4 साल पहले ही की थी चीन से दोस्ती, इस अफ्रीकी देश में सरकार का हो गया तख्तापलट, ड्रैगन का खेल?

अफ्रीका महाद्वीप एक ऐसा क्षेत्र है, जहां से चीन को काफी कुछ फायदा मिलता है और बींजिंग की कोशिश अफ्रीकी महाद्वीप पर पूरी तरह से नियंत्रण की रहती है, जिसमें चीन अब बहुत हद तक कामयाब हो चुका है।

औगाडौगौ, बुर्किना फासो, जनवरी 25: अफ्रीकी देश बुर्किना फासो की सेना ने देश की सरकार का तख्तापलट कर दिया है और देश में सेना का शासन कायम कर दिया है। बुर्किना फासो, जहां की सेना को म्यांमार की सेना की तरह ही 'जुंटा' कहा जाता है, उसने देश के सरकारी न्यूज चैनल पर आकर राष्ट्रपति को हिरासत में लेने और देश में सैन्य शासन की स्थापना करने की घोषणा की है। लेकिन, सवाल ये उठ रहे हैं, सिर्फ चार साल पहले चीन के साथ संबंध स्थापित करने वाले बुर्किना फासो में सरकार का तख्तापलट कैसे हो गया? क्या म्यांमार में जिस तरह से चीन के इशारे पर सेना ने सरकार का तख्तापलट किया, क्या बुर्किना फासो में कुछ ऐसा ही है, आईये स्थिति को समझते हैं।

सरकार का तख्तापलट

सरकार का तख्तापलट

बुर्किना फासो की सेना ने कहा है कि, उसने सोमवार को राष्ट्रपति रोच काबोरे को सत्ता से बेदखल कर दिया है और संसद को भंग करते हुए देश की संविधान को सस्पेंड कर दिया है। सेना ने कहा है कि, देश की सीमाओं को फिलहाल पूरी तरह से बंद कर दिया गया है और देश पर अब सेना का नियंत्रण स्थापित हो गया है। बुर्किना फासो में तख्तापलट की घोषणा राज्य टेलीविजन पर कैप्टन सिदसोर कादर औएद्राओगो ने की है, जिन्होंने कहा है कि, ''देश की सुरक्षा में लगातार गिरावट आ रही थी और देश के लोगों को एकजुट करने के लिए और सरकार की अक्षमता को जवाब देने के लिए देश की सत्ता पर सेना ने नियंत्रण स्थापित कर लिया है। देश की सरकारी टीवी पर जब कैप्टन सिदसोर कादर औएद्राओगो सेना के शासन की घोषणा कर रहे थे, उस वक्त उनके साथ लाल रंग की टोपी में लेफ्टिनेंट कर्नल पॉल-हेनरी दामिबा भी बैठे थे, जो एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी हैं, और जिन्हें देश की सेना ने बुर्किना फासो के लोगों के लिए नये नेता के तौर पर पेश किया है।

कौन हैं लेफ्टिनेंट कर्नल पॉल-हेनरी दामिबा?

कौन हैं लेफ्टिनेंट कर्नल पॉल-हेनरी दामिबा?

लेफ्टिनेंट कर्नल पॉल-हेनरी दामिबा को पिछले साल नवंबर में ही देश के राष्ट्रपति काबोरे के द्वारा देश के तीसरे सबसे बड़े सैन्य कमांडर के तौर पर नियुक्ति दी गई थी, जो समाचार एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, राजधानी औगाडौगौ में सुरक्षा के लिए जिम्मेदार है। उन्होंने पेरिस में एक सैन्य अकादमी में पढ़ाई की है और हाल ही में "पश्चिम अफ्रीकी सेना और आतंकवाद: अनिश्चित प्रतिक्रियाएँ'' नान से एक किताब भी लिखी है। अभी तक बर्खास्त किए गये राष्ट्रपति काबोरे के ठिकाने के बारे में टेलीविजन पर कोई बयान नहीं दिया गया है। वहीं, राजधानी औगाडौगौ में राष्ट्रपति भवन के आसपास रविवार को हुई लड़ाई के बाद से राष्ट्रपति को सार्वजनिक रूप से नहीं देखा गया है।

