भारत ने रूस से तेल खरीद तो लिया, लेकिन ला क्यों नहीं पा रहा है? मुश्किल में फंसी तेल कंपनियां
ओएनजीसी सहित कई भारतीय कंपनियों की रूसी तेल और गैस परिसंपत्तियों में हिस्सेदारी है, और जब से मास्को ने यूक्रेन पर आक्रमण किया है, भारत रूस से ज्यादा कच्चे तेल की खरीददारी कर रहा है...
नई दिल्ली, अप्रैल 27: अमेरिका और पश्चिमी देशों की आलोचनाओं के बाद भी भारत ने रूस से भारी मात्रा में कच्चे तेल का आयात तो कर लिया है, लेकिन भारतीय कंपनियों के लिए एक बड़ी मुसीबत पैदा हो गई है। मुसीबत ये है, कि आखिर भारतीय तेल कंपनियां रूस से कच्चे तेल को भारत कैसे लाए? भारत की प्रमुख तेल कंपनी ओनजीसी समेत कई और तेल कंपनियां रूस से तेल लाने में संघर्ष कर रही हैं।

भारतीय तेल कंपनियों की दिक्कत
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, सूत्रों का कहना है कि भारतीय तेल कंपनी ओएनजीसी ने रूस के सुदूर पूर्व से 7 लाख बैरल कच्चे तेल की खरीदारी कर ली है, लेकिन तेल भारत लाने के लिए ओएनजीसी को जहाज नहीं मिल पा रहा है, जो इस बात का संकेत है, कि मास्को के सबसे बड़े भागीदारों में से एक भारत को रूस के साथ व्यापार करने में जटिल पश्चिमी व्यापार प्रतिबंधों की वजह से परेशानी हो रही है, और सूत्रों ने इसकी पुष्टि भी की है।

रूस तेल कंपनी में हिस्सेदारी
दरअसल, ओएनजीसी सहित कई भारतीय कंपनियों की रूसी तेल और गैस परिसंपत्तियों में हिस्सेदारी है, और जब से मास्को ने यूक्रेन पर आक्रमण किया है, भारत रूस से ज्यादा कच्चे तेल की खरीददारी कर रहा है और लोकप्रिय यूराल क्रूड ग्रेड को तोड़ रहा है, जबकि अन्य खरीदारों ने रूस से तेल खरीदना या तो काफी कर दिया है, या बंद कर दिया है। जबकि, भारतीय तेल कंपनी ओएनजीसी की रूसी के तेल परियोजना सखालिन-1 प्रोजेक्ट में 20 प्रतिशत की हिस्सेदारी है, जो रूसी ग्रेड का उत्पादन करती है, जिसे सोकोल के रूप में जाना जाता है, जिसे ओएनजीसी निविदाओं के माध्यम से निर्यात करता है। सोकोल को ज्यादातर उत्तर एशियाई खरीदारों द्वारा खरीदा जाता है और दक्षिण कोरिया से लोड किया जाता है।

ट्रांसपोर्टेशन है बड़ी दिक्कत
दरअसल, रूस से तेल की शिपिंग में काफी बड़ी दिक्कतें हैं और सबसे बड़ी दिक्कत ये है, कि अगर जहाजों में भरकर तेल लाया जाए, तो फिर ऐसे जहाजों की जरूरत होती है, जो बर्फ की विशालकाय चट्टानों से ना टूटे और जब वो बर्फीले पानी में चले, तो जहाज के रास्ते में आने वाले छोटे-मोटे बर्फ के चट्टान टूटते चलें। ये रास्ता काफी जोखिम भरा होता है और जहाज कंपनियों के लिए बड़ा सिरदर्द होता है और जहाज कंपनियों अपने जहाजों की रक्षा के लिए बीमा कवर खोजती हैं, जो उन्हें काफी मुश्किल से मिलती हैं, क्योंकि बीका कंपनियां भी उस समुद्री रास्ते को कवर करना नहीं चाहती हैं। आम तौर पर, सोकोल तेल के कार्गो जहाजों को पहले रूस के सुदूर पूर्व में डी-कास्त्री टर्मिनल से दक्षिण कोरिया में बर्फ वर्ग के जहाजों का उपयोग करके भेज दिया जाता है, जहां उन्हें एक पारंपरिक टैंकर पर फिर से लोड किया जाता है और इस तरीके में वक्त के साथ साथ मानव श्रम की भी बर्बादी होती है।

