बिकनी से बुर्का तक... 50 सालों में औरतों को कितना पीछे ले गया ईरान? फिर बदलाव की आहट
एक वक्त बिकनी पहनने वाली ईरान की औरतों को अब हिजाब में रहना अनिवार्य है और कई अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकर संगठनों ने अपनी रिपोर्ट्स में कहा है, कि ईरान में काफी खराब तरीके से महिलाओं का उत्पीड़न किया जाता है।
तेहरान, सितंबर 19: एक जमाना था, जब भारत भी रूढ़िवाद की जंजीरों में जकड़ा हुआ था, उस वक्त ईरान की महिलाएं बिकनी पहनकर समुद्र किनारे जमकर मस्ती करतीं थीं। ना हिजाब पहनने का बंधन था और ना ही बुर्का में दिनभर कैद रहने का। लेकिन, फिर एक दिन ईरान में इस्लामिक क्रांति हुई और महिलाओं को काले लबादे में कैद होने का फरमान जारी कर दिया जाता है। दुनिया आगे बढ़ रही है, लेकिन ईरान और अफगानिस्तान जैसे लोग मानव सभ्यता और औरतों को आधुनिक बनाने के मामले में पत्थरों के युग में ले जाया जा रहा है और एक बार फिर से ईरान की महिलाएं अपने पैरों की इन बेड़ियों को तोड़ने के लिए संघर्ष कर रही हैं। आईये जानते हैं, कि आखिर कैसे ईरान की महिलाओं के अधिकार सीमित किए गये और कैसे ईरानी महिलाएं अपने अधिकारों को फिर से हासिल करने के लिए संघर्ष कर रही हैं।

पहले ऐसा नहीं था ईरान
ईरान हमेशा से ऐसा देश नहीं था, खासकर 1979 में इस्लामिक सरकार बनने से पहले ईरान में महिलाओं को अपने तरीके से जीवन जीने की पूरी आजादी थी और महिलाओं के लिए बिकनी पहनना आम बात थी। ईरान में सिर्फ त्योंहारों के मौके पर ही बुर्का पहनने का चलन था, लेकिन फिर साल 1979 में इस्लामी क्रांति हो गई और फिर ईरान में महिलाओं के लिए हिजाब पहनना अनिवार्य कर दिया गया। ईरान में महिलाओं के अधिकार काफी सीमित कर दिए गये और देश में महिलाओं को सार्वजनिक जगहों पर हिजाब पहनना अनिवार्य कर दिया गया। शरिया कानून के तहत महिलाओं की आजादी छीनी गई और उन्हें इस तरह से हिजाब पहनने के लिए कहा गया, जिससे उनका बाल बिल्कुल भी नही दिखे। हालांकि, पहले फिर भी हिजाब को लेकर नियम थोड़े नरम थे, लेकिन बाद में आने वाली सरकारों ने मौलवियों को खुश करने के लिए इस नियम को और सख्त करना शुरू किया और मौजूदा राष्ट्रपति रायसी ने हिजाब पहनने के सख्ततम कानून की पैरवी की है और अगर ईरान में सार्वजनिक जगहों पर कोई महिला बगैर हिजाब नजर आती है, तो फौरन उसे गिरफ्तार कर लिया जाता है।

औरतों को कुचलने की कोशिश
ईरान में 1979 से पहले शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी का शासन था, जो ईरान में आधुनिक शासन का स्थापना कर रहे थे और उन्होंने इस्लाम की कई रूढ़िवादिता को चुनौती दी थी, लिहाजा उन्हें लगातार कट्टरपंथियों की तरफ से चुनौती का सामना करना पड़ता था। कट्टरपंथियों को दबाने के लिए शाह मोहम्मद रज़ा ने देश में इस्लाम की भूमिका कम करनी शुरू कर दी और उन्होंने ईरान के लोगों को पुरानी सभ्यता की तरफ मोड़ने की कोशिश शुरू कर दी और उन्होंने ईरान में पश्चिमीकरण को बढ़ावा देना शुरू कर दिया, जिससे देश के मुल्लाह चिढ़ गये और उन्हें अमेरिका का पिट्ठू बताकर उनके खिलाफ एक तरह से जंग का ऐलान कर दिया। साल 1978 में शाह मोहम्मद रज़ा के खिलाफ करीब 20 लाख से ज्यादा लोग शाहयाद चौक पर प्रदर्शन करने के लिए जमा हो गये, जिसके बाद शाह मोहम्मद रज़ा ने अपने परिवार के साथ ईरान छोड़ दिया और ईरान में एक कट्टर शरियत कानून की स्थापना की गई और महिलाओं से तमाम अधिकार छीन लिए गये।
महिलाओं का होता है उत्पीड़न
यानि, एक वक्त बिकनी पहनने वाली ईरान की औरतों को अब हिजाब में रहना अनिवार्य है और कई अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकर संगठनों ने अपनी रिपोर्ट्स में कहा है, कि ईरान में काफी खराब तरीके से महिलाओं का उत्पीड़न किया जाता है। मानवाधिकार के लिए आवाज उठाने वाली तीन ईरानी महिलाओं मोनिरेह, यासमैन और मोजगन को 30 साल की सख्त जेल की सजा सुनाई गई है और उनका अपराध सिर्फ ये था, कि उन्होंने मेट्रो के अंदर महिला यात्रियों को फूल दिया था। इन महिलाओं ने गिरफ्तारी से पहले एक वीडियो बनाया था और कहा था, कि उन्हें उम्मीद है, कि एक दिन ईरान में हर महिला को अपनी मर्जी के मुताबिक कपड़े पहनने की आजादी होगी। एमनेस्टी की रिपोर्ट में कहा गया है कि, जो महिलाएं हिजाब नहीं पहनती हैं, उन्हें वेश्यावृति के आरोप में पकड़ लिया जाता है और फिर प्रताड़ित किया जाता है।