हिरासत में राष्ट्ररति काबोरे

हिरासत में राष्ट्ररति काबोरे

चुनी हुई सरकार का तख्तापलट करने वाले सैन्य नेताओं में से एक ने सीएनएन को बताया कि, अपदस्त राष्ट्रपति काबोरे को सोमवार तड़के सैनिकों ने हिरासत में ले लिया था और सेना ने राष्ट्रपति भवन पर नियंत्रण कर लिया है और देश में मची अराजक स्थिति को संभालने की कोशिश की जा रही है। वहीं, सैन्य अधिकारी ने सीएनएन से कहा है कि, अपदस्त राष्ट्रपति को पश्चिम अफ्रीकी देश में एक "सुरक्षित स्थान" पर रखा गया है और काबोरे पूरी तरह से सुरक्षित हैं। हालांकि, राष्ट्रपति के सटीक स्थान के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है। इससे पहले राष्ट्रपति ने सोमवार को एक ट्वीट में देश की हालत को मुश्किल बताया था और कहा था कि, देश अभी मुश्किल हालत से गुजर रहा है और लोकतांत्रिक हितों को संरक्षित किए जाने की जरूरत है। राष्ट्रपति ने कहा था कि, देश में जो भी समस्याएं हैं, बातचीत के जरिए उनका हल किए जाने की जरूरत है। वहीं यूनाइटेड नेशंस ने राष्ट्रपति की गिरफ्तारी के बाद उनकी सुरक्षा को लेकर चिंता जताई है।

तीन साल पहले ही चीन से दोस्ती

तीन साल पहले ही चीन से दोस्ती

अफ्रीकी देश बुर्किना फासो में सेना ने चुनी हुई सरकार का तख्तापलट कर दिया है और देश की राजनीति पूरी तरह से अव्यवस्थित हो गई है और बाहरी नियंत्रण के लिए ये स्थिति पूरी तरह से परफेक्ट मानी जाती है। खासकर तब, जब अफ्रीकी महाद्वीप में चीन एक के बाद एक गरीब देशों को कर्ज के जाल में फंसाकर अपने नियंत्रण में ले रहा है। बुर्किना फासो अभी तक उन तीन अफ्रीकी देशों में से एक रहा है, जिसने चीन के साथ राजनीतिक संबंधों को काफी देर से बहाल किया है और पहली बार दोनों देशों के बीच संबंध आज से सिर्फ तीन साल पहले जनवरी 2019 में स्थापित हुई थी, जब चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने बुर्किना फासो का दौरा किया था और बुर्किना फासो को 44 मिलियन डॉलर की सहायता दी थी। जिसके बाद ही विश्लेषकों ने कहा था कि, चीन अपनी घरेलू राजनीति को साधने के लिए अफ्रीकन देश के साथ दोस्ती कर रहा है, क्योंकि बुर्किना फासो उन देशों में शामिल था, जिसने ताइवान को मान्यता दी थी और ताइवान का मान्यता रद्द करने के बाद ही चीन ने बुर्किना फासो के साथ राजनीतिक संबंध जोड़े थे, लेकिन चीन के साथ संबंध जोड़ने के सिर्फ तीन साल के अंदर ही देश की राजनीति में उथलपुथल मच चुकी है।

