बीजेपी दफ्तर से महाकाल मंदिर तक... शिव की शरण में जाने वाले पीएम प्रचंड नेपाल को फिर बनाएंगे हिन्दू राष्ट्र?
PM बनने के बाद पुष्प कमल दहल भगवाधारी हो गये हैं, जिसे नेपाल के विरोधी वामपंथी नेता उनकी अवसरवादी राजनीति के तौर पर देखते हैं। लेकिन, नेपाल में पिछले 2 सालों से फिर से देश को हिन्दू राष्ट्र बनाने की मांग तेज हो चुकी है।

Nepal PM Prachanda Mahakal Temple Worship: वो साल 2006 था, जब नेपाल में राजशाही के खिलाफ विद्रोह प्रचंड स्तर तक पहुंच गया और जन आंदोलन के बाद देश में राजशाही हमेशा के लिए खत्म कर दी गई।
उस वक्त नेपाल दुनिया का इकलौता हिन्दू राष्ट्र था, लेकिन राजशाही खत्म होने के बाद नेपाल में लोकतंत्र की स्थापना की गई और देश को साल 2008 में धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित कर दिया गया। नेपाल की जनसंख्या हिन्दू बहुल है, लेकिन राजशाही खात्मा होने के दौर पर नेपाल में वामपंथ का प्रसार काफी बढ़ गया और वामपंथी नेताओं ने खुलकर हिन्दू धर्म का विरोध किया।
नेपाल के वर्तमान प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल 'प्रचंड', नेपाल में चल रहे आंदोलन के दौरान काफी बड़ी भूमिका में थे और सशस्त्र आंदोलन में अगुवा की भूमिका में थे। पुष्प कमल दहल, बंदूक के दम पर देश को बदलना चाहते थे और उन्हें सफलता भी मिली।
हालांकि, बाद में वो बंदूक त्यागकर मुख्यधारा की राजनीति में आ गये और फिर चुनाव जीतते हुए प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंची। पुष्प कमल दहल पिछले साल के अंत में तीसरी बार देश के प्रधानमंत्री बने हैं और तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद पहले विदेशी दौरे के तहत प्रधानमंत्री प्रचंड भारत दौरे पर हैं, जहां उन्होंने उज्जैन में भगवा वस्त्रों में महाकाल के मंदिर में पूजा अर्चना की थी।
प्रधानमंत्री प्रचंड का भगवा अवतार चौंकाने वाला है, क्योंकि वो अभी तक खुद अपने देश के प्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर तक नहीं गये हैं और नेपाल के कई विरोधी वामपंथी नेता उन्हें अवसरवादी बता रहे हैं।
लेकिन, पीछे मुड़कर देखने से कुछ ऐसे संकेत मिलते हैं, जिससे पता चलता है, कि प्रधानमंत्री प्रचंड का हृदय परिवर्तन ऐसे ही नहीं हुआ होगा।
पिछले साल गये थे बीजेपी दफ्तर
प्रधानमंत्री प्रचंड धूर वामपंथी नेता हैं, जिनकी राजनीति कार्ल मार्क्स के सिद्धांतों पर टिकी है, वहीं बीजेपी की विचारधारा दक्षिणपंथी राजनीति की है। यानि, विचारधारा के लिहाज से प्रचंड और बीजेपी, नदी के दो किनारे की तरह हैं।
लेकिन, पिछले साल पुष्प कमल दहल प्रचंड का बीजेपी के दफ्तर जाने का प्रोग्राम बना और 18 जुलाई 2022 को एक तस्वीर आती है, जिसमें बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा, पुष्प कमल दहल का स्वागत दिल्ली स्थिति बीजेपी के ऑफिस में करते हुए दिखाई देते हैं। उस वक्त पुष्प कमल दहल प्रधानमंत्री नहीं थे, लेकिन उसी वक्त से बीजेपी से होती उनकी नजदीकी को लेकर कई कयास लगाए जाने लगे थे।

