Pakistan में हिंदू लड़कियां खतरे में? जबरन बना रहे मुसलमान, कम उम्र में शादी-रेप की शिकार, रिपोर्ट में खुलासा
Pakistan Hindu Girls Forcibly Converted: 22 अप्रैल 2026 को जेनेवा में संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदायों की महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ अपहरण, जबरन विवाह और धर्म परिवर्तन की 'निरंतर और व्यापक' घटनाओं पर गंभीर चिंता जताई है। UN के मुताबिक, दंडमुक्ति इस क्रूर प्रथा को लगातार बढ़ावा दे रही है। विशेषज्ञों ने साफ कहा कि कोई भी धर्म परिवर्तन जबरदस्ती से मुक्त होना चाहिए और विवाह पूर्ण स्वतंत्र सहमति पर आधारित होना चाहिए, जो नाबालिग पीड़ित के मामले में कानूनी रूप से असंभव है।
यह बयान पाकिस्तान में हिंदू और ईसाई अल्पसंख्यक लड़कियों की सुरक्षा को लेकर लंबे समय से उठ रहे सवालों को नई ताकत देता है। 2025 के आंकड़ों के अनुसार, जबरन विवाह के जरिए धर्म परिवर्तन का शिकार होने वाली महिलाओं और लड़कियों में 75 प्रतिशत हिंदू और 25 प्रतिशत ईसाई थीं। इनमें से 80 प्रतिशत घटनाएं सिंध प्रांत में हुईं। खासतौर पर 14 से 18 साल की किशोरियों को निशाना बनाया जा रहा है, जबकि कुछ पीड़ित इससे भी कम उम्र की हैं।

2025 के आंकड़े: हिंदू लड़कियां सबसे ज्यादा प्रभावित
UN विशेषज्ञों की रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में दर्ज अधिकांश मामलों में हिंदू समुदाय की युवतियां शिकार बनीं। सिंध प्रांत, जहां पाकिस्तान के अधिकांश हिंदू रहते हैं, इस समस्या का सबसे बड़ा केंद्र बन गया है। गरीबी, सामाजिक हाशिए पर रहना और लैंगिक असमानता इन लड़कियों को और कमजोर बनाते हैं। अपहरण के बाद उन्हें मुस्लिम पुरुष से शादी के लिए इस्लाम अपनाने पर मजबूर किया जाता है।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि ये पीड़ित शारीरिक और यौन शोषण, घरेलू हिंसा, सामाजिक कलंक और गंभीर मनोवैज्ञानिक आघात झेलती हैं। वे लगातार "आतंक के साये" में जीती हैं। पितृसत्तात्मक दबाव, राजनीतिक प्रभाव और सामाजिक बहिष्कार के कारण उन्हें अपनी धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्वायत्तता से वंचित कर दिया जाता है।
UN विशेषज्ञों ने क्या कहा?
UN के तीन प्रमुख विशेषज्ञों, समकालीन गुलामी पर विशेषज्ञ टोमोया ओबोकाता, धर्म या आस्था की स्वतंत्रता पर विशेषज्ञ नजिला गनी और अल्पसंख्यक मुद्दों पर विशेषज्ञ निकोलस लेवरात ने एक संयुक्त बयान में कहा कि ये महिलाएं और लड़कियां लगातार आतंक के साये में जीती हैं, उन पर दबाव डाला जाता है और पितृसत्तात्मक, राजनीतिक दबावों के चलते उन्हें धार्मिक स्वतंत्रता और स्वायत्तता से वंचित कर दिया जाता है। यह सब रुकना चाहिए।
मुस्लिम पुरुषों से विवाह के लिए इस्लाम कबूलने का दबाव
विशेषज्ञों ने जोर दिया कि गैर-मुस्लिम महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ यह व्यवस्थित भेदभाव है। उन्हें मुस्लिम पुरुषों से शादी करने के लिए इस्लाम अपनाने पर विवश किया जाता है। उन्होंने पहले 16 जनवरी 2023 और 11 अप्रैल 2024 को भी इसी तरह की प्रेस विज्ञप्तियां जारी की थीं, लेकिन स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ।
समस्या की जड़ें: व्यवस्थित भेदभाव और दंडमुक्ति
UN रिपोर्ट साफ बताती है कि यह कोई अलग-अलग घटना नहीं, बल्कि गहरी संरचनात्मक समस्या है। मुख्य कारण हैं:
- लैंगिक असमानता और पितृसत्ता: लड़कियों को संपत्ति की तरह देखा जाता है।
- गरीबी और सामाजिक बहिष्कार: अल्पसंख्यक परिवार अक्सर कमजोर होते हैं।
- धार्मिक असहिष्णुता: अल्पसंख्यकों के खिलाफ पूर्वाग्रह।
- दंडमुक्ति: पुलिस शिकायतों को खारिज कर देती है, उम्र का सही आकलन नहीं करती और जांच में देरी करती है। अदालतें अक्सर धार्मिक कानून का हवाला देकर पीड़ित को अपहरणकर्ता के साथ रहने को मजबूर कर देती हैं।
विशेषज्ञों ने चिंता जताई कि कानून प्रवर्तन अधिकारी पीड़ित परिवारों की शिकायतों को अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। जबरन धर्मांतरण की समय पर जांच नहीं होती और मुकदमा चलाने में विफलता रहती है।
UN की मांगें: क्या बदलाव चाहिए पाकिस्तान से?
