Diplomacy: ईरान के उदारवादी राष्ट्रपतियों ने जलाई है भारत की जीभ! पेजेश्कियान की दिल्ली नीति क्या होगी?

India-Iran News: कट्टर इस्लामिक देश ईरान, जो ग्लोबल पॉलिटिक्स के लिहाज से, खासकर पाकिस्तान और अफगानिस्तान को लेकर भारत के लिए काफी अहम है, वहां मसूद पेजेश्कियान को देश का नया नेता चुना गया है, जो एक उदारवादी और सुधारवादी नेता माने जाते हैं।

हालांकि,मसूद पेजेश्कियान के लिए ईरान की कट्टर इस्लामिक विचारधारा के बीच देश की सरकार को चलाना कितना आसान या कितना मुश्किल होगा, ये तो देखना दिलचस्प होगा, लेकिन दिल्ली को लेकर उनकी नीति कैसी होगी, इसे जानना काफी ज्यादा जरूरी है।

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मसूद पेजेश्कियान का राष्ट्रपति बनना ईरान के ज्यादा व्यावहारिक और सुधारवादी नीतियों की तरफ बदलाव का वादा करता है, लेकिन सवाल ये उठता है, कि सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के नेतृत्व में एक कट्टर धार्मिक शासन के टेस्ट वो कितने कामयाब हो पाएंगे।

राष्ट्रपति पेजेश्कियान किस तरह के प्रकृति वाले इंसान हैं?

ईरान की राजनीति पर नजर रखने वाले एक्सपर्ट्स के मुताबिक, राष्ट्रपति पेजेश्कियान एक ऐसे व्यक्ति हैं, जिनका ग्लोबल पॉलिटिक्स में स्वागत किया जाएगा और उम्मीद है, कि वे ईरान के साथ उसके तेजी से बढ़ते परमाणु कार्यक्रम को लेकर चल रहे तनावपूर्ण गतिरोध से शांतिपूर्ण तरीके से बाहर निकल सकते हैं।

उन्होंने कट्टरपंथी पूर्व वार्ताकार सईद जलीली को चुनाव में हराया है, जिन्हें खामेनेई का करीबी माना जाता है और जो चीन और रूस के साथ घनिष्ठ संबंधों की वकालत करते हैं।

हालांकि, पेजेश्कियान की नीतियों पर फिलहाल संदेह हैं, क्योंकि सभी महत्वपूर्ण राज्य नीतियों पर सर्वोच्च नेता का ही अंतिम फैसला होता है, लेकिन वे देश की विदेश और घरेलू नीति के लिए एक दिशा जरूर तय कर सकते हैं। इसलिए, यह देखना बाकी है, कि उनका राष्ट्रपति पद ईरान के साथ भारत के संबंधों को कैसे प्रभावित कर सकता है।

भारत और ईरान के बीच कैसे रहे हैं संबंध?

भारत और ईरान के बीच दशकों से मजबूत आर्थिक संबंध रहे हैं। लेकिन, अमेरिकी प्रतिबंधों की वजह से पिछले कई सालों से भारत ने ईरान से तेल खरीदना बंद कर रखा है। लेकिन, उससे पहले भारत, ईरान से सबसे ज्यादा कच्चा तेल खरीदने वाला देश रहा है।

वहीं, भारत की बढ़ती ऊर्जा खपत ईरान के विशाल हाइड्रोकार्बन भंडार के कारण उसके साथ उसके आर्थिक सहयोग को और मजबूत बनाती है। भारत का द्विपक्षीय व्यापार भी 2022-23 में बढ़कर 2.33 अरब डॉलर हो गया है, जिससे यह मध्य पूर्व में सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में से एक बन गया है।

ईरान के साथ भारत के सहयोग का एक प्रमुख कारक चाबहार बंदरगाह भी है, जो अफगानिस्तान और मध्य एशिया के साथ एक महत्वपूर्ण ट्रांजिट प्वाइंट है और जहां नई दिल्ली ने भारी निवेश किया है। मई में, भारत और ईरान ने क्षेत्रीय संपर्क बढ़ाने और विशेष रूप से भारत, ईरान और अफगानिस्तान के बीच व्यापार को सुविधाजनक बनाने के लिए शाहिद-बेहेश्टी पोर्ट टर्मिनल के ऑपरेशन के लिए एक दीर्घकालिक अनुबंध पर हस्ताक्षर भी किए हैं।

ये समझौता पूर्व राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी की मौत से ठीक एक हफ्ते पहले ही की गई थी।

ईरान के साथ हुआ यह समझौता, भारत के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, क्योंकि यह पहली बार है, जब वह अफगानिस्तान, मध्य एशिया और बड़े यूरेशियन क्षेत्र को रणनीतिक संपर्क लिंक प्रदान करने के लिए विदेशी बंदरगाह के मैनेजमेंट को संभालेगा।

भारत ने बंदरगाह को सुसज्जित करने में 120 मिलियन डॉलर का निवेश करने का वादा किया है। भारत ने चाबहार से संबंधित बुनियादी ढांचे में सुधार के मकसद से पारस्परिक रूप से पहचानी गई परियोजनाओं के लिए 250 मिलियन डॉलर के बराबर इन-क्रेडिट विंडो की भी पेशकश की है।

