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NATO vs China: रूस के सामने 56 इंच का सीना फुलाता है नाटो, चीन से क्यों डरता है सबसे शक्तिशाली गठबंधन?

NATO vs China: पश्चिमी देशों के लिए NATO (नॉर्थ अटलांटिक ट्रिटी ऑर्गनाइजेशन) "मानव जाति के इतिहास में अब तक का सबसे शक्तिशाली "गठबंधन" हो सकता है, लेकिन चीन के लिए, यह "युद्ध की अराजकता फैलाने वाली मशीन" है।

26 जुलाई को चीन ने नाटो पर एशिया-प्रशांत क्षेत्र में "अपने बुरे हुक फैलाने" का आरोप लगाया (बीजिंग "इंडो-पैसिफिक" शब्द का उपयोग करने से इनकार करता है, जो अब रूस को छोड़कर व्यापक दुनिया के लिए स्वीकार्य है)।

NATO vs China

चीनी राष्ट्रीय रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता झांग शियाओगांग ने आरोप लगाया, कि कैसे नाटो ने अफगानिस्तान, इराक, लीबिया और यूक्रेन में संघर्ष पैदा किया है। वाशिंगटन में आयोजित नाटो शिखर सम्मेलन में 10 जुलाई को अंतिम विज्ञप्ति को अपनाने के बाद नाटो की बयानबाजी को "झूठ, पूर्वाग्रह, उकसावे और बदनामी" से भरा हुआ मानना, ​चीन की रणनीति समझने लायक है।

विज्ञप्ति में बीजिंग को "यूक्रेन के खिलाफ रूस के युद्ध का निर्णायक समर्थक" और "यूरो-अटलांटिक सुरक्षा के लिए प्रणालीगत चुनौतियां" के रूप में पहचाना गया। उदाहरण के लिए, अगर बीजिंग यूक्रेन युद्ध में रूस का समर्थन करना बंद कर देता है, तो क्या नाटो देश चीन के बारे में अपनी राय बदल देंगे? इसकी संभावना बहुत कम है।

अगर नाटो विज्ञप्ति कोई संकेत है, तो चीन एक चुनौती बना रहेगा, ऐसा कुछ जिसका यूक्रेन के साथ कोई संबंध नहीं है। विज्ञप्ति में कई अन्य शिकायतें भी हैं। और इसने विज्ञप्ति ने जिस भाषा का इस्तेमाल किया है, उसके बारे में जानना बहुत जरूरी हो जाता है।

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नाटो विज्ञप्ति में चीन को लेकर क्या कहा गया है?

विज्ञप्ति में कहा गया है, कि "पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चायना, (PRC) यूरो-अटलांटिक सुरक्षा के लिए प्रणालीगत चुनौतियां पेश करता रहता है। हमने PRC से लगातार दुर्भावनापूर्ण साइबर और हाइब्रिड गतिविधियां देखी हैं, जिनमें गलत सूचनाएं शामिल हैं। हम PRC से साइबरस्पेस में जिम्मेदारी से काम करने की अपनी प्रतिबद्धता को बनाए रखने का आह्वान करते हैं। हम PRC की अंतरिक्ष क्षमताओं और गतिविधियों में विकास से चिंतित हैं। हम PRC से जिम्मेदार अंतरिक्ष व्यवहार को बढ़ावा देने के लिए अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों का समर्थन करने का आह्वान करते हैं।"

विज्ञप्ति में आगे लिखा गया है, कि "PRC ज्यादा वारहेड और बड़ी संख्या में सोफिस्टिकेटेड वितरण प्रणालियों के साथ अपने परमाणु शस्त्रागार का तेजी से विस्तार कर रहा है और अपग्रेड कर रहा है। हम PRC से रणनीतिक जोखिम न्यूनीकरण चर्चाओं में शामिल होने और पारदर्शिता के माध्यम से स्थिरता को बढ़ावा देने का आग्रह करते हैं। हम PRC के साथ रचनात्मक जुड़ाव के लिए खुले हैं, जिसमें गठबंधन के सुरक्षा हितों की रक्षा के मकसद से पारस्परिक पारदर्शिता का निर्माण करना शामिल है। साथ ही, हम अपनी साझा जागरूकता को बढ़ा रहे हैं, अपनी लचीलापन और तैयारियों को बढ़ा रहे हैं, और PRC की बलपूर्वक रणनीति और गठबंधन को विभाजित करने के प्रयासों से सुरक्षा कर रहे हैं।"

