Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

अग्निवीर में गोरखा लड़ाकों को मिलेगी विशेष छूट? नेपाली PM कर सकते हैं मोदी से बात, चीन दिखा चुका है दिलचस्पी

चीन, नेपाली गोरखाओं को अपनी सेना में शामिल कराने का प्रयास कर रहा है। ऐसे भी उम्मीद की जा रही है कि पीएम दहल की भारत यात्रा के दौरान भारत गोरखा सैनिकों के लिए विशेष छूट दे सकता है।

Gurkha fighters joining Indian Army

नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल 'प्रचंड' भारत दौरे पर हैं। बीते साल प्रधानमंत्री बनने के बाद यह उनकी पहली द्विपक्षीय विदेश यात्रा है। इस अवसर पर पीएम मोदी और प्रधानमंत्री पुष्प कमल की मौजूदगी में दोनों देशों के बीच कई क्षेत्रों में समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए गए।

ऐसा भी कहा जा रहा है कि नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल इस यात्रा के दौरान भारतीय सेना में भर्ती गोरखा लड़ाकों के लिए बेहतर शर्तों पर जोर देंगे। आपको बता दें कि नेपाली गोरखा 200 सालों से भी अधिक समय से भारतीय सेना का अहम हिस्सा रहे हैं।

लेकिन बीते साल आई भारत की अग्निपथ योजना को लेकर नेपाली गोरखाओं में संशय है। नेपाल की पूर्ववर्ती सरकार ने अग्निपथ योजना में गोरखाओं की भर्ती रोक दी थी। ऐसे में गोरखाओं का इंडियन आर्मी में आना बंद हो गया है।

भारत सरकार के आंकड़ों के मुताबिक भारतीय सेना में वर्तमान में 7 गोरखा रेजिमेंट हैं, जिनमें 28,000 नेपाली गोरखा शामिल हैं। गोरखा सैनिकों ने कई दशकों तक भारतीय सेना की तरफ से युद्धों में अपना शौर्य दिखाया है। यही वजह है कि चीन भी अब गोरखा सैनिकों पर डोरे डाल रहा है।

कुछ ऐसी रिपोर्ट्स मिली हैं कि चीन नेपाल के प्रसिद्ध गोरखाओं को अपनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) में भर्ती करना चाहता है। आपको बता दें कि गोरखा सैनिक नेपाल के लिए राजस्व के अहम स्रोत रहे हैं। इसलिए अग्निवीर योजना से नेपाल सरकार भी नाखुश है।

गोरखा लड़ाकों में चीन की दिलचस्पी से भारत सरकार की चिंताएं बढ़ा दी हैं। ऐसे में इस मामले से वाकिफ लोगों के मुताबिक पीएम दहल अपने भारतीय समकक्ष के संग गुरुवार को ये मुद्दा उठाने वाले हैं। जानकारों के मुताबिक नेपाली पीएम को इस मुद्दे पर कुछ सकारात्मक हल निकलने की उम्मीद है।

कौन हैं गोरखा?

गोरखा नेपाल के पहाड़ों में बसने वाले जन्मजात लड़ाके हैं। गोरखा शारीरिक रूप से बेहद मजबूत और मानसिक रूप से इतने चपल होते हैं कि अपने से कई गुना ताकतवर दुश्मन को पलक झपकते धूल चटा सकते हैं।

1814 में जब अग्रेजों ने अपने साम्राज्य का विस्तार नेपाल में करना शुरू किया तो उनका सामना गोरखा लड़ाकों से हुआ। अंग्रेज इन छोटे कद के लड़ाकों की दक्षता से हैरान रह गए। उन्हें समझ आ गया है कि इन गोरखाओं से पार पाना इतना आसान नहीं है।

गोरखा भी अंग्रेजों के पास अत्याधुनिक हथियार और पैसे से आकर्षित हुए। ऐसे में 1815 में नेपाल के राजा और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच सुगौली की संधि हुई। इस संधि के अनुसार, नेपाल के कुछ हिस्से ब्रिटिश भारत में शामिल हुए। इस दौरान यह भी तय हुआ कि ब्रिटिश फौज में गोरखाओं की भर्ती की जाएगी।

आजादी के बाद ब्रिटिश और भारतीय सेनाओं के बीच गोरखा रेजिमेंटों को विभाजित करने का निर्णय लिया गया। 10 में से छह रेजिमेंट ने भारतीय सेना में रहना पसंद किया जबकि 3 रेजिमेंट अंग्रेजों के साथ ब्रिटेन चले गए और एक रेजीमेंट को समाप्त कर दिया गया।

इसके बाद भारतीय सेना में एक और गोरखा रेजीमेंट तैयार की गई। इस दौरान समझौते में तय हुआ कि भारतीय और ब्रिटिश सेनाओं में गोरखाओं को बिना भेदभाव के समान अवसर, समान लाभ, समान स्थायित्व दिया जाएगा। गोरखाओं के हितों का ध्यान रखा जाएगा। भारतीय और ब्रिटिश सेनाओं में गोरखा सैनिकों की नियुक्ति नेपाली नागरिक के तौर पर ही होगी।

आजादी के वक्त तक गोरखा रेजिमेंट में करीब 90 पर्सेंट तक गोरखा जवान नेपाल के होते थे। धीरे-धीरे नेपाली गोरखाओं का अनुपात कमता गया। वर्तमान में गोरखा रेजीमेंट में 60 फीसदी नेपाली और 40 फीसदी भारतीय गोरखा हैं।

बीते साल अग्निवीर की भर्ती में जब नेपाल के गोरखा नहीं आए, तो उनके लिए जो रिक्तियां थीं, उन्हें भारतीय गोरखाओं से ही भर लिया गया। जानकारों का मानना है कि नेपाल अपने युवाओं को भारतीय सेना में नहीं भेजता, तो इसका असर दोनों मुल्कों की दोस्ती पर पड़ सकता है।

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+