बर्फीले पानी में चलने वाले जहाज कम
आपको बता दें कि, भारतीय रिफाइनर शायद ही कभी सोकोल ग्रेड खरीदते हैं, क्योंकि मुश्किल लॉजिस्टिक्स कच्चे तेल को काफी महंगा बना देता है। वैश्विक व्यापारी बेड़े में सीमित संख्या में 'बर्फ वर्ग' के जहाज हैं, जिन्हें किसी भी समय तैनात किया जा सके। ओएनजीसी दक्षिण कोरिया में योसु बंदरगाह तक कच्चे तेल के परिवहन के लिए रूसी सरकार के स्वामित्व वाले सोवकॉमफ्लोट (एससीएफ) द्वारा प्रदान किए गए बर्फ-श्रेणी के जहाजों पर निर्भर रहता है, और वहां से भारतीय कंपनी खरीदारों को निर्यात करती है और ज्यादातर उत्तरी एशिया में कारोबार करती है। लेकिन, यूक्रेन पर मास्को के आक्रमण के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोपीय संघ और कनाडा ने रूस पर प्रतिबंध लगा दिए हैं, जिसके बाद जहाज कंपनियों को ना बीमा मिल पा रहा है और ना ही बाकी सुविधाएं। लिहाजा, शिपिंग सूत्रों ने कहा कि, शिपिंग कंपनियों ने चार्टर्स से जुड़े संभावित प्रतिष्ठित जोखिमों के डर से एशिया में रूसी तेल को ट्रांसफर करने के लिए भी कम इच्छुक हैं।

पिछले महीने नहीं लगी बोली
पिछले महीने ओएनजीसी को सोकोल के निर्यात के लिए अपनी निविदा में कोई बोली नहीं लगी, क्योंकि करीब करीब सभी खरीदार पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गये प्रतिबंधों की वजह से डरकर रूसी तेल खरीदने से पीछे हट गये। इसके कारण ओएनजीसी ने भारतीय राज्य रिफाइनर, हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्प और भारत पेट्रोलियम कॉर्प (बीपीसीएल) को एक-एक कच्चे तेल का कार्गो बेच दिया। शिपिंग सूत्रों के अनुसार, बीपीसीएल का कार्गो अगले महीने की शुरुआत में दक्षिण कोरिया के येओसु बंदरगाह से उठाने के लिए निर्धारित किया गया था, जबकि एचपीसीएल को मई के अंत में कार्गो उठाने के लिए कहा जाएगा। बीपीसीएल ने दक्षिण कोरियाई बंदरगाह से एक जहाज को किराए पर लेने के लिए एक जांच शुरू की थी और जहाज अटलांटिस को मई की शुरुआत में शिपमेंट के लिए बुक करने की मांग की थी, लेकिन सूत्रों ने कहा कि, येओसु बंदरगाह के लिए एक जहाज की व्यवस्था नहीं हो पाया।

अब क्या करेंगी तेल कंपनियां?
ओएनजीसी, एचपीसीएल और बीपीसीएल ने टिप्पणी मांगने वाले रॉयटर्स के ईमेल का जवाब नहीं दिया। आपको बता दें कि, इस साल, भारत ने यूक्रेन पर आक्रमण के बाद से दो महीनों में रूस से दोगुने से अधिक कच्चे तेल की खरीद की है। यानि, भारत ने साल 2021 में जितना तेल खरीदा था, उतना तेल भारत ने सिर्फ 2 महीने में ही खरीद लिया है। वहीं, रूस का समुद्री क्षेत्र ब्रिटेन के एलआर और नॉर्वे के डीएनवी जैसे प्रमुख विदेशी प्रदाताओं द्वारा जहाज के सर्टिफिकेशन के लिए जूझ रही हैं और उन्हें अनुमित नहीं दी जा रही हैं। वहीं, इस मामले की जानकारी रखने वाले सूत्रों ने समाचार एजेंसी रायटर को बताया कि, समुद्री ईंधन विक्रेताओं ने स्पेन और माल्टा सहित प्रमुख यूरोपीय केंद्रों पर रूसी झंडा फहराने वाले जहाजों की सेवा बंद कर दी है। यूरोपीय संघ ने मार्च में एससीएफ को रूसी राज्य-स्वामित्व वाली कंपनियों के बीच सूचीबद्ध किया था, जिसके साथ 15 मई को विंड डाउन अवधि समाप्त होने के बाद "प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी भी लेनदेन में शामिल होने के लिए प्रतिबंध लगा दिया गया है। ऐसे में अब भारतीय तेल कंपनियां क्या करेंगी, ये देखने वाली बात होगी।
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