अमेरिकी दबाव के बाद भी मध्यपूर्वी देश क्यों नहीं लगा पा रहे रूस पर प्रतिबंध? पुतिन के आगे क्यों हैं मजबूर?
यूक्रेन पर आक्रमण के बाद अमेरिका और कई पश्चिमी देशों के साथ ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और कनाडा भी रूस के खिलाफ अत्यधिक कड़े प्रतिबंध लगा चुके हैं, लेकिन मध्यपूर्वी देश शांत है।
नई दिल्ली, मार्च 14: यूक्रेन पर रूसी हमले ने मध्य पूर्व में स्थित कई देशों को काफी मुश्किल स्थिति में डाल दिया है और अमेरिका और रूस के बीच कई मध्य पूर्व के देश खुद को फंसा हुआ महसूस कर रहे हैं। मध्य पूर्वी देश एक शक्तिशाली देश द्वारा एक कमजोर देश पर किए गये आक्रमण को खुले तौर पर स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं, तो दूसरे तौर वो रूस के खिलाफ जाने की 'हिमाकत' भी नहीं कर सकते हैं। लिहाजा, अमेरिकी दवाब के बाद भी मध्य पूर्वी देशों के लिए रूस पर प्रतिबंध लगाना संभव नहीं हो पा रहा है।

यूक्रेन युद्ध पर असमंजस में मध्यपूर्व
यूक्रेन पर आक्रमण के बाद अमेरिका और कई पश्चिमी देशों के साथ ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और कनाडा भी रूस के खिलाफ अत्यधिक कड़े प्रतिबंध लगा चुके हैं, लेकिन एशियाई (जापान छोड़कर) देश अभी तक रूस के खिलाफ प्रतिबंध लगाने से बच रहे हैं और यही हाल मध्यपूर्वी देशों का भी है, जो प्रतिबंध लगाकर रूस के साथ अपने पारस्परिक रूप से लाभकारी संबंधों को जोखिम में नहीं डालना चाहते। इसलिए, ये देश आक्रमण की मौखिक रूप से निंदा करने के नाजुक संतुलनकारी कार्य में शामिल हैं और साथ ही पश्चिम द्वारा मास्को पर लगाए गए आर्थिक और अन्य प्रतिबंधों में शामिल होने से परहेज किए हुए हैं।

रूस के साथ सीरिया और ईरान
सीरिया और ईरान को छोड़कर, जिन्होंने खुले तौर पर रूस का समर्थन किया है या नाटो पर युद्ध का आरोप लगाया है, उन्हें छोड़कर मध्य पूर्व के लगभग सभी देशों ने रूस पर प्रतिबंध लगाने के मुद्दे पर संयुक्त राज्य अमेरिका, यूरोपीय संघ, कनाडा और पश्चिम को सामान्य रूप से निराश किया है। वहीं, सऊदी अरब और यूएई ने अमेरिका के 'तेल उत्पादन' बढ़ाने की अपील को भी खारिज कर दिया है, जिससे यूरोपीय देशों में तेल संकट खत्म हो सकता था। प्रभावशाली पोलिटिको पत्रकारिता कंपनी की रिपोर्ट के मुताबिक, फिनलैंड, लातविया, एस्टोनिया, बुल्गारिया, स्लोवाकिया, क्रोएशिया और चेक गणराज्य को रूस ने साल 2020 में कुल जरूरत का दो तिहाई गैस निर्यात किया, जबकि जर्मनी, ऑस्ट्रिया, ग्रीस, इटली, लिथुआनिया, पोलैंड हंगरी और स्लोवेनिया अपनी 40 प्रतिशत से अधिक गैस के लिए रूस पर निर्भर थे। यानि, रूस अगर गैस का पाइप बंद करता है, तो एक झटके में ये तमाम देश घुटने पर आ जाएंगे।

अगर रूस ऊर्जा सप्लाई बंद करेगा, तो क्या होगा?
यदि रूस अमेरिका और यूरोपीय संघ द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के प्रतिशोध में गैस आपूर्ति में कटौती करता है, तो इन सभी देशों को एक बड़ी ऊर्जा समस्या का सामना करना पड़ेगा, और ऐसे समय में, जब तेल की कीमतें पहले ही पूरी दुनिया में उच्चतम स्तर पर पहुंच चुकी हैं, तो फिर इन देशों की स्थिति क्या हो सकती है, इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। इसलिए, वाशिंगटन और ब्रुसेल्स ने संयुक्त अरब अमीरात, कतर और सऊदी अरब पर अपना ध्यान केंद्रित किया है। यह उम्मीद करते हुए, कि ये देश और पेट्रोलियम उत्पादक देशों के संगठन (ओपेक) यूरोप में ऊर्जा की कमी को पूरा करने के लिए अपने उत्पादन में काफी वृद्धि करेंगे। और ऊर्जा की बढ़ती कीमतों पर नियंत्रण रखें। लेकिन, ये देश उस वक्त आश्चर्य में पड़ गये, जब सऊदी अरब, यूएई और कतर सहित ओपेक प्लस देशों ने अपना उत्पादन बढ़ाने से इनकार कर दिया, और सदस्य देशों के बीच पहले से सहमत एक समझौते पर टिके रहने का फैसला किया है। ये अमेरिका और यूरोपीय देशों को लगने वाला बहुत बड़ा झटका है और मध्य पूर्व में रूसी प्रभाव को दर्शाता है।

