तालिबान के लिए मौत का मैदान बना पंजशीर घाटी, 300 लड़ाकों का सफाया, घमासान जंग की आशंका

पंजशीर वो इलाका है, जहां तालिबान आज तक घुस भी नहीं पाया है। रिपोर्ट के मुताबिक, पंजशीर में 9 हजार से ज्यादा मिलीशिया और अफगानिस्तान सेना के पूर्व जवान मौजूद हैं।

काबुल, अगस्त 23: काबुल पर भले ही तालिबान का कब्जा हो चुका है लेकिन अफगानिस्तान में जंग अभी बाकी है। पंजशीर, जहां तालिबान आज तक जीत नहीं पाया है, वहां पर तालिबान के खिलाफ तमाम विद्रोही जमा होने लगे हैं, जिससे घबराए ताबिलान ने कहा है कि पंजशीर जीतने के लिए उसके सैकड़ों लड़ाके आगे बढ़ चुके हैं। लेकिन, तालिबान की अकड़ को उस वक्त करारा जवाब मिला, जब पंजशीर के विद्रोहियों ने 300 से ज्यादा तालाबानी आतंकियों को मौत के घाट उतार दिया। वहीं, रिपोर्ट है कि कई तालिबानी आतंकियों को पकड़ लिया गया है।

जंग का नया मैदान बना पंजशीर

जंग का नया मैदान बना पंजशीर

तालिबान ने कहा है कि उसके सैकड़ों लड़ाके पंजशीर घाटी की तरफ बढ़ चुके है। जो वर्तमान में युद्ध से तबाह अफगानिस्तान में तालिबान के खिलाफ विद्रोह का सबसे बड़ा केन्द्र बन गया है। तालिबान चाहता है कि वो हर एक ऐसी आवाज को खामोश कर दे, तो उसके खिलाफ हो। लेकिन, नेशनल रेसिस्टेंस फ्रंट के अहमद मसूद ने कहा है कि वह कट्टरपंथी इस्लामी समूह के आगे घुटने नहीं टेकेंगे। इसके साथ ही रिपोर्ट है कि कई और मिलिशिया संगठन भी पंजशीर में तालिबान के खिलाफ जुट गये हैं। अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति सालेह भी वहीं मौजूद हैं। वहीं, तालिबान के अलेमराह ट्विटर फीड ने कहा कि, सैकड़ों लड़ाके पंजशीर की ओर जा रहे हैं, क्योंकि "स्थानीय राज्य के अधिकारियों ने इसे शांतिपूर्वक सौंपने से इनकार कर दिया"। इस ट्वीट के साथ 14 सेकेंड का एक वीडियो भी अपलोड किया गया है, जिसमें एक हाईवे पर सफेद तालिबानी झंडे के साथ ट्रकों को दिखाया गया है।

अहमद मसूद के बेटे की ललकार

अहमद मसूद के बेटे की ललकार

1980 के दशक में अफगानिस्तान के सोवियत संघ विरोधी प्रतिरोध के मुख्य नेताओं में से एक अहमद शाह मसूद के बेटे मसूद ने कहा कि, अगर तालिबान ने पंजशीर घाटी पर आक्रमण करने की कोशिश की तो उनके समर्थक लड़ने के लिए तैयार बैठे हैं। उन्होंने काबुल के उत्तर-पश्चिम में पंजशीर घाटी में अपने गढ़ से टेलीफोन द्वारा रॉयटर्स को बताया कि, "हम तालिबान को यह अहसास दिलाना चाहते हैं, कि आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता बातचीत है। हम नहीं चाहते कि युद्ध छिड़ जाए।" उन्होंने और देश के उपराष्ट्रपति अमरुल्ला सालेह ने मिलकर मिलिशिया सेना का निर्माण किया है, जिसमें अफगानिस्तान सेना के पूर्व जवानों के साथ सैकड़ों अलग अलग मिलिशिया के लड़ाके शामिल हैं और उन्हीं लड़ाकों ने पंजशीर में बढ़ते 300 तालिबानी आतंकियों को मौत के घाट उतार दिया।

कैसे फंसे तालिबानी आतंकी ?

कैसे फंसे तालिबानी आतंकी ?

