Chandrayaan-3: भारत के चद्रयान-3 को करीब से देख रहा अमेरिका, अगर इतिहास बना, तो झूम उठेगा NASA
NASA Eyes on Chandrayaan-3: अंतरिक्ष की दुनिया में भारत एक बार फिर से इतिहास रचने वाला है। इस बार भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) शुक्रवार को चंद्रयान-3 लॉन्च करने वाला है। ये भारत के लिए गर्व की बात है और पूरे देश के साथ-साथ पूरी दुनिया की निगाह भारत पर टिकी हुई है।
खासकर अमेरिका, जिसका अंतरिक्ष मिशन भारत के मुकाबले काफी आगे है, उसकी सबसे ज्यादा नजर भारत के इस ऐतिहासिक मिशन पर है। आइए इस पर करीब से नजर डालते हैं, कि अमेरिका, जिसने आधी सदी पहले चंद्रमा पर इंसानों को भेजकर इतिहास रचा था, वो चंद्रयान-3 प्रक्षेपण पर सावधानीपूर्वक नजर क्यों रख रहा है? भला इसरो की कामयाबी से नासा क्यों झूम उठेगा?

चंद्रायान-3 पर अमेरिका की नजर
इसरो का चंद्रायान-3 प्रक्षेपण, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की संयुक्त राज्य अमेरिका की पहली राजकीय यात्रा के दौरान आर्टेमिस समझौते में शामिल होने के बाद हुआ हो रहा है, लिहाजा अब नासा के लिए इसरो की कामयाबी काफी मायने रखती है।
इसरो, जो काफी कम कीमत पर अंतरिक्ष यानों को अंतरिक्ष में भेजने की महारत रखता है, उससे नासा हमेशा से आकर्षित रहा है, क्योंकि नासा के अंतरिक्ष मिशन काफी ज्यादा महंगे होते हैं।
आपको बता दें, कि आर्टेमिस समझौता 2025 तक चंद्रमा पर मनुष्यों को भेजने के लिए अमेरिकी सरकार और अन्य विश्व सरकारों के बीच एक गैर-बाध्यकारी बहुपक्षीय व्यवस्था है, जिसका अब भारत भी हिस्सा है। अमेरिका अपने अंतरिक्ष यात्रियों को फिर से चंद्रमा पर भेजने वाला है और उस प्रक्रिया के कई चरण पूरे भी हो चुके हैं।
व्हाइट हाउस के एक बयान में कहा गया है, कि नासा 2024 में अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के लिए एक संयुक्त प्रयास शुरू करने के लक्ष्य के साथ भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अंतरिक्ष यात्रियों को एडवांस ट्रेनिंग देगा।
व्हाइट हाउसे ने कहा, कि "भारत शांतिपूर्ण, टिकाऊ और पारदर्शी सहयोग के लिए प्रतिबद्ध 26 अन्य देशों में शामिल हो गया है, जो चंद्रमा, मंगल और उससे आगे की खोज को सक्षम करेगा।" इसरो ने अतीत में सफलताएं हासिल की हैं, उसने उसे अमेरिका और चीन की अंतरिक्ष एजेंसियों के बराबर ला खड़ा किया है। वहीं, इसरो की गणना अब विश्व के टॉप-5 अंतरिक्ष एजेंसियों में होने लगी है।
संयुक्त राज्य अमेरिका ने कहा है, कि "भारत ने आर्टेमिस समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जो सभी मानव जाति के लाभ के लिए अंतरिक्ष अन्वेषण के एक सामान्य दृष्टिकोण को आगे बढ़ाता है।"

