अमेरिका में टैक्सी चलाते हैं अफगानिस्तान के आखिरी वित्त मंत्री खालिद पयिंदा, बोनस के लिए करते हैं ये काम

वाशिंगटन डीसी, 20 मार्च: पिछले साल तालिबान की हुकूमत से पहले अफगानिस्तान में वहां की चुनी हुई सरकार थी। अशरफ गनी राष्ट्रपति थे और उनका पूरा मंत्रिमंडल था। लेकिन, तालिबान की एंट्री के साथ ही वहां की सत्ता आतंकवादियों के हाथों में आ गई। राष्ट्रपति गनी पर सरकारी खजाने से करोड़ों डॉलर लेकर भाग जाने के आरोप लगे थे। आशंका थी कि बाकी मंत्रियों ने भी जरूर जनता के धन पर हाथ साफ किया होगा। लेकिन, गनी कैबिनेट में वित्त मंत्री रहे खालिद पयिंदा की तो उस घटना के बाद पूरी जिंदगी ही बदल गई है। वह अमेरिका में टैक्सी चलाकर परिवार का पेट भर रहे हैं। रात-रात भर जागते हैं, ताकि परिवार के गुजारे लायक रकम जुटा सकें। उन्होंने हाल ही में एक इंटरव्यू दिया है, जिससे उन जैसे अफगानियों की दर्द भरी दास्तां सामने आ गई है।

कैब ड्राइवर बनकर परिवार को पाल रहे हैं पूर्व वित्त मंत्री

कैब ड्राइवर बनकर परिवार को पाल रहे हैं पूर्व वित्त मंत्री

अफगानिस्तान के आखिरी वित्त मंत्री खालिद पयिंदा ने काबुल पर तालिबान के कब्जे से चंद रोज पहले ही अपने पद से इस्तीफा दे दिया था और किसी तरह से जान बचाकर अमेरिका जाकर शरण ली थी। आज की तारीख में वह अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन डीसी के आसपास उबर कैब चलाकर अपने और अपने 6 सदस्यीय परिवार वालों की रोटी का जुगाड़ कर रहे हैं। वैसे कहने के लिए वह अमेरिका की जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी में सहायक प्रोफेसर भी हैं, लेकिन एक सेमेस्टर के लिए मिलने वाले सिर्फ 2,000 डॉलर की कमाई के भरोसे वह अमेरिका में परिवार वालों के साथ रहने का खर्च नहीं जुटा सकते। वाशिंगटन पोस्ट को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने माना है कि वह सवारी ढोने का काम मिलने के आभारी हैं, क्योंकि इससे उन्हें पत्नी और चार बच्चों को संभालने में सहायता मिली है। (इंटरव्यू वाली तस्वीर सौजन्य: यू ट्यूब वीडियो से)

'मैं न यहां का हूं और ना ही वहां का हूं।

'मैं न यहां का हूं और ना ही वहां का हूं।

उन्होंने इंटव्यू में खुलासा किया है कि उन्हें इसलिए इस्तीफा देना पड़ा, क्योंकि अशरफ गनी ने उनके मंत्रालय की सार्वजनिक तौर पर छिछालेदार कर दी थी। वह इस बात से नाराज हुए थे कि एक लेबनानी कंपनी को पेमेंट नहीं मिल पाया था। गनी के बर्ताव से खालिद पयिंदा डर गए थे कि कहीं उन्हें झूठे आरोपों में गिरफ्तार ना कर लिया जाए। उन्होंने बताया कि वे एक हफ्ते पहले ही परिवार को अमेरिका भेज चुके थे और फिर बहुत ही मुश्किल से किसी तरह से वह भी काबुल से निकल भागे। उन्होंने कहा है, 'इस समय मेरे लिए कोई जगह नहीं है।' 'मैं न यहां का हूं और ना ही वहां का हूं। बहुत ही खालीपन महसूस करता हूं।'

अशरफ गनी पर लगे हैं मोटी रकम ले भागने के आरोप

अशरफ गनी पर लगे हैं मोटी रकम ले भागने के आरोप

गौरतलब है कि काबुल पर तालिबान के कब्जे के कुछ दिन पहले ही अफगानिस्तानी राष्ट्रपति अशरफ गनी मुल्क छोड़कर संयुक्त अरब अमीरात भाग गए थे। उनपर आरोप लगे थे कि वह अपने साथ अफगानिस्तान के सरकारी खजाने से 169 मिलियन डॉलर लेकर चले गए हैं। लेकिन, उस घटना के 6 महीने बाद उनके वित्त मंत्री खालिद पयिंदा की गुरबत की कहानी सामने आई है कि किस तरह से वे वाशिंगटन डीसी में उबर टैक्सी चलाकर बच्चों को पाल रहे हैं।

देश का बजट बनाने वाला अब बोनस के लिए संघर्ष कर रहा है

देश का बजट बनाने वाला अब बोनस के लिए संघर्ष कर रहा है

एक उबर टैक्सी चलाते हुए उन्होंने अमेरिकी अखबार से अपना दर्द बयां करते हुए कहा है, 'अगर मैं अगले दो दिनों में 50 ट्रिप पूरा कर लेता हूं तो मुझे 95 डॉलर बतौर बोनस मिलेंगे।' 40 साल के पयिंदा वही शख्स हैं, जो एक वक्त अफगानिस्तान में अमेरिका के सहयोग से 6 बिलियन डॉलर के बजट का लेखा-जोखा तैयार करते थे। कुछ दिन पहले उन्होंने एक रात 6 घंटे से ज्यादा काम किया था तो उन्हें 150 डॉलर से ज्यादा की कमाई हुई थी। जबकि, हर रात ऐसे मौके नहीं मिल पाते हैं। (ऊपर वाली तस्वीर सौजन्य- यू ट्यूब वीडियो से)

'हम लोगों ने ताश के पत्तों की तरह घर तैयार किया था'

'हम लोगों ने ताश के पत्तों की तरह घर तैयार किया था'

हालांकि, पयिंदा अपनी स्थिति के लिए किसी को दोष नहीं देते। वह अफगानिस्तान की हालात पर भारी मन से कहते हैं, 'हम लोगों ने ताश के पत्तों की तरह घर तैयार किया था, जो देखते ही देखते तबाह हो गया। ताश का घर भ्रष्टाचार के फाउंडेशन पर बना था। हमारे पास सिर्फ छोटा सा और आखिरी मौका था, लेकिन सरकार में हम में से कुछ ने चोरी करना तय किया। हमने अपने लोगों को धोखा दिया।' ऐसा पहली बार नहीं है कि उन्हें अपना देश छोड़ना पड़ा है। 1992 में वह सिर्फ 11 साल के थे, जब गृह युद्ध की वजह से उनके परिवार को भागकर पाकिस्तान जाना पड़ा था। रिपोर्ट के मुताबिक 'एक दशक बाद जब अमेरिका ने तालिबान को सत्ता से बेदखल किया तो वह अफगानिस्तान लौटे और वहां के पहले प्राइवेट यूनिवर्सिटी के सह-संस्थापक बने।'

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