जो सम्मान विंस्टन चर्चिल और नेल्सन मंडेला को मिला वही सम्मान पीएम मोदी को भी
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पहले ही यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत किसी देश का पिछलग्गू नही हो सकता। हमारी स्वतंत्र विदेशनीति है। हम तटस्थ भी नहीं है। हम शांति के पक्षधर हैं। जो राष्ट्र संघर्ष को खत्म कर अमन-चैन लाना चाहते हैं, हम उनके साथ हैं। वर्तमान अंतराष्ट्रीय परिस्थितियों में दुनिया को यह समझना होगा कि वह भारत को किस मुकाम पर देखना चाहती है। यह नये भारत का एलान है।
भारत-अमेरिका संबंध एक नये दौर में
अमेरिका में पहली बार किसी राष्ट्राध्यक्ष ( प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी) के लिए इतना उत्साह देखा जा रहा है। अमेरिका में जो सम्मान कभी विंस्टन चर्चिल और नेल्सन मंडेला को मिला था वही सम्मान भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को मिल रहा है। कूटनीति ने यह तय कर दिया है कि अगर भारत और अमेरिका मिल जाएं तो कुछ भी हासिल कर सकते हैं। इससे आर्थिक और सामरिक प्रगति के सभी लक्ष्य पूरे किये जा सकते हैं। ऐसा नहीं है कि भारत अपने परम्परागत मित्र रूस (पहले सोवियत संघ) की उपेक्षा कर अमेरिका से दोस्ती बढ़ा रहा है।

भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर का कहना है, भारत-रूस संबंध 60 साल पुराने हैं। इन 60 सालों में हमने कभी भी अपने विचार नहीं बदले। हम आगे भी रूस से मैत्री संबंध बनाये रखेंगे। भारत, अमेरिका और रूस, दोनों से दोस्ती रखेगा लेकिन करेगा वही जो देशहित में
होगा। रूस-यूक्रेन युद्ध के समय भारत ने रूस से सस्ता तेल खरीदने का फैसला देशहित में लिया था। इस मामले में भारत ने अमेरिकी दबाव की परवाह नहीं की थी। जब वक्त आया तो भारत ने अमेरिका से परमाणु समझौता (मनमोहन सरकार के समय) भी किया था। विदेश नीति में देशहित ही सर्वोपरी है।
भारत की बढ़ती हुई ताकत से अमेरिका भी वाकिफ
दुनिया में भारत के बढ़ते प्रभाव से व्हाइट हाउस भी वाकिफ है। व्हाइट हाउस के एक शीर्ष अधिकारी कैंपबेल ने कुछ समय पहले कहा था, भारत केवल अमेरिका का सहयोगी ही नहीं बल्कि वह एक स्वतंत्र और शक्तिशाली देश बनना चाहता है। वह महाशक्ति बनने की राह पर है। इसलिए अमेरिका को अपनी क्षमता का इस्तेमाल भारत के साथ समन्वय स्थापित करने में किया जाना चाहिए। हम अंतरिक्ष, सुरक्षा,
शिक्षा, जलवायु और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में एक साथ कम कर सकते हैं। हमारी दोस्ती केवल चीन की चिंता के कारण नहीं है बल्कि हम अपनी भागीदारी रचनात्मक स्तर पर ले जाना चाहते हैं। अमेरिका की इस सोच का मतलब है अब उसका भारत के प्रति नजरिया बदल गया। आज से 20 साल पहले द्विपक्षीय संबंधों की जो बाधाएं थीं, दोनों देश उसे पार कर अब नयी भूमिका निभाने को तैयार हैं।
भारत के उदय से एशिया का शक्ति संतुलन बदला
संयुक्त राष्ट्र महासभा के साबा करोसी ने कहा है, कुछ महीने पहले मैं दिल्ली में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मिला था। वे एक दूरदृष्टि और रणनीतिक सोच वाले नेता हैं। वह इसके बारे में बिल्कुल स्पष्ट हैं कि आधुनिक भारत को अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में कहां दिखना चाहिए। यानी अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में भारत का महत्व बढ़ गया है। नये भारत के उदय से एशिया का शक्ति संतुलन प्रभावित हुआ है और इससे चीन को चुनौती मिल रही है। एशिया की महाशक्ति बनने के लिए चीन भारत को पीछे ढकेलन चाहता है और इसके लिए वह सीमा पर तनाव बढ़ा कर युद्ध का भय पैदा कर रहा है। लेकिन भारत ने चीन को उसी की भाषा में जवाब देकर उसके मंसूबे पूरे नहीं होने दिये हैं। गलवान की घटना इसका प्रमाण है। लेकिन यह तो तय है कि चीन, भारत के लिए सीधा खतरा है। इसको साधने के लिए भारत को सैन्य शक्ति के साथ साथ अमेरिकी सहयोग और साझदारी भी बढ़ानी होगी।
2023 में भारत-चीन युद्ध की आशंका
एक अध्ययन के मुताबिक 2023 में भारत-चीन युद्ध की आशंका सबसे अधिक है। अमेरिका को डराने के लिए और एशिया में अपनी ताकत दिखाने के लिए चीन, भारत पर आक्रमण कर सकता है। अगर वह ताइवान पर हमला करता है तो अमेरिका से सीधे युद्ध की नौबत आ जाएगी। जाहिर है चीन ऐसा कभी नहीं चाहेगा। अगर चीन, सीमा विवाद की आड़ में भारत पर आक्रमण करता है तो अमेरिका शायद ही इस मामले में सैन्य हस्तक्षेप करे। युद्ध के समय मित्र राष्ट्रों का सहयोग बहुत जरूरी होता है। जैसे पाकिस्तान के साथ 1971 के युद्ध में अगर सोवियत संघ ने भारत का सहयोग नहीं किया होता तो वह ऐतिहासिक विजय से वंचित भी हो सकता था। इस वजह से भारत के लिए भी अमेरिका का सहयोग जरूरी है। दूसरी तरफ अमेरिका को भी इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में प्रभाव स्थापित करने के लिए भारत की दोस्ती जरूरी है क्यों कि उसे चीन से चुनौती मिल रही है। इसके चलते ही भारत स्वतंत्र विदेश नीति पर कायम रह कर यह सहयोग हासिल
करना चाहता है।












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