सऊदी अरब कैसे गये अमेरिका के खिलाफ?
हालांकि, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब को पश्चिमी देशों का सहयोगी और खास तौर पर अमेरिका के करीबी देशों में शामिल किया जाता है, लेकिन इन देशों के लिए दिक्कत ये है, कि रूस भी विशेष तौर पर ओपेक प्लस में शामिल है और उसका पारंपरिक सदस्य है और रूस विश्व का दूसरा सबसे बड़ा तेल निर्यातक देश है। लिहाजा, कुछ दिनों पहले वाशिंगटन में यूएई के राजदूत यूसेफ अल ओतैबा ने कहा था, कि अबू धाबी उत्पादन बढ़ाने का पक्षधर है। हालांकि, देश के ऊर्जा मंत्री सुहैल अल मजरूई ने बाद में उस बयान को सही किया, जिसमें जोर देकर कहा गया कि यूएई ओपेक + समझौते और इसके उत्पादन समायोजन तंत्र के लिए प्रतिबद्ध है। यानि, यूएई तेल उत्पादन बढ़ाने के पक्ष में तो है, लेकिन वो ओपेक प्लस के खिलाफ नहीं जाएगा।

यूएन में वोटिंग से गैर-हाजिर यूएई
वहीं, 25 फरवरी को आश्चर्यजनक तौर पर यूनाइटेड नेशंस सिक्योरिटी काउंसिल में यूएई ने रूस के खिलाफ निंदा प्रस्ताव में वोटिंग से गैर-हाजिर रहा, वहीं, 2 मार्च को यूएई ने सिर्फ प्रतीकात्मक तौर पर अमेरिका के पक्ष में वोट किया, कि मॉस्को फौरन अपने सैनिकों को यूक्रेन से बाहर निकाले। लेकिन, सऊदी अरब पूरी तरह से साफ कर चुका है, कि वह तेल की बढ़ती कीमतों को कम करने के लिए तेल उत्पादन में वृद्धि नहीं करेगा और सऊदी अरब ने साफ कहा, कि वह ओपेक + में किए गए आउटपुट समझौते के साथ रहेगा। वहीं, वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट में तो यहां तक कहा गया है कि, सऊदी अरब के प्रिंस सलमान और यूएई के शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान ने अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन से टेलीफोन पर बात करने तक से इनकार कर दिया, जिसमें बाइडेन खुद उन्हें तेल प्रोडक्शन बढ़ाने की अपील करने वाले थे। इसके विपरीत, दोनों नेताओं ने व्लादिमीर पुतिन और बाद में यूक्रेन के राष्ट्रपति वलोडिमिर ज़ेलेंस्की से फोन पर बात की है।

बाइडेन से सऊदी-UAE की नाराजगी क्यों?
सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन से काफी नाराज हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि संयुक्त राज्य अमेरिका ने वास्तव में उनका समर्थन उस वक्त नहीं किया था, जब ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने उनके ऊपर मिसाइल हमले किए थे। इसके अलावा, यूएई और सऊदी अरब इस बात से चिंतित भी हैं, क्योंकि बाइडेन प्रशासन सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के हितों को ध्यान में रखे बगैर, ईरान परमाणु समझौते पर आगे बढ़ रहा है। जबकि, इन सबके बीच कतर ने तटस्थ रूख अपनाते हुए यूक्रेन युद्ध में 'सभी पक्षों से संयम' बरतने का आह्वान किया है। इसके अलावा, कतर ने तर्क दिया है कि, वह अपने प्राकृतिक गैस उत्पादन में वृद्धि नहीं कर सकता है या अपने एलएनजी निर्यात को यूरोप में पुनर्निर्देशित कर सकता है, क्योंकि इसका उत्पादन एशियाई देशों के साथ दीर्घकालिक आपूर्ति अनुबंधों से जुड़ा हुआ है।

मिस्र ने की रूसी हमले की निंदा
वहीं, मिस्र ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में रूस के आक्रमण की निंदा करते हुए अमेरिका समर्थित प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया था, लेकिन मिस्र की तरफ से ये साफ किया गया है कि, वह मास्को के साथ संबंधों को बंद नहीं कर रहा है। 3 मार्च को, मिस्र ने घोषणा करते हुए कहा है कि, स्वेज नहर को रूसी जहाजों के लिए बंद नहीं किया जाएगा। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, मिस्र अपनी करीब 11 करोड़ की आबादी के खाने-पीने के लिए रूस पर निर्भर है और रूसी गेहूं बड़े पैमाने पर मिस्र रूस से ही आयात करता है, लिहाजा मिस्र के लिए रूस से संबंध तोड़ना संभव नहीं है।

यूक्रेन की मदद कर रहा है तुर्की
वहीं, तुर्की, जिसने हाल के वर्षों में यूक्रेन के साथ अच्छे संबंध बनाए रखा है, उसे अपने ड्रोन बेच रहा है, और तुर्की ने रूस के साथ अपने व्यापक व्यापारिक संबंधों को भी बरकारर रखा है। तुर्की ने मॉस्को के खिलाफ लगाए गये पश्चिमी देशों के प्रतिबंध में शामिल होने से इनकार कर दिया है और तुर्की ने कहा है कि, वो दोनों देशों के बीच शांति वार्ता में मध्यस्थता की भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा है। 10 मार्च को, तुर्की ने रूस और यूक्रेन के बीच अंताल्या में रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव, यूक्रेनी विदेश मंत्री दिमित्रो कुलेबा और उनके तुर्की समकक्ष मेवलुत कावुसोग्लू के बीच पहली बार मंत्री स्तरीय बैठक की मेजबानी भी की। हालांकि, बैठक का कोई नतीजा नहीं निकला। यानि, अमेरिका को मध्यपूर्वी देशों से जो मदद मिलनी चाहिए, वो नहीं मिली है, लिहाजा एक्सपर्ट्स का मानना है कि, आने वाले सालों में विश्व की राजनीति, अभी की राजनीति से पूरी तरह बदल जाएगी।












Click it and Unblock the Notifications