दक्षिणी ध्रुव
इसरो का लक्ष्य चंद्रयान-3 को चंद्रमा पर सफलतापूर्वक उतरने वाला भारत का पहला मिशन बनाना है, वह भी चंद्रमा के अज्ञात दक्षिणी ध्रुव पर। अभी तक किसी भी देश का अंतरिक्ष यान चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर नहीं उतरा है, लिहाजा इसरो की ये कामयाबी ऐतिहासिक होगी और अमेरिका, भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी से डेटा हासिल करना चाहेगा, ताकि उसे चंद्रमा को लेकर और भी जानकारियां हासिल हो सके।
इससे पहले चंद्रयान-2, जो 22 जुलाई 2019 को रवाना हुआ था, वो चंद्रमा पर सॉफ्ट-लैंडिंग करने का भारत का पहला प्रयास था। हालांकि उस मिशन के दौरान, लैंडर सॉफ्ट लैंडिंग करने के बजाय सतह पर दुर्घटनाग्रस्त हो गया था, जिससे भारत का वो मिशन आखिरी सेकंड्स में चंद्रमा से कुछ ही मीटर की दूरी पर फेल हो गया था।
चंद्रयान-3 मिशन में एक स्वदेशी प्रणोदन मॉड्यूल, लैंडर मॉड्यूल और एक रोवर शामिल है, जिसका उद्देश्य अंतर-ग्रहीय मिशनों के लिए आवश्यक नई टेक्नोलॉजी को विकसित करना और प्रदर्शित करना है। 43.5 मीटर लंबे रॉकेट को 14 जुलाई को पूर्व निर्धारित समय दोपहर 2.35 बजे दूसरे लॉन्च पैड से लॉन्च करने के साथ, लॉन्च के लिए उलटी गिनती गुरुवार से शुरू होने की उम्मीद है।
सबसे बड़े और भारी LVM3 रॉकेट (पूर्व में GSLV MkIII), जिसे इसकी हेवीलिफ्ट क्षमता के लिए इसरो वैज्ञानिक प्यार से 'फैट बॉय' कहते हैं, उसने लगातार छह मिशन कामयाबी के साथ पूरे किए हैं।
LVM3 रॉकेट तीन मॉड्यूलों का एक संयोजन है, जिसमें प्रणोदन, लैंडर और रोवर (जो लैंडर के अंदर स्थित है) लगे हुए हैं। इसरो के वैज्ञानिकों के अनुसार, लैंडर मॉड्यूल 23 या 24 अगस्त को सॉफ्ट लैंडिंग के लिए उतरना शुरू कर देगा।
NASA की क्यों है पैनी नजर?
चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र को इसलिए चुना गया है, क्योंकि चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव, उत्तरी ध्रुव की तुलना में बहुत बड़ा रहता है। इसके आस-पास स्थायी रूप से छाया वाले क्षेत्रों में पानी की मौजूदगी की संभावना हो सकती है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक, सॉफ्ट-लैंडिंग के बाद रोवर, लैंडर मॉड्यूल से बाहर आ जाएगा और अपने पेलोड APXS-अल्फा पार्टिकल एक्स-रे स्पेक्ट्रोमीटर के जरिए चंद्रमा की सतह का अध्ययन करेगा। इस मिशन के जरिए चंद्रमा की रासायनिक संरचना प्राप्त की जा सकेगी और चंद्रमा की सतह की समझ को और बढ़ाने के साथ साथ चंद्रमा पर खनिज संरचना का अनुमान का भी पता लगाया जाएगा।
इसरो ने कहा, कि रोवर, जिसका लाइफ, 1 चंद्र दिवस (पृथ्वी के 14 दिन) का है, उसके पास चंद्रमा पर लैंडिंग स्थल के आसपास की मिट्टी और चट्टानों की मौलिक संरचना निर्धारित करने के लिए, एक और पेलोड लेजर प्रेरित ब्रेकडाउन स्पेक्ट्रोस्कोप (एलआईबीएस) भी है, जिससे उसके लिए चंद्रमा की मिट्टी का परीक्षण करना आसान हो जाएगा।
साइंस टेक डेली वेबसाइट के अनुसार, नासा 2025 में चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास के क्षेत्र का पता लगाने के लिए पहले इंसान को भेजने की योजना बना रहा है। लिहाजा, भारत की कामयाबी उसके लिए काफी ज्यादा मायने रखती है।
ऑस्ट्रेलियन के कैनबरा नेशनल विश्वविद्यालय के ग्रह भू-रसायन वैज्ञानिक मार्क नॉर्मन ने कहा, कि "दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र का भूविज्ञान अमेरिका के अपोलो मिशन के आसपास के क्षेत्र से बहुत अलग है, इसलिए चंद्रयान-3 चंद्रमा के एक बिल्कुल नए क्षेत्र का नज़दीकी दृश्य प्रदान करेगा।"

साइंस मैग्जीन नेचर की रिपोर्ट में कहा गया है, कि चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव ऐसा है, जिसकी जानकारी को धरती से हासिल करना काफी मुश्किल होता है।
यह पहली बार नहीं है जब भारत ने कोई महत्वपूर्ण खोज की है।
द स्टेट्समैन के अनुसार, साल 2008 में इसरो ने जानबूझकर चंद्रयान-1 को दक्षिणी ध्रुव में दुर्घटनाग्रस्त कर दिया था, जिसने बड़े पैमाने पर पानी की बर्फ की उपस्थिति का पता चल गया था।
Space.com की एक रिपोर्ट में कहा गया है, कि "चंद्रयान -1, जिसे अक्टूबर 2008 में लॉन्च किया गया था, वो चंद्रमा पर ऑर्बिटर भेजने की भारत की पहली कोशिश थी। वो ऑर्बिटर 64-पाउंड (29 किलोग्राम) इम्पैक्टर रिसर्च के लिए भेजा गया था, जो दक्षिणी ध्रुव के पास स्थिति है।
Space.com का कहना है, भारत ने चंद्रयान-1 को जानबूझकर चंद्रमा की सतह से क्रैश करने दिया था। और क्रैश होने से ठीक पहले चंद्रयान-1 के इम्पैक्टर ने चंद्रमा पर पानी की बर्फ का पता लगा लिया था। यह खोज चंद्रयान-1 ऑर्बिटर पर मौजूद नासा के उपकरण, जिसे मून मिनरलॉजी मैपर कहा जाता है, उससे मेल खाती है।"












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