एक तस्वीर ने दे दी इंसानों को 'टेंशन', देखिए 100 साल में कैसे गायब हो गया पूरा का पूरा ग्लेशियर
नई दिल्ली, 16 जून: दुनिया भर के देश ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) के प्रभावित हो रहे हैं। यह एक ऐसा मुद्दा है, जिसके बारे में मौजूदा वक्त में सिर्फ बातें की जा रही है, लेकिन इसके लिए ठोस कदम अभी तक नहीं उठाए जा रहे हैं, जिसका खामियाजा बदलते मौसम के तौर पर साफ देखा जा रहा है। आज के वक्त में दुनिया के काफी देशों में मौसम का हाल इसके नुकसान को बयां कर रही है। इस बीच जलवायु परिवर्तन का हैरान कर देने वाली तस्वीर सामने आई है, जिसने पिघलते ग्लेशियर की सच्चाई को एक फोटो के जरिए सबके सामने रखा है।

गंभीर खतरे में ग्लेशियर
दुनिया में ग्लोबल वार्मिंग का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है। हिमालय से लेकर आर्कटिक तक ग्लेशियर गंभीर खतरे में हैं। ऐसे में तेजी से पिघलते ग्लेशियर आने वाले वक्त में बड़े खतरे को न्योता दे रहे हैं। ग्लेशियर की बर्फ के नुकसान का मतलब साफ है भविष्य के पानी का नुकसान। यदि इन ग्लेशियरों को पिघलने से रोकने की दिशा में कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में बड़ा संकट आने को तैयार है। ऐसे की आने वाले खतरे से फोटोग्राफर नील ड्रेक ने लोगों का सामना कराया है।

ब्लोमस्ट्रैंडब्रीन ग्लेशियर की तस्वीर की रीक्रिएट
एक फोटोग्राफर ने ग्लेशियर की 1918 की एक तस्वीर को फिर से रीक्रिएट किया है, जिससे बताया जा सके कि पिछली सदी में इसका कितना हिस्सा गायब हो चुका है। फोटोग्राफर नील ड्रेक ने आर्कटिक क्षेत्र में ब्लोमस्ट्रैंडब्रीन ग्लेशियर के पिघल चुके हिस्से को दिखाने के लिए 100 साल के ज्यादा पुरानी (1918) एक तस्वीर को रीक्रिएट किया है। इन दोनों तस्वीरों के बीच की तुलना अब तक की सबसे हैरान कर देने वाली तस्वीरों में से एक है।

100 पुरानी तस्वीर ने बताई हकीकत
वायरल रेडिट पोस्ट में फोटोग्राफर नील ड्रेक ने अपने क्लिक ली गई एक तस्वीर शेयर की है, जिसमें दिखाया गया था कि ब्लोमस्ट्रैंडब्रीन ग्लेशियर, जो उत्तर नॉर्वे के एक द्वीप स्वालबार्ड में एक खाड़ी में है, वो पीछे हटता जा रहा है। ड्रेक ने इस तस्वीर के साथ एक और तस्वीर भी शेयर की, जो वर्ष 1918 में उसी समय की ली गई थी।

तेजी से पिघल रही बर्फ
इन तस्वीरों के लिए उन्होंने कहा, "मुझे पता था कि मैं महज एक तस्वीर खींचने से कहीं ज्यादा किसी अहम चीज का हिस्सा हूं।" ड्रेक ने कहा कि यह तस्वीर लोगों को सोचने पर मजबूर करने के लिए थी। कि लोग जलवायु को कैसे प्रभावित कर रहे हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक आर्कटिक समुद्री बर्फ हर दस साल में लगभग 13% की दर से पिघल रही है, और आर्कटिक में सबसे पुरानी और सबसे मोटी बर्फ में भी पिछले 30 वर्षों में 95% की गिरावट आई है। (सभी तस्वीरें प्रतीकात्मक)
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