जानिए क्यों व्लादिमीर पुतिन का दौरा भारत के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है, खुलेगा दोस्ती का नया अध्याय

सिर्फ रूस ही ऐसा देश है, जिसने बगैर स्वार्थ भारत का हमेशा से साथ दिया है, लेकिन पिछले कई सालों में भारत का रूझान अमेरिका की तरफ है, जिसे कभी भी भरोसेमंद साथी नहीं माना गया है।

नई दिल्ली, दिसंब 04: दोस्त रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के स्वागत के लिए नई दिल्ली पूरी तरह से तैयार है और दोनों देशों के नेताओं के बीच वार्षिक शिखर सम्मेलन का आगाज 6 दिसंबर से होने जा रहा है। पिछले साल कोविड-19 की वजह से रूसी राष्ट्रपति का भारत दौरा टल गया था, लेकिन इस साल पुतिन का ये दौरा भारत के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होने वाला है। खासकर भारत और रूस के बीच के संबंधों को लेकर नई कहानी का आगाज होने वाला है।

बेहद महत्वपूर्ण है पुतिन का भारत दौरा

बेहद महत्वपूर्ण है पुतिन का भारत दौरा

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफेसर पुष्पेश पंत के अनुसार, पुतिन की यात्रा पिछले पांच से छह सालों की तुलना में कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। एएनआई से बात करते हुए पुष्पेश पंत ने कहा कि, "भारत अब जो महसूस कर रहा है, वह यह है कि अमेरिका के साथ अति-निर्भरता शायद बहुत विश्वसनीय नहीं है क्योंकि क्वाड के साथ जो हुआ वह भारत को दिखाता है कि अमेरिकी अचानक क्वाड से ऑकस में खुद को लेकर आ गया है। और अफगानिस्तान में भी अमेरिका से भारत को 'धोखा' ही मिला है। इसके अलावा भारत को खाड़ी देश, खासकर सऊदी अरब को लेकर ज्यादा चिंता है। भारत को पता है कि अगर वह रूस के साथ संबंधों को मजबूत नहीं करता है, तो रूस धीरे-धीरे चीन के साथ मजबूत होने से और भी मजबूत हो जाएगा''।

नये दौर में जाएगा संबंध

नये दौर में जाएगा संबंध

पुष्पेश पंत का मानना है कि, चीन को देखते हुए भारत को रूस से एस-400 मिसाइल सिस्टम की जरूरत है। उन्होंने कहा कि, ''हम फ्रांस, इजराइल और कनाडा सहित अन्य देशों से रक्षा उपकरण खरीद रहे हैं। मुझे लगता है कि हम अपने संबंधों पर फिर से चर्चा करना पसंद करेंगे और रूस में रुचि रखने वाला समुदाय का भी मानना है कि रूस के साथ हमारे हितों का कोई टकराव नहीं है।"

अमेरिका का एंगल

अमेरिका का एंगल

प्रोफेसर पंत ने यह भी कहा कि, "भारत ने अमेरिका के करीब जाना शुरू कर दिया है, और ये आज नहीं हुआ है, बल्कि करीब 25 साल पहले जब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) इस (भारत) देश पर शासन कर रहा था और रक्षा के मुद्दे पर देश में लंबी चर्चा हो रही थी, उस वक्त से भी भारत अमेरिका की तरफ झुकने लगा था। उन्होंने कहा कि, ''भारत ने रूस से दूरी बनानी शुरू कर दी थी, लेकिन, मास्को सैन्य हार्डवेयर में हमारा बहुत बड़ा व्यापारिक भागीदार बना हुआ है क्योंकि आप रातों-रात अपने सैन्य हार्डवेयर को बदल नहीं सकते हैं।" विश्लेषकों का मानना है कि, 'रूस बिना स्वार्थ भारत का मददगार और सहयोगी बना रहा है, लेकिन अमेरिका के साथ ऐसा नहीं है। अमेरिका पर आंख मुंदकर भरोसा नहीं कर सकते हैं।'

कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा

कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा

वहीं, ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के प्रतिष्ठित नंदन उन्नीकृष्णन का मानना है कि, "यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण यात्रा है क्योंकि इसे कोविड के कारण स्थगित कर दिया गया था और बहुत सारे सकारात्मक मुद्दे हैं जिन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पुतिन को चर्चा करनी है। अंत में यात्रा, अटकलें हैं कि वे दस साल के लिए एक रक्षा समझौते के साथ-साथ कई अन्य महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर करेंगे।" पुतिन 6 दिसंबर को भारत का दौरा करने वाले हैं। पुतिन और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच बैठक में भारत को एस-400 वायु रक्षा प्रणाली को लेकर भी आगे की बातचीत होनी है।''

रक्षा संबंधों को विस्तार

रक्षा संबंधों को विस्तार

राष्ट्रपति पुतिन की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच रक्षा संबंधों को भी विस्तार दिया जाएगा। और पुतिन की भारत यात्रा के दौरान आने वाले सोमवार को 7.5 लाख एके -203 अटैक राइफल्स का सौदा दोनों देशों के बीच होने वाला है। इसके लिए कैबिनेट की सुरक्षा समिति से अंतिम मंजूरी सहित सभी आवश्यक मंजूरी दे दी गई हैं। सरकारी सूत्रों ने एएनआई को बताया कि रूसी राष्ट्रपति की यात्रा के दौरान इसपर मुहर लगने वाली है। आईजीएलए कंधे से निकाली गई एयर डिफेंस सिस्टम पर दोनों देशों के बीच भी काम प्रगति पर है जो पिछले कई सालों से बना रहा है।

अमेठी में लगेगा कारखाना

अमेठी में लगेगा कारखाना

रूसी डिजाइन एके -203 उत्तर प्रदेश अमेठी में एक कारखाने में किया जाएगा। कुछ साल पहले दोनों पक्षों के बीच सौदा पर सहमति हुई थी और अब अंतिम प्रमुख मुद्दा टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के पर मुद्दों को हल किया जाएगा। इसके अलावा भारतीय सेना द्वारा 7.5 लाख राइफल्स हासिल किए जाने वाले पहले 70,000 में रूसी निर्मित कंपोनेंट्स को शामिल किया जाएगा, क्योंकि इसके लिए टेक्नोलॉजी ट्रांसफर धीरे-धीरे होता है। प्रोडक्शन शुरू होने के 32 महीने बाद इन्हें सेना में पहुंचा दिया जाएगा।

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