नेपाल ने भारत को दिया बहुत बड़ा झटका, चीन के साथ BRI प्रोजेक्ट पर फिर बात शुरू, क्या करेगी मोदी सरकार?

नेपाली अखबार 'द काठमांडू टाइम्स' की रिपोर्ट के मुताबिक नेपाल का चीन के साथ बीआरआई प्रोजेक्ट पर मई 2017 में करार हुआ था, लेकिन अभी तक नेपाल में एक भी प्रोजेक्ट पर काम शुरू नहीं हुआ है।

काठमांडू, अगस्त 29: पिछले कुछ सालों में भारत का पड़ोसी देश नेपाल चीन के प्रभाव में बुरी तरह जकड़ता जा रहा है और चीन भी नेपाल को कर्ज के जाल में फंसाकर उसका हाल श्रीलंका और पाकिस्तान जैसा करना चाहता है। नेपाली मीडिया के मुताबिक, नेपाल के नये प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा एक बार फिर से नेपाल के साथ उस प्रोजेक्ट को अगले चरण में ले जा रहे हैं, जो नेपाल के लिए गले की हड्डी बन सकती है। काठमांडू टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक नेपाल और चीन के बीच बीआरआई प्रोजेक्ट पर बातचीत फिर शुरू हो गई है।

बीआरआई प्रोजेक्ट पर फिर बात

बीआरआई प्रोजेक्ट पर फिर बात

उम्मीद जताई जा रही थी कि शेर बहादुर देउबा के नेपाल के प्रधानमंत्री बनने के बाद वो भारत के साथ अपने रिश्तों को मजबूत करने की कोशिश करेंगे, लेकिन ऐसा लग रहा है जैसे शेर बहादुर देउबा भी पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के रास्ते पर ही बढ़ चले हैं। रिपोर्ट है कि देउबा सरकार ने चीन के महत्वाकांक्षी बीआरआई प्रोजेक्ट पर बातचीत फिर से शुरू कर दी है। नेपाली मीडिया के मुताबिक, देउबा सरकार ने चीन के साथ करार करने के लिए आखिरी कदम बढ़ा दिआ है, जो कदम उठाने से नेपाल की पूर्ववर्ती सरकारें चिंता जता रही थीं।

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    बुरी तरह से फंसेगा नेपाल

    बुरी तरह से फंसेगा नेपाल

    चीन की नीति छोटे-छोटे देशों को कर्ज के जाल में फंसाने की रही है और पाकिस्तान और चीन पहले ही चीन के कर्ज के जाल में बुरी तरह से फंसे हुए हैं। कई अफ्रीकी देश और कुछ यूरोपीयन देश भी चीन के झांसे में आकर चीन से इतना कर्ज ले चुके हैं, जिसे अब वो चुकाने की हैसियत में नहीं हैं, ऐसे में नेपाल जानबूझकर उस बीआरआई प्रोजेक्ट का हिस्सा बनना चाहता है, जो कभी पूरा होने वाला नहीं है और जिसके जरिए नेपाल हमेशा के लिए चीन का बंधक बन सकता है। नेपाली अखबार 'द काठमांडू टाइम्स' की रिपोर्ट के मुताबिक, नेपाल और चीन ने बीआरआई प्रोजेक्ट के ड्राफ्ट को अमलीजामा पहुंचाने के लिए फिर से बातचीत शुरू कर दी है। चार साल पहले जब चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग नेपाल आए थे, उस वक्त दोनों देशों के बीच बीआरआई प्रोजेक्ट पर फ्रेमवर्क पर करार हुआ था। लेकिन बाद में बातचीत बंद हो गई थी। और अब नेपाली मीडिया ने खबर दी है कि देउबा के प्रधानमंत्री बनने के बाद नेपाल और चीन के बीच बातचीत फिर शुरू हो गई है।

    एक भी प्रोजेक्ट पर काम नहीं

    एक भी प्रोजेक्ट पर काम नहीं

    नेपाली अखबार 'द काठमांडू टाइम्स' की रिपोर्ट के मुताबिक नेपाल का चीन के साथ बीआरआई प्रोजेक्ट पर मई 2017 में करार हुआ था, लेकिन अभी तक नेपाल में एक भी प्रोजेक्ट पर काम शुरू नहीं हुआ है। नेपाली अधिकारियों के मुताबिक अब देउबा सरकार बनने के बाद दोनों देशों के बीच बीआरआई प्रोजेक्ट के मसौदे पर क्रियान्वयन योजना का आदान प्रदान होगा, परियोजनाओं पर आगे की बातचीत होगी और उसके बाद काम के शुरू होने की उम्मीद है। इसके साथ ही नेपाल और चीन के बीच बीआरआई प्रोजेक्ट के मसौदा पर भी बातचीत की जाएगी और फिर उसके बजट को अंतिम रूप दिया जाएगा। रिपोर्ट के मुताबिक, बीआरआई प्रोजेक्ट के लिए चीन ने नेपाल को भारी-भरकम कर्ज देने का वादा किया है और यही नेपाल के लिए डर है कि अगर नेपाल चीन से एक बार कर्ज ले लेता है, तो फिर वो दोबारा कभी चीन के जाल में निकल नहीं पाएगा।

    क्या चाह रही है देउबा सरकार?