UN विशेषज्ञों ने पाकिस्तान सरकार से तत्काल और ठोस कदम उठाने का आह्वान किया है। मुख्य सिफारिशें ये हैं:
- सभी प्रांतों और क्षेत्रों में विवाह की न्यूनतम आयु 18 वर्ष तय करना।
- जबरन धर्म परिवर्तन को अलग अपराध घोषित करना।
- मानव तस्करी और यौन हिंसा से संबंधित कानूनों को सख्ती से लागू करना।
- सभी आरोपों की निष्पक्ष, प्रभावी और शीघ्र जांच सुनिश्चित करना।
- दोषियों को न्याय के कटघरे में लाना।
- पीड़ितों के लिए व्यापक सहायता: सुरक्षित आश्रय स्थल, कानूनी मदद, मनोवैज्ञानिक परामर्श और परिवार में पुनर्एकीकरण कार्यक्रम।
विशेषज्ञों ने कहा कि धर्म या आस्था की स्वतंत्रता और समानता बिना किसी भेदभाव के सभी के लिए सुनिश्चित की जानी चाहिए।
क्यों है यह मुद्दा गंभीर?
पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदाय (खासकर हिंदू और ईसाई) पहले से ही सुरक्षा की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। UN के अनुसार, यह प्रथा न सिर्फ व्यक्तिगत जीवन बर्बाद करती है, बल्कि पूरे समुदाय में भय का माहौल पैदा करती है। अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो अल्पसंख्यक लड़कियों की स्थिति और बदतर हो सकती है।
यह समस्या सिर्फ सिंध तक सीमित नहीं, पूरे पाकिस्तान में फैली हुई है, लेकिन सिंध में इसकी तीव्रता सबसे ज्यादा है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन लंबे समय से इस पर आवाज उठाते आ रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत में बदलाव नजर नहीं आ रहा।
धार्मिक स्वतंत्रता की लड़ाई
UN विशेषज्ञों का यह बयान पाकिस्तान के लिए एक मजबूत संदेश है कि जबरन धर्मांतरण और जबरन विवाह मानवाधिकारों का उल्लंघन है और इसे रोकना अंतरराष्ट्रीय दायित्व है। हिंदू और ईसाई समुदायों की युवा लड़कियां आज भी 'आतंक के साये' में जी रही हैं।
यह सिर्फ आंकड़ों की कहानी नहीं, बल्कि सैकड़ों परिवारों की चीख है जिनकी बेटियां अपहरण का शिकार होकर हमेशा के लिए खो जाती हैं। पाकिस्तान सरकार को अब दंडमुक्ति की संस्कृति तोड़नी होगी, कानूनों को सख्त बनाना होगा और पीड़ितों को न्याय दिलाना होगा। धर्म की स्वतंत्रता बुनियादी मानवाधिकार है। जब तक अल्पसंख्यक लड़कियां सुरक्षित नहीं होंगी, पाकिस्तान का लोकतंत्र और मानवाधिकार रिकॉर्ड पर सवालिया निशान लगा रहेगा।
UN की यह चेतावनी सिर्फ पाकिस्तान के लिए नहीं, बल्कि पूरे विश्व के लिए है कि जबरन धर्मांतरण जैसी प्रथाओं को कहीं भी बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए।
(इनपुट- संयुक्त राष्ट्र की 22 अप्रैल 2026 की आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति)












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