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'पीएम मोदी और जयशंकर हमें पार्टनर समझें', इस देश ने भारत से लगाई दोस्ती की गुहार

कोसोवो एक मुस्लिम बाहुल्य देश है, जिसे अमेरिका मान्यता देता है, लेकिन भारत, चीन और रूस मान्यता नहीं देता है।

Kosovo-India

Kosovo-India: कोसोवो के पूर्व प्रधानमंत्री रामुश हरदिनाज ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर से उनके देश को मान्यता देने और कोसोवो को एक आर्थिक भागीदार के रूप में मानने के साथ साथ भारत में कोसोव के लोगों को प्रवेश की अनुमति देने का आग्रह किया है।

कोसोवो के पूर्व पीएम ने क्या कहा?

कोसोवो के पूर्व पीएम ने क्या कहा?

कोसोवो के पूर्व प्रधानमंत्री रामुश हरदिनाज ने भारतीय मीडिया दि प्रिंट को दिए गये एक स्पेशल इंटरव्यू में भारत सरकार से देश को मान्यता देने की गुहार लगाई है। उन्होंने कहा कि, "कोसोवो, एक तरह से, तार्किक रूप से इस क्षेत्र में अच्छी तरह से स्थित है। मुझे आशा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और विदेश मंत्री जयशंकर हमारे साथ एक भागीदार और मित्र के रूप में व्यवहार करेंगे, और हमें न केवल भारत के साथ व्यापार करने बल्कि भारत की यात्रा करने की भी अनुमति देंगे।" उन्होंने कहा कि, "अगर वह कोसोवो के अगले संसदीय चुनाव में हिस्सा लेते हैं, तो भारत सरकार, भारतीय संस्थानों और भारत के व्यापार भागीदारों तक पहुंचना उनकी "प्राथमिकता" होगी। एलायंस फॉर द फ्यूचर ऑफ कोसोवा (एएके) के चेयरमैन हरदिनाज ने साल 2004 से 2005 तक और फिर 2017 से 2020 तक दो बार प्रधानमंत्री के रूप में काम किया है।

मुस्लिम बहुत क्षेत्र है कोसोवो

मुस्लिम बहुत क्षेत्र है कोसोवो

कोसोवो एक मुस्लिम बहुल क्षेत्र है, जिसने 2008 में सर्बिया से स्वतंत्रता की घोषणा की थी और कोसोवो को अमेरिका, फ्रांस और जर्मनी सहित 100 से ज्यादा देशों से मान्यता मिली हुई है। लेकिन, भारत, रूस, चीन और ब्राजील उन राष्ट्रों में से हैं, जिन्होंने अभी तक कोसोवो की स्वतंत्रता को मान्यता नहीं दी है। सर्बिया भी कोसोवो पर दावा करना जारी रखे हुआ है, और इसे एक संप्रभु राज्य के रूप में मान्यता देने से इनकार करता है। भारत-कोसोवो ट्रेड कॉमर्स इकोनॉमिक ऑफिस (IKCEO), जो कि भारत सरकार से स्वतंत्र एक अलग निकाय है, उसके ऑफिस की नई दिल्ली में उद्घाटन के कुछ सप्ताह बाद हरदिनाज की ये टिप्पणी आई है। हालांकि, व्यापार निकाय के शुभारंभ के बाद भी भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) ने दोहराया कि, नई दिल्ली कोसोवो पर अपना रुख नहीं बदलेगी। और भारत सरकार के बयान का सर्बियाई दूतावास ने स्वागत किया था।

'यूगोस्लाविया के साथ भारत के संबंध बाधा नहीं'

'यूगोस्लाविया के साथ भारत के संबंध बाधा नहीं'

20 वीं शताब्दी की शुरुआत में, कोसोवो सर्बिया किंगडम का हिस्सा हुआ करता था, जब तक कि बाद में यूगोस्लाविया बनाने के लिए अन्य स्लाव देशों के साथ उसका विलय नहीं हुआ। यूगोस्लाविया के टूटने के बाद, कोसोवर्स ने 1991 में सर्बिया और यूगोस्लाविया से अलग होने के लिए मतदान किया, जिसे तत्कालीन यूगोस्लाविया के राष्ट्रपति स्लोबोडन मिलोसेविच, जो खुद एक सर्ब भी थे, उन्होंने क्रूर कार्रलाई की थी, जिसके बाद साल 1998 से 1999 तक सर्बियाई सेना के साथ खूनी युद्ध हुआ और कोसोवो संयुक्त राष्ट्र प्रशासन के अधीन आ गया। आखिरकार कोसोवो ने आधिकारिक तौर पर 2008 में सर्बिया से स्वतंत्रता की घोषणा की। जब यूगोस्लाविया बरकरार था, तब उसने भारत के साथ घनिष्ठ संबंध साझा किए थे। वास्तव में, यूगोस्लाविया के राष्ट्रपति जोसिप ब्रोज़ टीटो प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू के साथ गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) के सह-संस्थापकों में से थे।

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