US पर यकीन करना साबित हो सकता है घातक, बनाने होंगे अपने हथियार.. डिफेंस इंडस्ट्रियल स्ट्रैटजी में भारत को सीख

US releases First Defense Industrial Strategy: अमेरिका के डिपार्टमेंट ऑफ डिफेंस, यानि रक्षा विभाग ने अपनी पहली डिफेंस इंडस्ट्रियल स्टैटजी (NDIS), जिसे पिछले महीने जारी किया गया था, उसमें अपनी डिफेंस इंडस्ट्री को लचीला डिफेंस इको सिस्टम बनाने के लिए 59 पन्नों का एक दस्तावेज जारी किया गया था, ताकि भविष्य में अमेरिका की रक्षा जरूरतों को पूरा किया जा सके।

अमेरिका का मानना है, कि चीन उसके लिए सबसे बड़ा खतरा है, जबकि यूक्रेन में चल रहे युद्ध और गाजा में इजराइल के उलझने के बाद अमेरिका ऐसी स्थिति में फंस गया है, जहां उसे इन दोनों देशों की रक्षा जरूरतों को भी पूरा करना है और अपनी क्षमता भी बनाए रखनी है।

US releases First Defense Industrial Strategy

अमेरिका की डिफेंस इंडस्ट्री कैसी है?

अमेरिकी डिफेंस इंडस्ट्री का पूरी दुनिया पर गहरा प्रभाव रहा है और पिछले सौ सालों से अमेरिका, पूरी दुनिया में हथियारों की सप्लाई करता आया है। और एक्सपर्ट्स का कहना है, कि अगर दुनिया में युद्ध चलता रहे, तो इसका सबसे बड़ा फायदा अमेरिकी डिफेंस इंडस्ट्री को होता है।

लिहाजा, अमेरिका बार बार अपनी डिफेंस इंडस्ट्री में बदलाव करता आया है, ताकि उसे देशों के झगड़ों में फायदा हो सके। इसीलिए अमेरिका में डिफेंस इंडस्ट्री पॉलिसी बनाया गया, ताकि ये बेकाबू ना हो जाए।

किसी भी इंडस्ट्री को सयम के मुताबिक चलने के लिए समय के मुताबिक की वैज्ञानिक बदलाव करते रहने की जरूरत होती है और अमेरिका इसमें हमेशा आगे रहा है, ताकि दुनिया की मांगों को पूरा किया जा सके।

लेकिन, अब चीन अमेरिका के रास्ते में पहाड़ बनकर खड़ा होने की कोशिश कर रहा है।

चीन अब जहाज निर्माण से लेकर महत्वपूर्ण खनिजों से लेकर माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक्स तक, कई प्रमुख क्षेत्रों में वैश्विक औद्योगिक बिजलीघर बन गया है, और यह न केवल संयुक्त राज्य अमेरिका की क्षमता, बल्कि अमेरिका के यूरोपीय और एशियाई सहयोगियों के संयुक्त उत्पादन से कहीं ज्यादा निर्माण करता है। यूक्रेन और गाजा संघर्षों ने औद्योगिक मांगों और संबंधित जोखिमों के विभिन्न सेटों को उजागर कर दिया है।

लिहाजा, अमेरिका की डिफेंस इंडस्ट्रियल स्टैटजी चीन से मुकाबला करने के लिए तैयार की गई वो दस्तावेज है, जिसमें अमेरिका के इंडो-पैसिफिक क्षेत्र और व्यापक अंतरराष्ट्रीय प्रणाली को अपनी सत्तावादी प्राथमिकताओं के अनुरूप फिर से आकार देने के अपने इरादे को प्रदर्शित किया है।

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भारत के लिए क्या सबक हैं?

भारत को NDIS रिपोर्ट को ध्यान से देखने और उसके मुताबिक सबक सीखने की जरूरत है, ताकि भविष्य के मुताबिक अपने आप को किसी भी कठिन परिस्थिति के लिए तैयार किया जा सके। सबसे बड़ी सबक ये है, कि भारत अब अमेरिका से कई डिफेंस प्लेटफॉर्म्स की आयात कर रहा है, लिहाजा अमेरिका की मानसिकता को समक्षते हुए, अमेरिका को कभी भी विश्वसनीय सहयोगी मानने की भूल से बचना होगा।

भारत को सामान्य वैश्विक धारणा को ध्यान में रखना होगा, कि संयुक्त राज्य अमेरिका एक अविश्वसनीय भागीदार है और भू-राजनीतिक कारणों से वो कभी भी अपने किसी भी सहयोगी को 'धोखा' दे सकता है।