राष्ट्रपति ने ही जोड़े थे संबंध

राष्ट्रपति ने ही जोड़े थे संबंध

सबसे दिलचस्प बात ये है, कि जिस राष्ट्रपति काबोरे को सेना ने सत्ता से बेदखल किया है, उसी राष्ट्रपति का फैसला चीन के साथ संबंध बहाली और ताइवान के साथ संबंध खत्म करना था। दरअसल, साल 2015 में काबोरे की सरकार चुनी गई थी और उससे पहले पूर्व राष्ट्रपति ब्लेज कॉम्पोरे की सरकार को एक विद्रोह के बाद हटा दिया गया था। साल 2015 में सत्ता में आने के बाद राष्ट्रपति काबोरे ने 24 मई 2018 को ताइवान के साथ संबंध खत्म करने और चीन के साथ संबंध जोड़ने का फैसला लिया था। और उसके सिर्फ दो दिनों के बाद ही बुर्किना फासो के विदेश मंत्री अस्फा बैरी ने बीजिंग की यात्रा की थी और दोनों ही देशों के संबंध बहाली पर हस्ताक्षर किए थे। जुलाई 2018 में चीनी उप प्रधान मंत्री हू चुनहुआ ने औगाडौगौ में नया चीनी दूतावास खोला। बुर्किना फासो उन तीन अफ्रीकी देशों में था, जिसने चीन के साथ रिश्ते नहीं जोड़े थे, लेकिन बुर्किना फासो की राजनीति में उथल-पुथल मचने के बाद अब चीन के लिए अफ्रीका का रास्ता पूरी तरह से खाली हो गया है।

अफ्रीका महाद्वीप से चीन को फायदा

अफ्रीका महाद्वीप से चीन को फायदा

अफ्रीका महाद्वीप एक ऐसा क्षेत्र है, जहां से चीन को काफी कुछ फायदा मिलता है और बींजिंग की कोशिश अफ्रीकी महाद्वीप पर पूरी तरह से नियंत्रण की रहती है, जिसमें चीन अब बहुत हद तक कामयाब हो चुका है। अफ्रीकी देशों में प्राकृतिक संसाधनों का विशालकाय भंडार है और अफ्रीकी देशों में मानव श्रम काफी सस्ता है, जिसका सीधा फायदा अब चीन उठाता है। अफ्रीकी देशों से चीन को प्राकृतिक संसाधनों की विशाल आपूर्ति होती है और चीनी सामानों के लिए अफ्रीका का एक बड़ा बाजार भी खुल जाता है। जून 2021 'ए न्यू ग्रेट गेम' नामक एक रिपोर्ट में नेशनल ब्यूरो ऑफ एशियन रिसर्च के नाडेज रोलैंड ने लिखा था कि, साल 2040 तक अफ्रीका में श्रम बल एक अरब से ज्यादा हो जाएगा, जो चीन और भारत को पीछे छोड़ देगा। वहीं, साल 2030 तक 30 साल के कम उम्र के 60 प्रतिशत से ज्यादा लोग अफ्रीकन देशों में रहेंगे। यानि, अफ्रीका में चीन किस गेम को खेलने में लगा है, आप आसानी से समझ सकते हैं और अफ्रीकी देशों में अस्थिरता से सबसे ज्यादा फायदा किसे होगा, आप आसानी से लगा सकते हैं।

बेल्ट एंड रोड से जुड़े 46 अफ्रीकी देश

बेल्ट एंड रोड से जुड़े 46 अफ्रीकी देश

अफ्रीकी महाद्वीप में कुल 55 देश हैं और आपको जानकर हैरानी होगी, कि इन 55 देशों में से 46 अफ्रीकी देश चीन की महत्वाकांक्षी 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' यानि बीआरआई प्रोजेक्ट से जुड़े हुए हैं और इन देशों को चीन ने इन्फ्रांस्ट्रक्चर विकास, बंदरगाह निर्माण के नाम पर इतना ज्यादा कर्ज दे दिया है, कि ये देश कभी भी चीन का पैसा नहीं लौटा सकते हैं। इसके साथ ही अफ्रीकी देशों के साथ व्यापार का 90 फीसदी मार्ग समुद्री मार्ग है, लिहाजा अफ्रीकी देशों में चीन ने बंदरगाहों का जाल बिछा डाला है, जिसका इस्तेमाल चीन सैन्य मकसद से कर सकता है, ऐसा विश्लेषकों का आरोप लगता रहता है। विश्लेषकों का कहना है कि, चीन अपनी भू-रणनीतिक महत्वाकांक्षाओं के लिए अफ्रीकी देशों के साथ अपने संबंधों का लाभ उठा सकता है और आने वाले दिनों में पूरी दुनिया के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।

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