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पाकिस्तानः इमरान ख़ान को सत्ता के शिखर तक पहुंचने में इतना वक़्त क्यों लगा

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    इमरान ख़ान
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    इमरान ख़ान

    इमरान अहमद ख़ान नियाज़ी खिलाड़ी ज़्यादा अच्छे हैं या राजनेता? इस बारे में लोगों की अलग-अलग राय दिखाई देती है, लेकिन इनके बारे में एक बात स्पष्ट है कि वो अपने लिए जो लक्ष्य चुन लेते हैं, उसे पूरा किए बग़ैर आराम से नहीं बैठते.

    1992 में टारगेट अगर विश्व कप जीतना था तो राजनीति के अखाड़े में कूदने के बाद केन्द्र में सरकार बनाना या प्रधानमंत्री बनना ही लक्ष्य बन गया. आज वो इस लक्ष्य के बिल्कुल क़रीब पहुंच चुके हैं, तक़रीबन हासिल कर चुके हैं.

    एक अच्छे खिलाड़ी के लिए सबसे बड़ी बात जीत होती है. वो कामयाबी के लिए लंबे संघर्ष और तन-मन की बाज़ी लगा देता है. जीत उसके लिए किसी भी खेल की इंतहा होती है, उसका आगाज़ नहीं.

    विश्व कप घर लाने और 1996 में तहरीक-ए-इंसाफ़ की बुनियाद रखने के बाद इमरान ख़ान ने केन्द्र में सरकार बनाने का अपना सबसे बड़ा लक्ष्य कायम किया. इस दौरान इन्हें 2013 में ख़ैबर पख्तुनख्वाह की प्रांतीय सरकार भी मिली जिसमें वो 2018 के लिए भरपूर नेट प्रैक्टिस कर सकते थे, लेकिन उन्होंने बज़ाहिर कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई.

    इमरान ख़ान
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    इनकी पूर्व पत्नी रेहम खान ने अपनी किताब में भी लिखा कि उन्होंने इमरान खान को पेशावर रहकर सूबे के विकास में अपना रोल अदा करने का प्रस्ताव कई बार दिया था, लेकिन ख़ान साहब ने एक न सुनी.

    इसकी ज़ाहिर एक ही वजह उन्होंने एक मुलाक़ात में बताई थी कि इससे वो केन्द्र पर तवज्जों नहीं दे पाते. यानी उनके सामने बड़ा लक्ष्य केंन्द्र में सरकार बनाना ही था.

    इमरान: खिलाड़ी होंगे या रहनुमा?

    अब जबकि बनी गाला की ऊंचाई से 'वज़ीर-ए-आज़म हाउस' साफ़ दिखाई देने लगा है तो इमरान खान उसमें स्थानांतरित होने पर कौन से इमरान ख़ान होंगे- खिलाड़ी या असल रहनुमा? उम्मीद ही की जा सकती है कि वो खिलाड़ी नहीं होंगे जो सिर्फ़ जीत के लिए खेलता है.

    ख़तरे की बात ये है कि क्या वो जीत के बाद भी सरकारी सरगर्मियों को गंभीरता से लेंगे या नहीं. उन्हें एक रहनुमा की तरह सरकार में आने के बाद बैठक दर बैठक की अध्यक्षता करनी होगी.

    https://www.youtube.com/watch?v=vghtJxsxTsw

    अब तक तो उन्हें हमने दिन में एकाध पार्टी मीटिंग ही करते देखा है. ख़ैर अब उन्होंने एक ब्रिटिश समाचार पत्र से कहा है कि वो सोशल लाइफ़ के लिए अब बहुत बूढ़े हो चुके हैं. हालांकि उनके समर्थक एक वरिष्ठ पत्रकार ने ख़तरे की घंटी ये कह कर बजा दी है कि उनके "ख़ैर ख़्वाह जितनी ज़्यादा एहतियात की तलक़ीन करते हैं, उतनी ही बे-एहतियाती मौसूफ़ करते हैं." यानी इनके शुभचिंतक जितना अधिक सतर्क रहने की हिदायत करते हैं, उतनी ही लापरवाही ये महोदय करते हैं.

