Pakistan: रामे, रामो राम:...बंटवारे के 77 साल बाद लाहौर यूनिवर्सिटी में पढ़ाई जाएगी 'संस्कृत'
Pakistan: बंटवारे (1947) के बाद पहली बार संस्कृत की पढ़ाई दोबारा शुरू हो गई है। लाहौर यूनिवर्सिटी ऑफ मैनेजमेंट साइंसेज (LUMS) ने संस्कृत का पूरा विश्वविद्यालय स्तर का कोर्स लॉन्च कर दिया है। यह पहले सिर्फ तीन महीने की वीकेंड वर्कशॉप थी, लेकिन जबरदस्त रिस्पॉन्स के बाद इसे चार-क्रेडिट कोर्स में बदल दिया गया।
पंजाब विश्वविद्यालय में छुपा है बड़ा संस्कृत खजाना
LUMS के गुरमानी सेंटर के डायरेक्टर डॉ. अली उस्मान कासमी ने बताया कि पंजाब यूनिवर्सिटी के पास दुनिया के सबसे समृद्ध संस्कृत पांडुलिपियों का कलेक्शन है। 1930 के दशक में विद्वान JCR Woolner ने ताड़पत्रों का बड़ा संग्रह तैयार किया था, लेकिन 1947 के बाद किसी पाकिस्तानी शोधकर्ता ने इसे हाथ तक नहीं लगाया। विदेशी रिसर्चर इसका इस्तेमाल करते हैं। अब स्थानीय स्कॉलर तैयार करके यह परंपरा वापस जीवित की जाएगी।

गीता और महाभारत के पाठ्यक्रम भी आएंगे
LUMS जल्द ही महाभारत और भगवद गीता पर भी कोर्स शुरू करने की योजना बना रहा है। डॉ. कासमी का मानना है कि अगले 10-15 साल में पाकिस्तान से संस्कृत, गीता और महाभारत पर रिसर्च करने वाले विद्वान तैयार होंगे।
वीकेंड वर्कशॉप से बनेगा पूरा सालभर का कोर्स
शुरुआत वीकेंड प्रोग्राम से हुई थी, जिसमें छात्र, शोधकर्ता, वकील, प्रोफेसर-सब शामिल हुए। भारी रिस्पॉन्स देखकर इसे रेगुलर यूनिवर्सिटी कोर्स बनाया गया। अभी सीटें सीमित हैं, लेकिन 2027 तक इसे एक साल का डिप्लोमा बनाने की योजना है।
पहल की जड़ में हैं डॉ. शाहिद रशीद
इस पूरी पहल के पीछे सबसे बड़ा नाम है-फोरमैन क्रिश्चियन कॉलेज के समाजशास्त्र प्रोफेसर डॉ. शाहिद रशीद। उन्हें संस्कृत में रुचि बहुत पहले से थी। अरबी और फ़ारसी सीखने के बाद उन्होंने संस्कृत पढ़ना शुरू किया और फिर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के ज़रिए कैम्ब्रिज की एंटोनिया रप्पेल और ऑस्ट्रेलियन इंडोलॉजिस्ट मैककॉमस टेलर से सीखा।
ऑनलाइन सीखकर बने संस्कृत शिक्षक
डॉ. रशीद ने लगभग एक साल में संस्कृत व्याकरण में गहरी पकड़ बना ली। LUMS के कहना पर उन्होंने अपने कॉलेज से स्टडी लीव ली और अब LUMS में संस्कृत पढ़ा रहे हैं। वे बताते हैं कि जब उन्होंने 'सुभाषित' यानी छोटे नैतिक श्लोक पढ़ाने शुरू किए, तो कई छात्र यह जानकर हैरान रह गए कि उर्दू में बड़ी मात्रा में शब्द संस्कृत से आए हैं।
छात्रों के लिए शुरुआत मुश्किल, फिर मज़ेदार
कई छात्रों को यह भी नहीं पता था कि संस्कृत और हिंदी अलग भाषाएं हैं। शुरू में यह भाषा कठिन लगी, पर तर्कसंगत संरचना समझने के बाद उन्हें इसे सीखने में मजा आने लगा-जैसे किसी मुश्किल पहेली को हल करने का मज़ा।
शास्त्रीय भाषाएं हमारी जड़ें
डॉ. रशीद कहते हैं कि आधुनिक भाषाएं शास्त्रीय भाषाओं, जैसे संस्कृत, फारसी, अरबी से ही निकली हैं। इनके बीच सिर्फ एक पतला सा पर्दा है। जब वह पर्दा हटता है, तो महसूस होता है कि ये भाषाएं हमारी अपनी ही हैं।
यूनिवर्सिटी का बड़ा भाषा इकोसिस्टम
डॉ. कासमी बताते हैं कि LUMS में पहले से ही पंजाबी, पश्तो, सिंधी, बलूची, अरबी और फ़ारसी पढ़ाई जाती हैं। संस्कृत इस पूरे भाषाई इकोसिस्टम को और मज़बूत बनाती है क्योंकि यह भारतीय-पाकिस्तानी साझा सांस्कृतिक विरासत का बड़ा हिस्सा है।
वेदों की जड़ें इसी क्षेत्र में, इसलए जरूरी?
कासमी कहते हैं कि कई इतिहासकार मानते हैं कि वेदों की रचना इसी क्षेत्र में हुई थी। ऐसे में संस्कृत को समझना और भी जरूरी है। कला, दर्शन, साहित्य-सबकी जड़ें वैदिक परंपरा में मिलती हैं।
राजनीतिक संवेदनशीलता के बावजूद बदल रहा माहौल
संस्कृत सीखने पर पाकिस्तान में कुछ संवेदनशील मुद्दे सामने आते हैं, लेकिन दोनों विद्वानों का कहना है कि बौद्धिक माहौल अब सकारात्मक दिशा में बदल रहा है। लोग सवाल ज़रूर पूछते हैं-"संस्कृत क्यों?"-लेकिन जब उन्हें समझाया जाता है कि यह भाषा पूरे दक्षिण एशिया की साझा धरोहर है, तो लोग इसे स्वीकार भी करते हैं।
पाणिनि का गांव पाकिस्तान में था
डॉ. रशीद यह भी बताते हैं कि संस्कृत व्याकरण के जनक पाणिनि का गांव आज के पाकिस्तान में था। सिंधु घाटी सभ्यता के दौर में भी यहां लेखन और साहित्य का गहरा इतिहास है। संस्कृत उनके अनुसार "एक विशाल सांस्कृतिक पर्वत" है-जिसे पाकिस्तान को अपना मानने में हिचकना नहीं चाहिए।
भाषा सेतु बन सकती है, दीवार नहीं
डॉ. रशीद कहते हैं-कल्पना करिए अगर भारत में हिंदू-सिख अरबी सीखें और पाकिस्तान में मुसलमान संस्कृत पढ़ें, तो दक्षिण एशिया एक नई शुरुआत कर सकता है। भाषाएं दीवार नहीं, पुल बन सकती हैं।
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