Explainer: पाकिस्तान का आधिकारिक ऐलान, तालिबान का अब नहीं करेगा समर्थन, पश्तूनिस्तान मूवमेंट से घबराया?
Pakistan Pashtunistan Movement: पाकिस्तान ने आठ नवंबर को आधिकारिक तौर पर ऐलान कर दिया, कि अब वो अंतर्राष्ट्रीय मान्यता दिलाने के लिए तालिबान का समर्थन नहीं करेगा और पाकिस्तान सरकार अपनी आधिकारिक नीति में बदलाव कर रही है।
इसके साथ ही, पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है, कि पाकिस्तान सरकार ने औपचारिक रूप से काबुल को सूचित किया है, कि वह अब अंतरिम अफगान तालिबान सरकार को कोई "विशेष विशेषाधिकार" नहीं देगा। यानि, पाकिस्तान सरकार ने साफ कर दिया है, तालिबान के साथ उसके संबंध अब खराब हो चुके हैं।
पाकिस्तान सरकार का ये फैसला, पाकिस्तान-अफगानिस्तान संबंधों में बहुत महत्व रखता है, क्योंकि वर्षों से अफगान तालिबान को पाकिस्तान का समर्थन मिल रहा है, जिसमें अगस्त 2021 में काबुल में अशरफ गनी के नेतृत्व वाली अफगानिस्तान रिपब्लिकन सरकार को सत्ता से हटाने में सक्रिय भागीदारी भी शामिल है।

पाकिस्तानी समर्थन हटने का मतलब?
पाकिस्तानी अवाम के लिए, अफगान तालिबान का उदय उसकी दशकों पुरानी अफगान नीति की जीत है और पाकिस्तान ने हमेशा से माना है, कि अफगानिस्तान में तालिबान के शासन का होना, भारत जैसे विरोधियों के खिलाफ उसकी बड़ी रणनीतिक जीत होगी, लेकिन 15 अगस्त 2021 को तालिबान के काबुल की सत्ता में आने के बाद पाकिस्तान के साथ उसके संबंध लगातार खराब होते चले गये।
इस्लामाबाद ने लगातार अफगान तालिबान पर आरोप लगाया है, कि उसने अपने क्षेत्र का इस्तेमाल पाकिस्तान तहरीक-ए-तालिबान (टीटीपी) जैसे पाकिस्तान विरोधी समूहों को पाकिस्तान के अंदर सीमा पार आतंकी गतिविधियों के संचालन के लिए करने की इजाजत देता है।
पाकिस्तान ने टीटीपी और बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) जैसे पाकिस्तान विरोधी समूहों को ऑपरेट करने में सहायता प्रदान करने के लिए अफगान तालिबान को जिम्मेदार ठहराया है। इस्लामाबाद हाल के महीनों में अपने जनजातीय क्षेत्र में विभिन्न सुरक्षा प्रतिष्ठानों को निशाना बनाकर किए गए आतंकवादी हमलों में वृद्धि के लिए अफगान तालिबान से टीटीपी को मिल रहे इस समर्थन को जिम्मेदार मानता है।
लेकिन, अफगान तालिबान के प्रवक्ता जबीउल्लाह मुजाहिद ने इस्लामाबाद की निंदा करते हुए साफ साफ शब्दों में कहा, कि पाकिस्तान की सुरक्षा बनाए रखने के लिए तालिबान जिम्मेदार नहीं है और पाकिस्तानी प्रतिष्ठान को अपने देश की सुरक्षा खुद करनी चाहिए और अगर वो अपने देश की सुरक्षा नहीं कर पा रहे हैं, तो उन्हें दूसरों को दोष देना बंद करना चाहिए।
मुजाहिद ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट में कहा, कि "उन्हें (पाकिस्तानी सरकार) अपनी घरेलू समस्याएं खुद ही सुलझानी चाहिए और अपनी नाकामयाबी के लिए अफगानिस्तान को दोष नहीं देना चाहिए।"
पश्तूनिस्तान मूवमेंट से डरा पाकिस्तान
इस्लामाबाद और काबुल में इस बढ़ते आपसी अविश्वास के बीच, पाकिस्तान ने 17 लाख अफगान शरणार्थियों को देश बाहर निकलने का फरमान सुना दिया और इस वक्त, पाकिस्तान से अफगान बाहर निकाले जा रहे हैं। पाकिस्तान की आर्मी और पुलिस, उन अफगानों की संपत्ति जब्त कर रही है, जो अभी तक पाकिस्तान से बाहर नहीं निकल पाए हैं।
जिसको लेकर तालिबान के रक्षा मंत्री मुल्लाह याकूब ने अफगान लोगों से पाकिस्तान की इकोनॉमी को बर्बाद करने का आह्वान कर दिया। आपको बता दें, कि मुल्लाह याकूब, तालिबान की स्थापना करने वाले मुल्ला उमर के बेटे हैं और उन्होंने, अफगानों को पाकिस्तान से निकाले जाने की घटना को 'बर्बर कार्रवाई' करार दिया है।
पिछले हफ्ते तक 2,50,000 से ज्यादा अफगान, पाकिस्तान से निकल चुके हैं।
लिहाजा, सवाल ये उठ रहे हैं, कि आखिर सिर्फ 2 सालों में ऐसा क्या होगा, कि पाकिस्तान और तालिबान आमने-सामने खड़े हो चुके हैं। इसका जबाव शायद उनके संबंधों के इतिहास और डूरंड लाइन है, जो पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सीमा को विभाजित करता है, लेकिन तालिबान इस डूरंड लाइन को नहीं मानता है।
जैसा कि हम सभी जानते हैं, डूरंड रेखा 19वीं शताब्दी के अंत में बनी थी, जब ब्रिटिश भारतीय सरकार ने अपने सचिव सर मोर्टिमर डूरंड के माध्यम से अफगानिस्तान के अमीर अब्दुर रहमान खान के साथ 12 नवंबर 1893 को अपने क्षेत्रों के बीच सीमाओं को चिह्नित करने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे।
लेकिन, अफगानिस्तान ने डूरंड लाइन को खारिज कर दिया।