    क्या चाह रही है देउबा सरकार?

    नेपाली मीडिया के मुताबिक, इस मसौदे से जुड़े कम से कम तीन अधिकारियों ने बताया है कि नेपाली विदेश मंत्रालय ने चीन के साथ मिलकर इस प्रोजेक्ट को जल्द से जल्द शुरू करने का संकल्प लिया है और इसके लिए नेपाल का प्रधानमंत्री कार्यालय और वित्त मंत्रालय लगातार इनपुट्स का आदान-प्रदान कर रही हैं। नेपाली विदेश मंत्रालय के नॉर्थ इस्ट एशिया डिविजन के पूर्व प्रमुख काली प्रसाद पोखरेल ने कहा कि, ''चीन ने नेपाल सरकार से जल्द से जल्द बीआरआई प्रोजेक्ट के तहत कार्ययोजना की रिपोर्ट मांगी है, ताकि जल्द से जल्द काम को शुरू किया जा सके।'' आपको बता दें कि पोखरेल इस साल फरवरी में रिटायर हो चुके हैं, लेकिन उन्होंने इस प्रोजेक्ट के लिए काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। पोखरेल ने कहा कि, 'सिर्फ नेपाल ही नहीं, चीन ने उन सभी देशों से कार्ययोजना रिपोर्ट मांगी है, जो चीन के साथ बीआरआई प्रोजेक्ट पर करार कर चुके हैं।'

    भारत के कारण रूक रहा था नेपाल

    भारत के कारण रूक रहा था नेपाल

    जब नेपाल ने 2017 में बीआरआई समझौते पर हस्ताक्षर किए, तो इसे नेपाल-चीन संबंधों में एक महत्वपूर्ण क्षण के रूप में देखा गया। लेकिन चीनी कार्यक्रम के तहत एक भी परियोजना शुरू नहीं होने के पीछे की वजह भारत था और नेपाल की तत्कालीन सरकार भी चीन के साथ बात तो कर रही थी, लेकिन प्रोजेक्ट को आखिरी चरण में ले जाने से डर रही थी। नेपाली मीडिया के मुताबिक, नेपाल की तत्कालीन सरकार चीन के साथ प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने को लेकर काफी चिंता में थी। वहीं, भारत को भी नेपाल में बीआरआई प्रोजेक्ट को लेकर एतराज रहा है और नेपाल अमेरिका को भी नाराज नहीं करना चाहता था। लेकिन, अब माना जा रहा है कि नेपाल ने बीआरआई प्रोजेक्ट की तरफ आखिरी कदम बढ़ा दिए हैं। आपको बता दें कि दक्षिण एशिया में श्रीलंका और पाकिस्तान बीआरआई प्रोजेक्ट का हिस्सा हैं और दोनों ने भारी भरकम कर्ज चीन से ले रखा है। चीन को अपना एक बंदरगाह 198 सालों के लिए चीन के पास लीज में रखना पड़ा है तो इस्ट कोलंबो पोर्ट पर भी चीन ने कब्जा कर लिया है।

    कम्यूनिस्ट पार्टियों के बीच करार

    कम्यूनिस्ट पार्टियों के बीच करार

    आपको बता दें कि जब शी जिनपिंग ने 2017 में नेपाल का दौरा किया था और नेपाल को बीआरआई प्रोजेक्ट का हिस्सा बनाया था, उस वक्त नेपाल के प्रधानमंत्री नेपाल कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता पुष्प कमल दहल प्रचंड थे और फिर शेर बहादुर देउबा (नेपाल कांग्रेस) ने नेपाल की सत्ता संभाली और फिर केपी शर्मा ओली (सीपीएन-यूएमएल) नेपाल के प्रधानमंत्री बने। सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि इस वक्त जब शेर बहादुर देउबा नेपाल के प्रधानमंत्री हैं, तो उनकी सरकार को पूर्व प्रधानमंत्री प्रचंड का समर्थन हासिल है, जो नेपाल कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता हैं। लिहाजा देउबा के प्रधानमंत्री बनने के साथ ही एक बार फिर से चीन के साथ नेपाल की जुगलबंदी शुरू हो गई है।

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