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चीन के खिलाफ खुद को मजबूत कर पाएगा NATO?

इसके अलाला भी, यदि हाल के दिनों में नाटो की तरफ से जारी अन्य विज्ञप्तियों पर नजर डालें, तो यह स्पष्ट है, कि गठबंधन भारत-प्रशांत क्षेत्र (Indo-Pacific) में अपने साझेदारों, जिन्हें "IP-4" के रूप में जाना जाता है - ऑस्ट्रेलिया, जापान, कोरिया गणराज्य और न्यूजीलैंड के साथ संवाद और सहयोग को मजबूत कर रहा है।

नाटो का तर्क है, कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र, गठबंधन के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि उस क्षेत्र में विकास सीधे यूरो-अटलांटिक सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है। इसके अलावा, नाटो और इस क्षेत्र में उसके साझेदार समान मूल्यों को साझा करते हैं और नियम-आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को बनाए रखने के लिए मिलकर काम करने का लक्ष्य रखते हैं।

फरवरी 2022 में यूक्रेन युद्ध शुरू होने से पहले चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने ' बिना सीमा वाली साझेदारी' की घोषणा थी, लेकिन उससे पहले यूरो-अटलांटिक (नाटो के संचालन का मुख्य क्षेत्र) और हिंद-प्रशांत के बीच एक मजबूत संबंध स्थापित करने काफी मजबूत प्रयास किए गये, जिसमें अमेरिका ने अग्रणी भूमिका निभाई थी।

पश्चिमी रणनीतिक अभिजात वर्ग आश्वस्त थे, कि हिंद-प्रशांत में चीन द्वारा शुरू किया गया एक बड़ा युद्ध वैश्विक अर्थव्यवस्था और यूरोपीय देशों के हितों के लिए विनाशकारी होगा। कोई आश्चर्य नहीं, कि हिंद-प्रशांत में सहयोग के लिए 2021 ईयू (यूरोपीय संघ) की रणनीति में कहा गया है, कि दक्षिण चीन सागर और ताइवान जलडमरूमध्य की सुरक्षा का यूरोपीय सुरक्षा और समृद्धि पर सीधा प्रभाव पड़ सकता है।

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यह तर्क दिया गया है, कि इंडो-पैसिफिक में यूरोपीय भागीदारी गठबंधन के बोझ को साझा करने में योगदान दे सकती है। संयुक्त राज्य अमेरिका को अपनी सबसे महत्वपूर्ण चुनौती, चीन से निपटने में मदद करके, यूरोप के नाटो भागीदार यह दिखाने में मदद कर सकते हैं कि वे मूल्यवान सहयोगी हैं जो ट्रान्साटलांटिक सुरक्षा में सार्थक योगदान दे रहे हैं।

यह और भी जरूरी है, क्योंकि कुछ अमेरिकी तर्क देते हैं कि चीन और इंडो-पैसिफिक द्वारा पेश की गई बड़ी चुनौतियों पर ज्यादा ध्यान और संसाधन आवंटित करने के लिए अमेरिका को यूरोप से दूर हो जाना चाहिए। चीन की चुनौती से निपटने में अमेरिका की मदद करके, यूरोप के नाटो भागीदार गठबंधन भागीदार के रूप में अपने निरंतर मूल्य को प्रदर्शित कर सकते हैं और यूरोपीय प्राथमिकताओं पर लगातार ध्यान देने के लिए अमेरिकी समर्थन को मजबूत कर सकते हैं, इसलिए तर्क दिया जाता है।