क्या है डूरंड लाइन विवाद?
अफगानों का कहना है, कि इस मनमानी रेखा ने पश्तून गढ़ को भी विभाजित कर दिया है और पश्तूनों का एक बड़ा क्षेत्र पाकिस्तान को दे दिया गया है, जिसे वो अपने देश में मिलाकर ही दम लेंगे। इस लाइन को अफगानों ने कभी भी स्वीकार नहीं किया और अफगान शासन और सरकारों ने लगातार इसका विरोध किया गया है।
जैसे ही पाकिस्तान, ब्रिटिश भारत से एक अलग देश के रूप में उभरा, उसने डूरंड रेखा को अफगानिस्तान के साथ अपनी आधिकारिक सीमा बना लिया, लेकिन अफगानों ने इस औपनिवेशिक सीमा की वैधता पर विवाद किया और ब्रिटिश भारत सरकार के साथ सभी समझौतों को शून्य घोषित कर दिया।
31 जुलाई 1947 को, अफगानिस्तान के तत्कालीन प्रधान मंत्री शाह महमूद खान ने घोषणा कर दी, कि भारत-अफगान सीमा के संबंध में सभी समझौते ब्रिटिश भारतीय अधिकारियों के साथ ही खत्म हो चुके हैं, और इसलिए, ब्रिटिश भारत का अस्तित्व समाप्त होने के बाद वे सभी समझौते अमान्य हो जाएंगे।
इसके साथ ही, अफगानिस्तान ने एक स्वतंत्र पश्तूनिस्तान (या पख्तूनिस्तान) की स्थापना की मांग करने वाले समूहों को संरक्षण दिया, जिससे 1950 के दशक में दोनों देशों के बीच संबंध खराब हो गये थे।
सत्ता में आने के बाद तालिबान ने भी आधिकारिक तौर पर डूरंड लाइन को मानने से इनकार कर दिया, जो पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ा झटका था। यही नहीं, तालिबान ने डूरंड लाइन को आधार मानकर पाकिस्तान की तरफ से बनाई गई सीमा रेखा पर लगे कांटों के बाड़ को तोड़कर फेंक दिया।
पश्तूनिस्तान आंदोलन के लिए अफगान समर्थन दशकों से जारी है, जिससे इस्लामाबाद और काबुल के बीच द्विपक्षीय संबंधों में हमेशा से तनाव बना रहा है। वहीं, पाकिस्तान को डर रहा है, कि इस मूवमेंट से देश का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा, लिहाजा पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में अपने हितों को साधने के लिए मिले पहले अवसर का फायदा उठाया, जो देश पर सोवियत-रूसी कब्जे के कारण सामने आया था।

पाकिस्तान-अमेरिका नेक्सस
पाकिस्तानी सेना ने अपने अमेरिकी सलाहकारों और सऊदी प्रायोजकों के साथ मिलकर अफगानिस्तान को कम्युनिस्ट रूसियों से मुक्त कराने के लिए जिहाद का सहारा लिया। यह अभियान 1980 के दशक के अंत तक यूएसएसआर सेना की वापसी के साथ समाप्त हो गया।
रूसी कब्जे की समाप्ति ने अफगानिस्तान में अराजकता फैला दी, विभिन्न सरदारों की नज़र युद्ध की लूट पर थी। इस तरह, उन्होंने एक लंबे गृह युद्ध की शुरुआत की, एक अराजक माहौल जिसका फायदा पाकिस्तानियों ने 1996 में तालिबान बनाने के लिए उठाया।
तालिबान में मुख्य रूप से देवबंदी रुझान वाले मुजाहिदीन शामिल हैं, जिन्हें जातीय विचार से परे माना जाता है, जिन्होंने 1996 में मुल्ला मोहम्मद उमर के तहत अफगानिस्तान के पहले इस्लामी अमीरात की स्थापना के लिए अन्य जातीय ताकतों को हराया था।
9/11 के हमले के बाद 2001 में अमेरिकी नेतृत्व वाली गठबंधन सेना ने अफगानिस्तान पर हमला कर दिया और फिर तालिबान को काबुल से भागना पड़ा। विडंबना यह है कि पाकिस्तान ने अमेरिकी 'आतंकवाद के खिलाफ युद्ध' में भाग लेने से लाभ उठाया, जबकि डूरंड रेखा के लिए तालिबान के आंदोलन को अमेरिका ने छुआ तक नहीं। लिहाजा अमेरिका की वापसी के बाद भी डूरंड लाइन विवाद जारी रहा।
पाकिस्तान का मानना था, कि काबुल में तालिबान की सरकार डूरंड लाइन विवाद का मुद्दा नहीं उठाएगी और अफगानिस्तान उसके लिए बैकयार्ड बनकर रहेगा, लेकिन पाकिस्तान की ये सोच गलत साबित हो गई। तालिबान ने डूरंड लाइन के साथ साथ पश्तून आंदोलन का खुला समर्थन कर दिया है और पश्तूनिस्तान की मांग एक बार फिर से तेज हो गई है। वहीं, अफगानों के खिलाफ पाकिस्तान के हालिया दमन के बाद पूरी आशंका है, कि पश्तूनिस्तान की मांग और तेज होगी और पाकिस्तान के लिए देश को टूटने से बचाना एक बड़ी चुनौती साबित होगी।
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