक्र करते रहे। 2020 में प्रधानमंत्री रहने के दौरान केपी शर्मा ओली ने आरोप लगाए थे कि काठमांडू और नई दिल्ली में उन्हें हटाने की साज़िश रची जा रही है।
प्रचंड की भी चीन से करीबी
प्रचंड भी कई बार भारत विरोधी बयान दे चुके हैं। उन्होंने ये तक कहा दिया था कि भारत और नेपाल के बीच जो भी समझौते हुए हैं, उन्हें खत्म कर देना चाहिए। 2016-2017 में भी प्रचंड के हाथ में सरकार की कमान रही। इस दौरान उन्होंने कहा था कि नेपाल अब वो नहीं करेगा, जो भारत कहेगा।
पिछले कुछ सालों से देखा जा रहा है कि प्रचंड का रुझान भारत की ओर है। देउबा के साथ सरकार चलाने की वजह से भी वह भारत विरोध से दूर नजर आए। दरअसल नेपाली कांग्रेस नेता शेर बहादुर देउबा को भारत समर्थक माना जाता है। इससे पहले जब देउबा सत्ता में थे तो उन्होंने भारत के साथ रिश्ते सामान्य किए थे। अब जब प्रचंड अपने पुराने साथी के साथ जुड़ गए हैं तो उनका भारत के प्रति रुख देखने लायक होगा।
प्रचंड-ओली से भारत को रहना होगा सावधान
साल 2020 में जब ओली प्रधानमंत्री थे तो वे चीन के साथ BRI करार पर ज्यादा उत्सुक नजर आते थे। ऐसे में अब जब एक बार फिर से कम्युनिस्ट सरकार बन गई है तो भारत के लिए परेशानी बढ़ सकती है। चीन, भारत को चौतरफा घेरने के लिए नेपाल की जमीन का इस्तेमाल कर सकता है।
ओली के PM रहते ही नेपाल का विवादित नक्शा जारी हुआ था। इस नक्शे में नेपाल ने भारत के साथ लगे विवादित इलाकों- कालापानी और लिपुलेख को अपना हिस्सा बताया था। नई सरकार में ओली की मौजूदगी इन मुद्दों पर फिर से सिर उठा सकती है।












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