मूल बात यह है कि सभी नाटो सदस्य स्वीकार करते हैं कि यूरो-अटलांटिक और इंडो-पैसिफिक थिएटर आपस में जुड़े हुए हैं। जून 2022 में मैड्रिड शिखर सम्मेलन में, नाटो के राष्ट्राध्यक्षों और सरकार ने नाटो 2022 रणनीतिक अवधारणा को अपनाया, जो गठबंधन का मुख्य नीति दस्तावेज़ है, जो आने वाले वर्षों के लिए नाटो की रणनीतिक दिशा निर्धारित करता है।

इंडो-पैसिफिक में मजबूत हो पाएगा NATO?

नाटो और इंडो-पैसिफिक देशों के बीच बातचीत में काफी तेजी आई है। ये गठबंधन जापान और दक्षिण कोरिया के साथ संयुक्त सैन्य स्टाफ वार्ता में शामिल है, और ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड को अपने ऑपरेशन ढांचे में शामिल कर रहा है। इस सहयोग का एक प्रमुख आकर्षण AUKUS समझौता है, जिसके तहत ऑस्ट्रेलिया एक रक्षा समझौते में यूके और अमेरिका के साथ भागीदारी कर रहा है, जिसमें ऑस्ट्रेलिया के लिए परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बी बेड़े का विकास शामिल है।

यूरो-अटलांटिक और इंडो-पैसिफिक सुरक्षा का परस्पर संबंध नाटो की 2022 रणनीतिक अवधारणा में एक केंद्रीय विषय है, जो सहकारी सुरक्षा को इसके मुख्य उपक्रमों में से एक के रूप में प्रस्तुत करता है। इस सिद्धांत ने इंडो-पैसिफिक देशों के साथ गठबंधन के गहन सहयोग को निर्देशित किया है, जिसका मकसद चीन के उदय से उत्पन्न रणनीतिक चुनौतियों को कम करना है। नाटो और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के बीच बढ़ते सैन्य और रणनीतिक सहयोग को विभिन्न शिखर सम्मेलनों और उच्च-स्तरीय बैठकों में उजागर किया गया है, जो साझा सुरक्षा चुनौतियों के जवाब में संबंधों को गहरा करने की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

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चीन के खिलाफ क्यों बेबस नजर आता है NATO?

वर्तमान में, सभी 32 नाटो सदस्यों के बीच चीन के खिलाफ एक सीमा से आगे बढ़ने के लिए कोई आम सहमति नहीं है, जिसका स्पष्ट लक्ष्य बीजिंग को नियंत्रित करना है। फ्रांस, विशेष रूप से राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के अधीन, चीन के साथ संबंध खराब नहीं करना चाहता है। उन्होंने टोक्यो में नाटो संपर्क कार्यालय खोलने के प्रस्ताव को वस्तुतः वीटो कर दिया है।

जर्मनी में इस बात पर घरेलू स्तर पर बहुत बहस चल रही है, कि क्या उसे पिछले आठ वर्षों से देश के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदार चीन के साथ 250 बिलियन यूरो ($274 बिलियन) के व्यापारिक संबंधों की कीमत पर इंडो-पैसिफिक सुरक्षा को बढ़ावा देना चाहिए या नहीं?

हंगरी जैसे अन्य छोटे नाटो देश चीन के साथ संबंधों को मजबूत कर रहे हैं, जिसमें कानून प्रवर्तन और सुरक्षा सहयोग के साथ-साथ गहरे व्यापार और निवेश संबंध शामिल हैं। नाटो देशों के बीच इन चीन को लेकर फूट के अलावा, यह सवाल भी है कि क्या नाटो के पास यूरोप की सुरक्षा के लिए जिद को देखते हुए, इंडो-पैसिफिक में अपने अधिकार क्षेत्र का विस्तार करने के लिए चीनी शक्ति को रोकने के लिए वास्तविक कठोर शक्ति है?

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