भारत-ईरान सहयोग के लिए एक और मंच मल्टीमॉडल अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC) है जो हिंद महासागर और फारस की खाड़ी को ईरान के माध्यम से कैस्पियन सागर से और रूस में सेंट पीटर्सबर्ग के माध्यम से उत्तरी यूरोप को जोड़ता है। इससे भारत को रूस तक शिपमेंट पहुंचने में लगने वाले समय को कम करने में मदद मिलती है और मध्य एशियाई बाजारों के साथ व्यापार को और बढ़ावा मिलेगा।

भारत को लेकर पेजेश्कियान की नीति क्या होगी?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रशासन ने ईरान के साथ रणनीतिक संबंध बनाए हैं। जब इब्राहिम रईसी राष्ट्रपति चुने गए थे, तो विदेश मंत्री एस जयशंकर को तेहरान में उनके शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित किया गया था, और वे ऐसे किसी कार्यक्रम में आमंत्रित होने वाले पहले विदेश मंत्री बने थे।

रईसी के कार्यकाल में भारत-ईरान द्विपक्षीय संबंध नई ऊंचाइयों पर पहुंचे, जिनमें चाबहार पोस्ट डील और भारतीय पर्यटकों के लिए वीजा-मुक्त नीति शामिल है। ईरान के रूस और चीन के करीब जाने और पाकिस्तान को लेकर मतभेदों के बावजूद, दोनों देशों ने अपने प्रभाव का विस्तार करने की कोशिश करते हुए घनिष्ठ राजनयिक संबंधों का आनंद लिया है।

इस महीने के अंत में पेजेशकियन के पदभार संभालने के बाद ये संबंध और भी मजबूत होने की संभावना है। सुधारवादी राष्ट्रपति, पश्चिम के साथ मधुर संबंधों और ईरान में व्यावहारिक आर्थिक सुधारों की वकालत करते हैं। अगर वे ऐसा करने में कामयाब होते हैं, तो इससे तेहरान और नई दिल्ली के बीच द्विपक्षीय व्यापार की बाधाएं कम होंगी, जो ईरान की कमजोर अर्थव्यवस्था के कारण उसके हित में है।

भारत में ईरान के दूत इराज इलाही ने भी जोर देकर कहा है, कि भारत-ईरान संबंध मजबूत हैं और किसी भी राष्ट्रपति से उन पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

इस महीने की शुरुआत में समाचार एजेंसी एएनआई से बातचीत में ईरानी राजदूत ने कहा था, कि "हमने विभिन्न समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। हमने सहयोग के लिए विभिन्न क्षेत्रों को परिभाषित किया है। कनेक्टिविटी हमारे संबंधों का मुख्य हिस्सा है और सांस्कृतिक रूप से, हम दोनों देश संबंधों को मजबूत करने के लिए सहमत हुए हैं।" उन्होंने आगे कहा, कि भारत एक उभरती हुई शक्ति है और नए राष्ट्रपति द्विपक्षीय संबंधों में नई ऊर्जा लाएंगे।

भारत-ईरान संबंधों में क्या चुनौतियां होंगी?

माना जा रहा है, कि पेजेश्कियन काफी सावधानी के साथ अपने कार्यकाल की शुरूआत कर सकते हैं, क्योंकि उनके लिए ये साफ नहीं होगा, कि वह एक ऐसे देश में सुधारवादी नीतियों को कैसे लागू कर पाएंगे, जहां खमेनेई के नियंत्रण में एक कट्टरपंथी कैबिनेट सभी राज्य मामलों पर अंतिम फैसला लेती है। दूसरे, ईरान के 'प्रतिरोध की धुरी' और इजरायल के साथ दशकों से चल रहे संघर्ष पर पेजेश्कियन का रुख, मध्य पूर्व में भारत की कड़ी कूटनीति को भी प्रभावित कर सकता है।

ईरान के इतिहास में मोहम्मद खातमी और हसन रूहानी जैसे सुधारवादी राष्ट्रपति पहले भी हुए हैं,जो शिया मौलवी प्रतिष्ठान द्वारा नियंत्रित देश की व्यवस्था को खोलने में नाकामी हासिल की है।

वहीं, भारत के रूहानी के साथ भी रिश्ते खराब रहे, क्योंकि उन्होंने कश्मीर पर विवादास्पद बयान दिए। ईरान ने कश्मीर मुद्दे पर नियमित रूप से पाकिस्तान का समर्थन किया है, और ईरान के साथ संबंधों के लिए भारत की भविष्य की प्रतिबद्धता भी पेजेश्कियन के उसी रुख पर निर्भर करेगी।

इसके अलावा, भारत-ईरान के बढ़ते संबंधों पर अमेरिका की भी कड़ी नजर रहेगी, जिसने ट्रम्प प्रशासन के तहत 2015 के परमाणु समझौते के टूटने के बाद ईरान के खिलाफ करीब 600 प्रतिबंध लगाए हैं। हाल ही में, अमेरिका ने भारत को चेतावनी दी थी, कि अगर भारत ईरान के साथ चाबहार बंदरगाह सौदे से पीछे नहीं हटता है, तो उस पर संभावित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। हालांकि, भारत ने सौदे पर पीछे हटने से इनकार कर दिया।

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