बीडेपी की तरफ से जारी एक बयान में कहा गया, कि "कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी सेंटर) के अध्यक्ष ने कहा, कि उनकी पार्टी और भाजपा की अलग-अलग विचारधाराएं हैं, लेकिन एक समान उद्देश्य है जो समाज के गरीब वर्ग का उत्थान करना है"।
पीएम मोदी से क्या चाहते हैं दहल?
प्रधानमंत्री प्रचंड जब नेपाल में वामपंथी आंदोलन चला रहे थे, उस वक्त नेपाल में उग्रवाद अपने चरम पर पहुंच गया था और करीब 17 हजार लोग मावोदादी आंदोलन में मारे गये। जिसकी वजह से प्रधानमंत्री प्रचंड की भारी आलोचना हुई थी।
नवंबर 2006 में हस्ताक्षरित शांति समझौते में किए गए वादे के अनुसार, न केवल उनके आलोचक, बल्कि पूर्व गुरिल्ला और राजनीतिक सहयोगी चाहते हैं कि सकल मानवाधिकारों के उल्लंघन की जांच की जाए और दोषियों को दंडित किया जाए।
दहल दोषियों को सामान्य माफी देने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं, लेकिन जैसा कि संयुक्त राष्ट्र सहित अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने समझौते को देखा था, उनका सबसे अच्छा विकल्प उन्हें बचाने के लिए भारत पहुंचना था और भारत की मदद से पश्चिमी देशों का मदद हासिल करना है, ताकि वो अपने समर्थकों के लिए सामान्य माफी की घोषणा कर सकें।
वहीं, भारतीय अधिकारी आश्वस्त प्रतीत होते हैं, कि नेपाल में चीन को रोकने और यहां तक कि चीनी निवेश को बाहर रखने के लिए माओवादी नेता का भारत का साथ देने का प्रस्ताव वास्तविक है।
दिल्ली को लगता है कि दहल का पीएम बने रहना भारत के हित में है और कथित तौर पर प्रधानमंत्री प्रचंड ने बीजेपी को यह आश्वासन भी दिया था, कि वह पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह से कम हिंदू नहीं हैं, जिनकी राजनीतिक वापसी के प्रयासों को नेपाल में भारी सार्वजनिक प्रतिक्रिया मिल रही है। उनकी महाकालेश्वर यात्रा इसका ही प्रमाण माना जा रहा है।
यानि, प्रधानमंत्री प्रचंड ने दिल्ली में हिन्दू कार्ड खेला है।
जिसके बाद अब सवाल ये उठ रहे हैं, जिस नेपाल में पिछले दो सालों में देश को फिर से हिन्दू राष्ट्र बनाने की मांग काफी तेजी से उठी है और कई राजनीतिक पार्टियां नेपाल को हिन्दू राष्ट्र बनाने की मांग कर रहे हैं, क्या उन्हें प्रधानमंत्री दहल का साथ मिलेगा?

अभी के लिए, दहल को दिल्ली से जो चाहिए था, वह उन्हें मिल गया है। दोनों पक्षों ने 679 मेगावाट लोअर अरुण और 480 मेगावाट फुकोट (करनाली) को विकसित करने के लिए भारतीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों - नेशनल हाइड्रो-पावर कॉरपोरेशन और सतलुज जल निगम - के लिए सौदों पर हस्ताक्षर कर दिए हैं।
इसके साथ ही, मोदी सरकार ने नेपाल की ही बात मानते हुए प्रचंड सरकार से बिजली समझौते किए हैं, जिसके लिए प्रचंड काफी कोशिश कर रहे थे। लेकिन, दिल्ली ने प्रधानमंत्री प्रचंड के सामने चीन की बिजली गतिविधियों को रोकने की कई शर्तें रखी हैं, जिसे प्रचंड सरकार ने मान लिया है, लिहाजा चीन इससे टेंशन में है।
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इसके साथ ही, प्रधानमंत्री प्रचंड ने भारत के साथ सीमा विवाद को पूरी तरह से नहीं उठाया, लिहाजा इसे "आत्मसमर्पण" के रूप में देखा जा सकता है, और नेपाल में इसको लेकर एक प्रतिक्रिया पैदा हो सकती है।
लेकिन, एक्सपर्ट्स का कहना है, कि महाकाल मंदिर की यात्रा के बाद नेपाल की राजनीति में जबरदस्त ध्रुवीकरण होने वाला है, जिससे प्रचंड की क्रांतिकारी छवि टूट जाएगी और हो सकता है, उन्हें इसकी कीमत भी चुकानी पड़े, लेकिन इसका उल्टा भी हो सकता है और उन्हें उस विशाल हिन्दू आबाजी का समर्थन भी मिल सकता है, जो नेपाल में राष्ट्रवाद की वापसी चाहते हैं।
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