ईरानी महिलाओं की क्या है मांग?
ईरान की महिलाएं पिछले कई सालों से अपनी आजादी और बराबरी के अधिकारों के लिए लड़ रही हैं और एक एनजीओ इक्लाविटी नाऊ से बात करती हुई दिमा दबौस नाम की एक महिला ने कहा कि, हमारी लड़ाई बस इतनी है, कि हमारे साथ अपराधियों जैसा सलूक होना बंद हो। हमारे ऊपर नजर नहीं रखी जाए और अगर हम बाजार जाएं, तो हमारी निगरानी नहीं की जाए। उन्होंने कहा कि, हमारे पास भी अभिव्यक्ति की आजादी हो, बोलने की समानता हो और हमारे पास भी मानवाधिकार हो। लेकिन, ईरान की महिलाओं को अधिकार देने की बात से ईरान के मौलवी बिल्कुल सहमत नहीं हैं और वो इसे धर्म के खिलाफ बताते हैं।

मौलवियों को गहरा ऐतराज
तेहरान के एक इमाम अयातुल्ला अहमद खतामी को महिलाओं के अधिकार की बात को पाप बताते हैं। उन्होंने पिछले दिनों एक इंटरव्यू में कहा था, कि हर महिला को सरकार के हिजाब को लेकर बनाए गये कानून का पालन करना होगा और अगर वो कानून का उल्लंघन करती है, तो वो अक्षम्य पाप है और ये चोरी या फिर घपला करने के बराबर है। उन्होंने कहा कि, 'हिबाज को नाम कहना पूरी तरह से गलत है और यह शब्द अल्लाह के पास नहीं है। ना ही कुरान में या किसी और धार्मिक ग्रंथ में हिजाब पहनने से इनकार करने के लिए कहा गया है'। लेकिन, मानवाधिकार कार्यकर्ता दबौस का कहना है, कि ईरान में अब हिजाब पहनने को लेकर महिलाओं के खिलाफ होने वाली कार्रवाई में बाढ़ आ गई है और धार्मिक कट्टरपंथी इसका जमकर फायदा उठा रहे हैं। उन्होंने कहा कि, ईरान में महिलाओं का उत्पीड़न करने के लिए और उन्हें अलग अलग तरहों से प्रताड़ित करने के लिए धर्म का इस्तेमाल किया जाता है।

सरकार ने जारी किए थे नये आदेश
ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामनेई को भी हिजाब उतारने को लेकर गहरा एतराज है और उन्होंने पिछले दिनों हिजाब कानून का सभी से पालन नहीं होने को लेकर आपत्ति जताई थी, जिसके बाद सरकार की तरफ से नये आदेश जारी किए गये। वहीं, ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रायसी के ससुर अहमद आलमोहोदा, जो बहुत बड़े कट्टरपंथी नेता हैं, उन्होंने भी पिछले दिनों हिजाब को लेकर कड़े आदेश जारी किए जाने को लेकर सरकार के अटॉर्नी की तारीफ की थी, इस आदेश के तहत हिजाब नहीं पहनने पर मेट्रो में चढ़ने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है।

फिर से आवाज उठा रही महिलाएं
महसा अमीनी की पुलिस हिरासत में संदिग्ध मौत के बाद एक बार फिर से ईरान में बवाल मचा हुआ है और ईरान की महिलाएं अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही हैं। सोशल मीडिया पर कई ऐसे वीडियो वायरल हो रहे हैं, जिसमें ईरान की महिलाएं हिजाब को जला रही हैं और अपने बाल काटकर इस्लामिक सरकार का विरोध कर रही हैं। अभी तक 16 हजार से ज्यादा महिलाओं के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है और सैकड़ों महिलाओं को गिरफ्तार किया है। प्रदर्शनकारियों पर गोली भी चलाई गई हैं, जिसमें दर्जनों लोगों के घायल होने की भी खबर है। वहीं, ईरान की महिलाएं उस वक्त को याद कर रही हैं, जब उनसे ठीक पहले की पीढ़ी के पास आजादी होती थी और उनके पास अपनी मर्जी से जीने का हक हुआ करता था।












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