कोरोना संकट के बीच कुछ ही देर में धरती के करीब से गुजरने वाला है एवरेस्ट से बड़ा उल्का पिंड, लगाया हुआ है मास्क
वाशिंगटन। कोरोना वायरस ने पहले ही पूरी दुनिया को हिलाकर रखा हुआ है, और अब इसी में एक उल्का पिंड पृथ्वी के बेहद करीब से गुजरने वाला है। वैज्ञानिकों की मानें तो आज सुबह करीब 5 बजकर 56 मिनट पर ये उल्का पिंड धरती के पास से गुजरेगा। लेकिन इससे भी हैरान करने वाली बात ये है कि ये उल्का पिंड माउंट एवरेस्ट से भी कई गुना बड़ा है। अगर ये वायुमंडल से टकाराता है तो सुनामी का खतरा हो सकता है। क्योंकि साल 1908 में साइबेरिया के वायुमंडल में हुए उल्कापिंड के टकराव पर भी ऐसी स्थिति बनी थी, लेकिन पिंड का आकार छोटा था इसलिए वो नुकसान पहुंचाने के बजाय खुद जलकर खाक हो गया था।

मास्क लगाए चेहरे जैसी है पिंड की आकृति
प्यूर्टो रिको की अरेसिबो ऑब्जर्वेटरी ने इस उल्का पिंड की कई तस्वीरें अपने ट्विटर हैंडल से शेयर की हैं जिनमें बड़े मजाकिया तरीके से उन्होंने उल्का पिंड का फोटो शेयर करते हुए इसकी तुलना मास्क लगे चेहरे से की है। उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा, #TeamRadar @NAICobservatory हम लगातार पृथ्वी के पास से गुजरने वाले उल्का पिंड 1998OR2 का अवलोकन कर रहे हैं, हमें अबतक जो विजुअल प्राप्त हुए हैं उसमें यह उल्का पिंड ऐसा दिखाई दे रहा है जैसे इसने चेहरे पर मास्क लगाया हुआ है। CNN ने Arecibo और टीमरडार के प्रमुख ऐनी विर्ककी से बातचीत की उन्होंने कहा, उल्का पिंड 1998 OR2 पर छोटी-छोटी पहाड़िया दिख रही है. जो वैज्ञानिकों को अपनी तरफ काफी आकर्षित कर रही हैं। वहीं उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा कि कोरोनावायरस महामारी के कारण 1998 OR2 को मास्क पहनना याद था।

धरती की ओर 19000 KM/Hr स्पीड से बढ़ रहा उल्का पिंड
वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि उल्का पिंड की गति 19000 किलोमीटर प्रति घंटा है। इसमें अभी 4 घंटे से भी कम कम समय बचा हुआ है। नासा का कहना है कि इस उल्का पिंड से घबराने की जरूरत नहीं है क्योंकि यह धरती से कई किलोमीटर दूरी से गुजरेगा। वहीं कुछ वैज्ञानिकों ने इसके धरती से टकराने की भी आशंका जताई है। खगोलविदों के मुताबिक ऐसे उल्का पिंडों का हर 100 साल में धरती से टकराने की 50,000 संभावनाएं होती हैं।

क्या होते हैं उल्का पिंड
आकाश में कभी-कभी एक ओर से दूसरी ओर अत्यंत वेग से जाते हुए या पृथ्वी पर गिरते हुए जो पिंड दिखाई देते हैं उन्हें उल्का यानी कि meteor कहा जाता है और उल्काओं का जो अंश वायुमंडल में जलने से बचकर पृथ्वी तक पहुंचता है उसे उल्कापिंड यानी कि meteorite कहा जाता है, हर रात को उल्काएं अनगिनत संख्या में देखी जा सकती हैं लेकिन इनमें से पृथ्वी पर गिरनेवाले पिंडों की संख्या बेहद कम होती है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इनका महत्व बहुत अधिक है क्योंकि एक तो ये अति दुर्लभ होते हैं, दूसरे आकाश में विचरते हुए विभिन्न ग्रहों के संरचना के ज्ञान के प्रत्यक्ष स्रोत केवल ये ही पिंड ही हैं, उल्कापिंडों का मुख्य वर्गीकरण उनके संगठन के आधार पर किया जाता है, कुछ तो पिंड लोहे, निकल या मिश्रधातुओं से बने होते हैं और कुछ सिलिकेट खनिजों से बने पत्थर सदृश होते हैं, लोहे, निकल या मिश्रधातुओं को 'धात्विक' और सिलिकेट खनिजों से बने पत्थर को 'आश्मिक उल्कापिंड' कहते हैं।












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