रूस के फैसले के बाद NATO ने कोल्ड वॉर ट्रीटी को सस्पेंड किया, अब जंग में होगी परमाणु हथियारों की एंट्री?
नाटो ने शीत युद्ध के दौरान सोवियत संघ के साथ की गई कोल्ड वॉर सिक्योरिटी ट्रीटी को औपचारिक रूप से सस्पेंड करने की घोषणा की है। नाटो ने कहा कि संधि पर हस्ताक्षर करने वाले उसके सदस्य अब समझौते में अपनी भागीदारी रोक रहे हैं।
नाटो के 31 सदस्य देशों ने 'यूरोप में पारंपरिक सशस्त्र बल संधि' पर हस्ताक्षर किये थे, जिसका लक्ष्य शीत युद्ध के दौर के प्रतिद्वंद्वी देशों को आपसी सीमाओं के पास सैनिकों को जमा करने से रोकना था।

नाटो की इस ट्रीटी को मूल रूप से 'कन्वेंशनल आर्म्ड फोर्स इन यूरोप' कहा जाता है। इसमें हथियारों पर नियंत्रण, ट्रांसपेरेंसी और रूल बेस्ड इंटरनेशनल लॉ फॉलो करना शामिल हैं।
नाटो ने कहा कि एक ऐसी स्थिति जिसमें अन्य देश संधि का पालन करेंगे और रूस नहीं करेगा, कायम नहीं रहेगी
इससे पहले बीते मंगलवार को रूस ने इस ट्रीटी से अलग होने का ऐलान किया था। हालांकि, रूस ने पहले ही साफ कर दिया था कि अब इस ट्रीटी का कोई मतलब नहीं है।
नाटो ने कहा, जिन सहयोगियों ने हस्ताक्षर किए थे, वे अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अपने अधिकारों के अनुसार, जब तक आवश्यक हो, सीएफई संधि के संचालन को निलंबित करने का इरादा रखते हैं। यह सभी नाटो सहयोगियों द्वारा पूरी तरह से समर्थित निर्णय है।
इस ट्रीटी में क्या था?
आपको बता दें कि शीत युद्ध की समाप्ति के दौरान नवंबर 1990 में इस सिक्योरिटी ट्रीटी पर कई देशों ने दस्तखत किए थे।
इस ट्रीटी का उद्देश्य देशों के टकराव को दूर करना था। इसमें कहा गया था कि शीत युद्ध के दौरान जिन देशों के विवाद थे, वो आपस में बॉर्डर तय कर लें और इनको लेकर किसी तरह का सैन्य टकराव न हो। हालांकि इस ट्रीटी को दो साल बाद भी पूरी तरह अमल में नहीं लाया जा सका था। इसकी वजह यह थी कि रूस कुछ मुद्दों पर सहमत नहीं था।
अब रूस-यूक्रेन जंग के दौरान इस ट्रीटी का कोई मकसद नहीं रह गया था। लिहाजा, रूस ने मंगलवार को इससे हटने का औपचारिक ऐलान कर दिया। हालांकि, 23 जून को ही उसने साफ कर दिया था कि वो इस समझौते को नहीं मानता।












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