रिपोर्ट के मुताबिक, तालिबान ने सैकड़ों लड़ाकों को भेजने का ऐलान ट्विटर के जरिए किया था। तालिबान का यही अति-आत्मविश्वास उसके लिए जानलेवा बन गया। इन आतंकियों का नेतृत्व तालिबान का खूंखार आतंकी कारी फसीहुद दीन हाफिजुल्लाबह कर रहा था, लेकिन बलगान प्रांत की अंदराब की घाटी में पंजशीर के विद्रोही पहले ही घात लगाकर बैठे हुए थे, ताकि तालिबानी आतंकियों को सफाया किया जा सके। जैसे ही इस घाटी में उत्पात मचाते हुए तालिबानी आतंकी पहुंचे, उनके ऊपर पंजशीर के विद्रोही मौत बनकर टूट पड़े और 300 से ज्यादा आतंकियों को जहन्नुम भेज दिया। वहीं, सबसे बड़ी बात ये है कि तालिबान के सप्लाई रूट को भी ब्लॉक कर दिया गया है।

तालिबान के खिलाफ मजबूत गढ़

तालिबान के खिलाफ मजबूत गढ़

पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार हामिद मीर ने एक भारतीय न्यूज चैनल से बात करते हुए कहा कि, अगर तालिबान चाहता है कि वो अफगानिस्तान में शांति पूर्वक सरकार बनाए तो उसे विद्रोहियों को साथ लेकर ही चलना होगा। क्योंकि, अफगानिस्तान में कई मिलिशिया संगठन हैं, जो काफी ताकतवर हैं। उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई और अब्दुल्ला अब्दुल्ला का भी मिलिशिया के बीच में काफी पकड़ है, इसीलिए तालिबान को उनसे बातचीत करना पड़ रहा है। हामिद मीर का मानना है कि अगर तालिबान पंजशीर जैसे इलाकों पर कब्जे की कोशिश करता है, तो फिर मतलब साफ है कि अफगानिस्तान में अशांति का ही माहौल रहने वाला है, क्योंकि तालिबान के लिए सभी मिलिशियाओं को जीतना नामुमकिन है। आपको बता दें कि पंजशीर ऐसा इलाका है, जहां तालिबान कभी घुस भी नहीं पाया है और तालिबान चाहता है कि पंजशीर को जीतकर वो अपने सभी विद्रोहियों को खत्म कर दे।

पंजशीर में 9 हजार की आर्मी

पंजशीर में 9 हजार की आर्मी

एंटी तालिबान फोर्स के प्रवक्ता अली मैसम नाजरी के मुताबिक, पंजशीर में करीब 9 हजार से ज्यादा विद्रोही सैनिक जमा हैं और इनके अलावा मिलिशिया अलग से हैं। आपको बता दें कि ये मिलिशिया भी खुद को मुहाजित मानते हैं और तालिबान भी खुद को मिलिशिया ही मानता है। आप इसे इस तरह से समझ सकते हैं कि ये दो गुटों के बीच की लड़ाई है, जिसमें पलड़ा तालिबान का काफी भारी है, क्योंकि उसके पास अमेरिकी हथियार भी आ गये हैं, लेकिन तालिबान के लिए पंजशीर जीतना इसलिए मुश्किल है, क्योंकि जिस तरह तालिबान के लड़ाके पहाड़ों और गुफाओं का फायदा उठाकर अमेरिकी सेना पर हमला करते थे, उस तरह की गुरिल्ला वार में पंजशीर के मिलिशिया भी माहिर हैं। लिहाजा, पंजशीर में 9 हजार की फौज तालिबान के 50 हजार लड़ाकों पर भारी पड़ सकती है। इसको एक लाइन में आप इस तरह समझ सकते हैं कि तालिबान के 300 लड़ाकों को मारने के बाद भी विद्रोही गुट का एक भी लड़ाका घायल तक नहीं हुआ।

घमासान जंग की आशंका

घमासान जंग की आशंका

वहीं, 300 लड़ाकों के मारे जाने के बाद अब माना जा रहा है कि पंजशीर की घाटी में भारी जंग हो सकती है, क्योंकि एक्सपर्ट मान रहे हैं कि तालिबान इस हार को बर्दाश्त नहीं करेगा, क्योंकि काबुल के कब्जे के बाद अब वो किसी को भी बख्शने के मूड में नहीं है। ऐसे में वो पूरी ताकत के साथ पंजशीर पर हमला करेगा। हालांकि, अफगानिस्तान के जानकारों का मानना है कि अगर तालिबान अपनी बड़ी आर्मी को पंजशीर जीतने के लिए भेजता है तो उसके लिए वो बड़े घाटे का सौदा होगा। क्योंकि, पंजशीर जीतने के लिए तालिबान को कम से कम 30 हजार से ज्यादा लड़ाकों को भेजना होगा और 30 हजार लड़ाकों को भेजने का मतलब है, अफगानिस्तान के दूसरे हिस्सों से अपने लड़ाकों को बुलाना, ऐसे में एक्सपर्ट ये भी मानते हैं कि कहीं तालिबान का ये दांव उल्टा ना पड़ जाए। लेकिन, इतना तय माना जा रहा है कि पंजशीर तालिबान के लिए नासूर बन चुका है और घमासान जंग की आशंका बढ़ गई है।

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