    ब्रिटिश समाचार पत्र 'द गार्डियन' के पाकिस्तान में पूर्व संवाददाता दीकलन वॉल्श ने उन्हें एक "बुरा राजनेता" क़रार दिया जिनके विचार व संबंध की तुलना उन्होंने "बारिश में झूम रहे रिक्शे" से की थी.

    पाकिस्तान चुनाव
    Getty Images
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    इमरान की सरकार में क्या हो सकता है?

    इमरान ख़ान की एक और आदत जो उन्हें मुश्किल में डाल सकती है वो है किसी की "डिक्टेशन" न लेना. सुनते तो शायद सबकी हैं, लेकिन करते हमेशा अपनी ही हैं. इससे वो अन्य राज्य संस्थानों के लिए कितने क़ाबिल होंगे ये स्पष्ट नहीं.

    65 वर्षीय इमरान ख़ान अगर पिछले पांच सालों में ख़ैबर पख्तुनख्वाह में किसी कामयाबी का ज़िक्र करते हैं तो वो ये कि पुलिस को उन्होंने "डी-पॉलिटिसाइज़" कर दिया है. ये तो काफ़ी आसान है, असल बात तो तब होती अगर वो पुलिस को करप्शन-फ़्री बनाने की बात करते. ऐसा उन्होंने कभी भी अपने भाषणों में नहीं कहा.

    अगर कुछ सीखा तो ये था कि जवाबदेही के बिना नए संस्थान नहीं चल पाएंगे. भ्रष्टाचार का इस प्रांत में ख़ात्मा तो नहीं हुआ, हां तहरीक-ए-इंसाफ़ को समझ आ गया कि उनके लिए पुराने नाकारा पुर्जों को ही दोबारा उपयोगी बनाना बेहतर है.

    इनकी सरकार में अब 'क़ौमी एहतसाब ब्यूरो' की चांदी होगी और उसे खूब संसाधन मिलने की उम्मीद है. लेकिन वो भ्रष्टाचार पर क़ाबू पाने में कितने कामयाब होते हैं, ये मामला बहस का विषय रहेगा.



    इमरान ख़ान
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    इमरान को इतनी देर क्यों लगी?

    इमरान खान के साथ जुड़ा एक सवाल ये भी है कि आख़िर राजनीति के अखाड़े में मंज़िल पर पहुंचने में इतना वक़्त क्यों लगा. पाकिस्तान में तो कई बड़े राजनेता तुरंत या विरासत की राजनीति या फिर एस्टैबलिश्मेंट की मदद से सत्ता के गलियारों की सैर करना शुरू कर देते हैं. तो फिर इन्हें यहां पहुंचने में इतनी देर क्यों लगी?

    कुछ विशेषज्ञों के मुताबिक़ अपनी राजनीति की शुरुआती नर्सरी में वो उच्च विचारों के क़ैदी रहे. अपने विचारों को हल्का या इस पर किसी क़िस्म के बदलाव की कोशिश से उन्होंने दूरी रखी.

    लेकिन 2013 के आम चुनाव में जीत को इतने क़रीब से देखने के बाद उन्होंने विचार और अपने बनाए हुए उसूलों में नर्मी दिखाना शुरू किया और आख़िर में "इलेक्टिबल्स" को अपनी सफ़ में ला खड़ा किया जिन्हें शायद वो देखना भी पसंद न करते थे.

    इमरान ख़ान
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    इमरान ख़ान

    यही समझौते शायद उन्हें 'वज़ीर-ए-आज़म हाउस' की दहलीज़ पर ले आए हैं. वो और कितना बदलते हैं या नहीं, इसके लिए हमें ज़्यादा इंतज़ार शायद न करना पड़े. उनके 'हनीमून पीरियड' में ही इसके संकेत मिल जाएंगे.

    आने में सदा देर लगाते ही रहे तुम

    जाते रहे हम जान से आते ही रहे तुम

    मुस्लिम लीग (एन) के रहनुमा और पूर्व सूचना मंत्री मरियम औरंगज़ेब ने रावलपिंडी में पत्रकारों से बातचीत करते हुए सवाल उठाया है कि आख़िर नतीजे के एलान में देरी क्यों हो रही है. इनका सवाल था - "कि बंद कमरों में क्या हो रहा है, पत्रकारों को जाकर मालूम करना चाहिए."


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    BBC Hindi
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    English summary
    Pakistan Why did Imran Khan take so long to reach the summit of power

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