रक्षा उत्पादन और महत्वपूर्ण हथियार सामग्री में आत्मनिर्भरता बढ़ाना ही होगा, ताकि अपनी डिफेंस टेक्नोलॉजी का विकास हो सके, अपनी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस हो, और सरकार को डिफेंस इंडस्ट्री में रिसर्च एंड डेवलमेंट के लिए बजट को बढ़ाना ही होगा।

भारत को ज्यादा से ज्यादा डिफेंस टेक्नोलॉजी को अपने नाम पर पेटेंट के लिए रजिस्ट्रेशन करवाने में सक्षम होना होगा। जटिल युद्ध-लड़ाई आवश्यकताओं से अत्यधिक अनुकूलित सामग्री समाधान प्राप्त हो सकते हैं। डिफेंस इंडस्ट्री को बढ़ावा देने के लिए नियमों में नरमी बरतने की जरूरत है। MSME सेक्टर को डिफेंस से जोड़ना होगा, ताकि भारत का घरेलू बाजार डिफेंस इंडस्ट्री की जरूरतों को पूरा करने में सक्षम हो।

भारत इस वक्त अमेरिका का डिफेंस पार्टनर है, लिहाजा भारत को इसका ज्यादा से ज्यादा फायदा उठाना होगा, ताकि भारत में डिफेंस टेक्नोलॉजी हा सके। हालांक, मोदी सरकार की हथियार खरीदने की नीति ही यही है, कि कोई भी समझौता तभी होगा, जब हथियार बेचने वाला देश ना सिर्फ भारत के साथ टेक्नोलॉजी ट्रांसफर करे, बल्कि हथियारों का निर्माण भी भारत में ही करे। अगर कोई देश ऐसा करने से मना करता है, तो भारत उस समझौते को रद्द कर देता है।

तेजी से लक्ष्य की तरफ बढ़ रहा भारत

इसके अलावा, भारत को अपनी रक्षा खरीद सोर्सिंग बास्केट को संतुलित करना होगा। अगले दो दशकों में भारत के तरकश में 40% भारतीय, 30% रूसी और 30% पश्चिमी हथियार होना चाहिए।

इसके अलावा, भारत को धीरे-धीरे चीन से जुड़ी आपूर्ति श्रृंखलाओं पर अपनी निर्भरता कम करनी होगी।

मोदी सरकार ने रक्षा उपकरणों के स्वदेशी डिजाइन और विकास को बढ़ावा देने के लिए, पूंजीगत उपकरणों की खरीद के लिए स्वदेशी रूप से डिजाइन, विकसित और निर्मित (भारतीय-आईडीडीएम) श्रेणी को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। विदेशी ओईएम से प्रौद्योगिकी हस्तांतरण (टीओटी) के साथ स्वदेशी उत्पादन को प्राथमिकता मिलती है।

भारत सरकार ने इनोवेशन और टेक्नोलॉजी को बढ़ावा देने के लिए रक्षा के लिए इनोवेशन फॉर डिफेंस एक्सीलेंस (iDEX) नामक एक नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण किया है। रक्षा में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को अपनाने में सक्षम बनाने के लिए, डिफेंस एआई काउंसिल (डीएआईसी) और डिफेंस एआई प्रोजेक्ट एजेंसी (डीएआरपीए) बनाई गई हैं।

भारत में अप्रैल 2023 तक रक्षा क्षेत्र में काम करने वाली 369 कंपनियों को कुल 606 इंडस्ट्रियल लाइसेंस जारी किए गए हैं। औद्योगिक लाइसेंस की आवश्यकता वाले रक्षा उत्पादों की सूची को तर्कसंगत बनाया गया है, और अधिकांश भागों या घटकों के निर्माण के लिए औद्योगिक लाइसेंस की आवश्यकता नहीं है। सकारात्मक स्वदेशीकरण सूची में अब लगभग 5,000 हथियार प्रणालियां या घटक शामिल हैं।

और अंत में... भारत को भी अपना NDIS दस्तावेज़ बनाना चाहिए या यदि वह पहले से मौजूद है, तो उसमें सुधार करना चाहिए। इससे न केवल क्षेत्र को प्राथमिकता मिलेगी, बल्कि औद्योगिक योजना और कौशल विकास में स्पष्टता आएगी। इससे सभी हितधारकों द्वारा साझेदारी और स्वामित्व बढ़ेगा। यह भारत को रक्षा विनिर्माण मूल्य श्रृंखला में तेजी से आगे बढ़ाएगा।

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